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पहली आहुति

यह घटना उस समय की है, जब स्वामी श्रद्धानंद ने हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की थी। गुरुकुल गंगा नदी के पास सुनसान जंगल में बनाया गया था। वहां जंगली जानवर खुले में घूमा करते थे। स्वामी श्रद्धानंद ने आसपास के कई परिवारों से अपने बच्चों को गुरुकुल में भेजने का अनुरोध किया तो सबने यही कहकर मना कर दिया कि जंगल भयानक जीव-जंतुओं व जहरीले कीड़े-मकोड़ों से भरा हुआ है। यह सुनकर स्वामी जी अत्यंत दु:खी हुए। उन्होंने फिर हरेक परिवार से जाकर कहा, 'गुरुकुल में सबसे पहले मेरे दोनों बेटों का प्रवेश होगा और उसके बाद मेरे शुभचिंतकों व परिजनों के बच्चों का। यदि कोई समस्या उत्पन्न होगी तो वह उन बच्चों के माध्यम से ही पता चल जाएगी। किंतु यदि गुरुकुल में सभी सकुशल रहे तो फिर आप को अपने बच्चों का दाखिला कराना होगा।'

स्वामी श्रद्धानंद की यह बात सुनकर लोग हैरत से उनको देखते रह गए। किंतु स्वामी जी के दृढ़ निश्चय को देखकर उन्होंने इस बात की हामी भर दी कि सब बच्चों के सकुशल रहने पर वे भी अपने बच्चों का दाखिला वहां करा देंगे। कुछ समय बाद वहां अनेक बच्चे पढ़ने लगे। एक दिन स्वामी जी के एक सहयोगी ने उनसे पूछा, 'आपके व आपके परिजनों के बच्चों के आने के बाद दूसरे बच्चे भी यहां आने लग गए। इसका क्या कारण है?' सहयोगी की बात पर स्वामी जी बोले, 'वेदों में कहा गया है कि जिस कार्य को हम संपन्न कराना चाहते हैं, उसमें सबसे पहले स्वयं आहुति देनी चाहिए इसलिए मैंने गुरुकुल के निर्माण के लिए भी सबसे पहले अपनी कमाई दान में दी और उसके बाद सबसे पहले अपने दोनों पुत्रों को गुरुकुल में रखा ताकि लोग ये जान लें कि सभी बच्चे मेरे अपने बच्चों के समान हैं और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी मुझ पर अपने बच्चों की तरह ही है। इससे लोगों का भय निकल गया।'