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सफलता और सादगी

हेनरी फोर्ड संसार के अग्रणी उद्योगपति थे। उन्होंने अपनी लगन व मेहनत से विश्व में एक अलग पहचान बनाई और अमेरिका में फोर्ड मोटर कंपनी की स्थापना की। उनके नाम पर बनी फोर्ड कार को अभूतपूर्व लोकप्रियता मिली। एक भारतीय उद्योगपति भारत में मोटरकार का कारखाना लगाना चाहते थे। वह हेनरी फोर्ड को इतने कम समय में मिली सफलता से बेहद प्रभावित थे इसलिए वह कारखाना खोलने से पहले एक बार उनसे मिलकर उनकी कामयाबी का राज जानना चाहते थे। इसके लिए वह अमेरिका पहुंचे और हेनरी फोर्ड से मिलने के लिए समय लिया। हेनरी फोर्ड ने उन्हें कहा कि वह शाम 6 बजे उनके निवास पर आकर उनसे मिल सकते हैं। इतनी जल्दी समय मिलने पर उद्योगपति बेहद खुश हुए और वह निश्चित समय पर उनके घर पहुंचे। वहां पहुंच कर उन्होंने देखा कि एक व्यक्ति अपने खाने के बर्तन साफ कर रहा था।

बर्तन साफ करने के बाद वह भारतीय उद्योगपति की तरफ देखकर बोला 'बैठिए, मुझे ही हेनरी फोर्ड कहते हैं।' यह सुनकर उद्योगपति आश्चर्यचकित रह गए और उन्होंने कहा, 'आप इतने बड़े व्यक्ति होकर बर्तन स्वयं साफ कर रहे थे। यह काम तो एक नौकर भी कर सकता है।' उद्योगपति की बात सुनकर हेनरी फोर्ड मुस्कुराते हुए बोले, 'मैं शुरू में साधारण आदमी था। अपना काम स्वयं करता था। अपने कठोर परिश्रम के कारण ही मैं आज कारखानों का मालिक बन पाया हूं। मैं उन दिनों को भूल कर खुद पर गर्व न करूं इसलिए अपना काम स्वयं करता हूं और सही मायने में यही मेरी सफलता का राज है । सफल होने के लिए सादगी व ईमानदारी का होना बहुत जरूरी है।'

भारतीय उद्योगपति हेनरी फोर्ड की कामयाबी का राज समझ गए और उनके सामने नतमस्तक होकर वापस आ गए। रास्ते में उन्होंने संकल्प लिया कि वह भी अपने कार्य में पूर्ण ईमानदारी बरतेंगे तथा सादगीपूर्ण जीवन गुजारेंगे। जल्दी ही उद्योगपति ने भारत में अपनी अलग पहचान बना ली।

आस्था का प्रश्न

एक राजा हर समय ईश्वर की भक्ति में डूबा रहता था। उसकी इकलौती लड़की भी उसी की तरह धर्मानुरागी थी। राजा की इच्छा थी कि वह अपनी पुत्री का विवाह ऐसे युवक के साथ करे ,जो उसी की तरह धार्मिक प्रवृत्ति का हो। एक दिन राजा को एक ध्यानमग्न युवक मिला। राजा ने उससे पूछा, 'तुम्हारा घर कहां है?' युवक ने उत्तर दिया, 'ईश्वर जहां रखता है, वहीं मेरा घर है।' राजा ने प्रश्न किया, 'तुम्हारे पास कुछ सामान है?' युवक ने कहा, 'प्रभु की कृपा के अलावा मेरे पास कुछ नहीं है।' उससे प्रभावित होकर राजा ने अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया। विवाह के बाद राजा की बेटी पति के साथ जंगल में गई और एक पेड़ के नीचे डेरा डाला। उसने देखा कि पेड़ के कोटर में रोटी का टुकड़ा रखा है। उसने पति से पूछा , 'यह क्या है?' पति ने जवाब दिया, 'आज रात इससे काम चलेगा, इसलिए इसे कल बचाकर छोड़ा था।'

यह सुनकर राजकन्या रोने लगी और अपने पिता के घर लौटने की तैयारी करने लग गई। पति ने कहा, 'मैं जानता था कि यही होगा। तुम्हारा लालन-पालन महल में हुआ है, तुम मुझ जैसे गरीब के साथ निभा नहीं सकोगी।' राजा की बेटी ने उत्तर दिया, 'मैं गरीबी से नहीं डरती। मुझे दुख इस बात का है कि ईश्वर के प्रति आपका पूर्ण विश्वास नहीं है। इसी से आपने सोचा कि कल क्या खाएंगे और रोटी का टुकड़ा बचाकर रख लिया।

