नए शहर में घर मिला तो उसमें किचन और टॉइलट के अलावा कुल तीन कमरे थे। दो बेडरूम और एक ड्राइंगरूम है। फिर बेडरूमों के बीच कामकाजी बंटवारा यह हुआ कि एक पति-पत्नी का और दूसरा बच्चे का। धीरे-धीरे घर में जरूरत की चीजें भरती गईं। उनके बीच जो थोड़ा-बहुत स्पेस बचता था, वहीं चिंता के क्षणों में चहलकदमी की जा सकती थी या रात को सारे लोग साथ बैठ कर टीवी देख सकते थे। रोज सुबह नहा कर अगरबत्ती जलाने और मंत्र बुदबुदाने का सिलसिला किशोरावस्था में ही टूट चुका था इसलिए घर में भगवान के लिए जगह निकालने की बात ही कभी दिमाग में नहीं आई।
इधर गांव से मां आई तो देखकर आश्चर्य हुआ कि इस अल्लम-गल्लम के बीच ही उसने थोड़ी सी जगह अपने ठाकुर जी के लिए भी निकाल ली। बेटे के कमरे की एक आलमारी में किताबें-कॉपियां, कॉमिक्स और खिलौने भरे रहते थे। उसी में से एक खाना उसने अगरबत्ती और दिया जलाने के लिए सुरक्षित कर लिया। जो पतली सी गद्दी बेंत वाली कुर्सी पर बिछाने के काम आती थी, वह पूजा के लिए मां की पार्ट टाइम आसनी बन जाने लगी। घंटी, तस्वीरें और मूर्तियां वह गांव से अपने साथ लाई थी- इनके बिना तो उसका बिस्तरबंद ही नहीं बंधता। दो-चार फूल घर की बालकनी में हमेशा खिले रहते हैं और मां के आदेश पर अगरबत्तियां मेरी पत्नी थोक भाव में लेती आईं। इस तरह गांव जितना भव्य तो नहीं, लेकिन कामचलाऊ पूजा-पाठ के लिए पर्याप्त एक मंदिर इसी घर में निकल आया।
जब भी मां यहां होती है, सुबह साढ़े चार बजे घर की एक बत्ती जल जाती है। जाड़ा हो या गर्मी, पांच बजे तक मां नहा-धोकर तैयार हो जाती है। उसकी परेशानी सिर्फ एक ही है- सुबह-सुबह जल देने के लिए ताजे पानी की। नल में पानी साढ़े छह बजे के बाद आता है। लेकिन हर रोज वह अत्यंत धीरज से डेढ़ घंटे तक इंतजार करती है। यह क्रम कभी भंग नहीं होता, भले ही जाड़े के दिनों में घर के बाकी सदस्य इस पर मन ही मन झुंझलाते-बुड़बुड़ाते रहें।
मैं अक्सर सोचता हूं, यह सारा कुछ किस लिए? कौन से देवता इससे खुश हो जाने वाले हैं? और हो भी जाएं तो इस महानगर में रोज ही चली आने वाली नई-नई मुसीबतों से निपटने में उनसे भला किस मदद की उम्मीद की जा सकती है?
जवान होने के बाद मेरा जीने का व्याकरण कुछ और ही हो गया, लिहाजा मां के सोचने के तरीके को बहुत गंभीरता से समझने की कोशिश मैंने कभी नहीं की। अब लगता है कि बात-बेबात नाराज होकर आपा खो देने या परेशानी की घड़ियों में हताशा में डूब जाने या किसी बात का गलत अर्थ लगा कर अपना और पूरे घर का मूड खराब कर देने के जो दुर्गुण मेरे अंदर मौजूद हैं, उनसे मां का वास्ता जरा कम ही है। बुरे से बुरे हालात में भी कुछ रास्ता निकल आने की उम्मीद, उसे खोज लाने की जुगत मुझे अपने मन की गहराइयों में घुसकर टटोलनी पड़ती है। लेकिन यहां तक पहुंचने से पहले सब कुछ तितर-बितर हो जाने की आशंकाएं मुझे नाउम्मीदी के जिस मुकाम तक पहुंचा चुकी होती हैं, वैसा मैंने मां के साथ होते कभी नहीं देखा।
क्या आस्था ने यह कठिन चढ़ाई चढ़ने में वाकई मां को कुछ मदद पहुंचाई है?
मेरे और मां के मिजाज के बीच का यह फर्क किशोरावस्था की तरफ बढ़ते मेरे बेटे के साथ दोनों के अलग-अलग तरह के रिश्तों में भी जाहिर होता है। मां-बाप की बातों का प्रतिरोध उसकी सहज वृत्ति है, लेकिन दादी से बहस करते हुए उसका तीखापन गायब हो जाता है। क्या इस फर्क की वजह मेरी मां के पास मौजूद आस्था की पूंजी ही है?
माँ का ठाकुर जी वाला कोना बेटे के कमरे में है और बीच-बीच में मैं उसे भी स्कूल जाने से पहले अगरबत्ती जलाते देखता हूं। मेरे लिए वह जगह आज भी घर के एक कमरे में मौजूद आलमारी का एक खाना ही है लेकिन वहां ठहरी अगरबत्ती की खुशबू ने उसे एक अलग शख्सियत दे दी है। हम पति-पत्नी पूजा नहीं करते, लेकिन घर में नया-नया बना यह आस्था का कोना जितना मां का है, उतना ही हमारा भी है।