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पॉलिथीन पर बैन, हो पालन तो मिले चैन

भले ही यह हाई कोर्ट के निर्देश पर मुमकिन हो पाया हो, लेकिन पर्यावरणविद् अब दिल्ली में पॉलिथीन की थैलियों पर प्रतिबंध की कवायद से खुश हैं। उन्हें उम्मीद है कि अब पर्यावरण को पॉलिथीन जैसे राक्षस से मुक्ति मिल सकेगी। दिल्ली वाले फिर से कपड़े के थैले, जूट बैग या कागज के लिफाफों की ओर लौट आएंगे। अब पॉलिथीन से वातावरण का प्रदूषण तो कम होगा ही, सीवर-नाले इन थैलियों से जाम नहीं होंगे। गाय और दूसरे जानवर इन थैलियों को निगलकर मौत के मुंह में नहीं जाएंगे।

सुखद स्थिति की कल्पना से संतोष तो होता है लेकिन शंकाएं भी कम नहीं हैं। ऐसे कितने फैसले हैं जिन पर पूरी तरह अमल हो पाता है? पॉलिथीन की थैलियों पर रोक तो पहले से ही है। पहले भी नोटिफिकेशन हो चुका है, जिसमें कहा गया था कि 40 माइक्रोन से पतली थैली का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। ऐसा करने पर पांच साल की कैद या एक लाख रुपया जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं। इस बार जारी नोटिफिकेशन में 40 माइक्रोन की शर्त हटा दी गई है। अगर शाब्दिक अर्थ निकाला जाए तो पॉलिथीन की थैलियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जा रहा है, लेकिन सरकार इस बारे में खुद भी असमंजस में है।

पर्यावरण विभाग के अफसर इस बारे में बात करने से कतराते हैं। दरअसल सरकार के पास ऐसा कोई यंत्र नहीं है जो यह बता सके कि फलां पॉलिथीन बैग की मोटाई 40 माइक्रोन है या नहीं। यह ठीक वैसा ही है जैसे कार के शीशों की पारदर्शिता की सीमा तो तय कर दी गई लेकिन कोई मापक यंत्र ही मौजूद नहीं था या ट्रांसपोर्ट विभाग के पास यह जानने के लिए कोई मशीन नहीं है कि किसी वाहन की आरसी (रजिस्ट्रेशन) नकली है या असली या सड़कों पर पल्यूशन की जांच के लिए न अफसर हैं और न ही मशीनरी।

यह फैसला जल्दबाजी में लागू करने की बजाय सरकार को एक कार्ययोजना अवश्य तय करनी होगी। अगर पॉलिथीन से छुटकारा पाना है तो विकल्प भी पेश करना होगा। पॉलिथीन की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण यह है कि इसकी लागत तो कम है ही, यह मजबूत और सुविधाजनक भी रहता है। इसलिए गारमंट हो या फिर कोई ठोस सामान, यहां तक कि लिक्विड के लिए भी पॉलिथीन ही प्रयोग में लाया जाता है। कपड़े, जूट के बैग या इको फ्रेंडली पेपर बैग एक सीमा तक ही विकल्प बन सकते हैं क्योंकि न तो ये सभी जरूरतें पूरी कर पाएंगे और न ही लागत के हिसाब से पॉलिथीन जितने सस्ते होंगे। सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए इस क्षेत्र में सब्सिडी और अन्य सुविधाएं जुटानी होंगी।

विकल्पों की तलाश के लिए हिमाचल और गोवा जैसे उन राज्यों की ओर भी देखना होगा जो पॉलिथीन पर प्रतिबंध जैसा कड़ा फैसला ले चुके हैं। सरकार को पॉलिथीन पर प्रतिबंध ऐसा फैसला बनाना होगा, जिस पर अमल होता है। ऐसा फैसला नहीं जैसे 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को सिगरेट नहीं मिलेगी या 14 साल के कम उम्र के बच्चों से घरों-ढाबों में काम नहीं कराया जा सकेगा या ऑटो रिक्शा में तीन से ज्यादा सवारियां नहीं बैठेंगी। इन नियमों को तो इधर-उधर कहीं भी टूटते देखा जा सकता है।