ईश्वर को देना होगा तो वह स्वयं देगा, हम इसकी चिंता क्यों करें। मैंने सोचा था कि मुझे ऐसा पति मिले जिसकी प्रभु भक्ति में कोई कमी न हो। इसी से मैंने आपका वरण किया पर मैं संभवत: गलत हूं।' युवक बहुत पछताने लगा। राजकन्या ने कहा, 'आप कान खोलकर सुन लीजिए कि आपके साथ रोटी का यह टुकड़ा रहेगा या मैं।' यह सुनकर युवक की आंखें खुल गईं। उसने रोटी का टुकड़ा फेंक दिया।

भारती का फैसला

आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच शास्त्रार्थ शुरू हुआ। निर्णायक थीं मंडन मिश्र की पत्नी भारती। सोलह दिन तक शास्त्रार्थ चला लेकिन हार जीत का कोई फैसला नहीं हो सका। दोनों में बराबर की टक्कर थी। भारती के लिए किसी एक के पक्ष में निर्णय करना कठिन हो रहा था। सत्रहवें दिन भारती ने कहा, 'मुझे आवश्यक कार्य से कुछ दिनों के लिए बाहर जाना है।' उन्होंने शंकराचार्य और मंडन मिश्र के गले में फूलों की एक-एक माला डालते हुए कहा, 'मेरा दायित्व अब ये मालाएं संभालेंगी। यही अंतिम निर्णय करेंगी।'

लोग समझ नहीं पाए कि मालाएं हार-जीत का फैसला कैसे कर सकती हैं। लेकिन भारती से किसी ने कुछ नहीं कहा। वह चली गईं। उनकी गैरमौजूदगी में दोनों विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ जारी रहा। कुछ समय बाद भारती लौटीं। उन्होंने ध्यान से दोनों के गले में पड़ी माला को देखा फिर अपना निर्णय सुनाया। शंकराचार्य विजयी हुए। लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि यह कैसा निर्णय है, यहां न रहते हुए भी उन्होंने अपने पति को पराजित घोषित कर दिया। एक विद्वान ने नम्रता से पूछा,' देवी, आप यहां नहीं थीं फिर आप को कैसे पता चला कि मंडन मिश्र शास्त्रार्थ में शंकराचार्य का मुकाबला नहीं कर सके?'

भारती ने कहा, 'जब मनुष्य हारने लगता है तो उसे गुस्सा आता है। गुस्सा आने पर शरीर का ताप बढ़ जाता है। क्रोध मनुष्य की आत्मा को जलाता है और उसका असर शरीर के हर अंग पर पड़ता है। आप ने गौर किया होगा कि क्रोध के ताप से मेरे पति के गले की माला मुरझा गई थी जबकि शंकराचार्य के गले की माला पहले की तरह खिली हुई थी।'

भारती के निर्णय का समर्थन मंडन मिश्र ने भी किया। उन्होंने माना कि वह शास्त्रार्थ में कमजोर पड़ रहे थे लेकिन अहंकारवश इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे थे। सभी विद्वानों ने भारती के पक्षपात रहित निर्णय की सराहना की।

मुक्ति का मार्ग

गौतम बुद्ध ने 29 वर्ष की आयु में दु:खों से मुक्ति प्राप्त करने का उपाय ढूंढने के लिए अपने परिवार और गृहस्थ जीवन को छोड़ दिया। निरंतर चिंतन-मनन के बाद 35 वर्ष की आयु में उन्होंने इसका रास्ता खोज भी लिया। 45 वर्ष तक उन्होंने लगातार अपने विचारों का प्रचार किया। जब उनका अंत समय आया, वह एक वृक्ष के नीचे लेट गए और मृत्यु की प्रतीक्षा करने लगे।

उस समय उनका केवल एक ही शिष्य उनके पास था, आनंद। आनंद ही लंबे समय से बुद्ध की सेवा कर रहा था। आनंद ने सोचा कि बुद्ध का अंत समय निकट है। अगर यह बात पास के गांव में रहने वाले बुद्ध के शिष्यों को न बताई जाए तो वे नाराज होंगे। आनंद के यह बताने पर लोग बुद्ध का दर्शन करने उस वृक्ष के पास पहुंचने लगे। आसपास के इलाकों में इस बात की चर्चा फैल गई। एक व्यक्ति अपनी जिज्ञासा के समाधान के लिए काफी उत्सुक था।

वह भोलाभाला ग्रामीण था और दुनियादारी को ढंग से नहीं जानता था, फिर भी उसके मन में एक जिज्ञासा थी, जिसे लेकर वह परेशान था। बुद्ध ने उसे अपने पास बुलाया। उस ग्रामीण ने हाथ जोड़ कर बुद्ध से जीते जी मुक्ति पाने का मार्ग बताने की प्रार्थना की। बुद्ध ने ग्रामीण से कहा, 'जीते जी जन्म-मरण से मुक्ति प्राप्त करना चाहते हो तो जीवन में तीन बातें याद रखो और इन बातों पर अमल भी करो।'

सब लोग ध्यान से सुनने लगे। बुद्ध ने कहा,' पहली बात है पापों से, जहां तक संभव हो, बचो। दूसरी बात है जीवन में जितने भी पुण्य कर्म कर सकते हो, करो एवं तीसरी बात है अपना मन, चित्त निर्मल रखो।' ये शब्द कहते ही बुद्ध ने अपने प्राण त्याग दिए। बुद्ध की इन तीन शिक्षाओं को अपनाकर ग्रामीणों ने जीते जी मुक्ति का मार्ग पाया। ये तीन शिक्षाएं मानवता के लिए अमूल्य देन हैं।

असीमित पुण्य

एक बार गुजरात की एक रियासत की राजमाता मीलण देवी ने भगवान सोमनाथ जी का विधिवत् अभिषेक किया। उन्होंने सोने का तुलादान कर उसे सोमनाथ जी को अर्पित कर दिया। सोने का तुलादान कर उनके मन में अहंकार भर गया और वह सोचने लगीं कि आज तक किसी ने भी इस तरह भगवान का तुलादान नहीं किया होगा। इसके बाद वह अपने महल में आ गईं। रात में उन्हें भगवान सोमनाथ के दर्शन हुए। भगवान ने उनसे कहा, 'मेरे मंदिर में एक गरीब महिला दर्शन के लिए आई है। उसके संचित पुण्य असीमित हैं। उनमें से कुछ पुण्य तुम उसे सोने की मुद्राएं देकर खरीद लो। परलोक में काम आएंगे।'

नींद टूटते ही राजमाता बेचैन हो गईं। उन्होंने अपने कर्मचारियों को मंदिर से उस महिला को राजभवन लाने के लिए कहा। कर्मचारी मंदिर पहुंचे और वहां से उस महिला को पकड़ कर ले आए।

गरीब महिला थर-थर कांप रही थी। राजमाता ने उस गरीब महिला से कहा, 'मुझे अपने संचित पुण्य दे दो, बदले में मैं तुम्हें सोने की मुद्रएं दूंगी।' राजमाता की बात सुनकर वह महिला बोली, 'महारानी जी, मुझ गरीब से भला पुण्य कार्य कैसे हो सकते हैं। मैं तो खुद दर-दर भीख मांगती हूं। भीख में मिले चने चबाते-चबाते मैं तीर्थयात्रा को निकली थी।

कल मंदिर में दर्शन करने से पहले एक मुट्ठी सत्तू मुझे किसी ने दिए थे। उसमें से आधे सत्तू से मैंने भगवान सोमेश्वर को भोग लगाया तथा बाकी सत्तू एक भूखे भिखारी को खिला दिया। जब मैं भगवान को ठीक ढंग से प्रसाद ही नहीं चढ़ा पाई तो मुझे पुण्य कहां से मिलेगा?' गरीब महिला की बात सुनकर राजमाता का अहंकार नष्ट हो गया। वह समझ गईं कि नि:स्वार्थ समर्पण की भावना से प्रसन्न होकर ही भगवान सोमेश्वर ने उस महिला को असीमित पुण्य प्रदान किए हैं। इसके बाद राजमाता ने अहंकार त्याग दिया और मानव सेवा को ही अपना सवोर्परि धर्म बना लिया ।

अंतिम कसक

बात तब की है, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। बंगाल के न्यायाधीश नीलमाधव बैनर्जी अपनी न्यायप्रियता, सत्यनिष्ठा व दयालुता के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। अपने जीवन काल में उन्होंने अपने इन्हीं गुणों के कारण बेहद सम्मान व प्रसिद्धि पाई। वृद्धावस्था में उन्हें प्राण घातक रोग ने जकड़ लिया तथा उनका शरीर बेहद कमजोर हो गया।

बीमारी के कारण उनके शरीर में असहनीय पीड़ा होने लगी। वे बार-बार ईश्वर से प्रार्थना करते और कहते, 'हे ईश्वर, अब मुझसे यह पीड़ा सही नहीं जाती। मुझे इस रोगग्रस्त शरीर से मुक्ति देकर अपने पास बुला लो।' लेकिन इस तरह मृत्यु को बुलाने से वह थोड़े ही आती है, उन्हें पीड़ा भुगतनी पड़ रही थी।

एक दिन वह सोचने लगे कि मुझसे जरूर कुछ न कुछ गलती हुई है, जिसकी मुझे पीड़ा के रूप में सजा भुगतनी पड़ रही है। बहुत सोचने पर उन्हें याद आया कि एक बार बीमा कराते समय उन्होंने अपनी मधुमेह की बीमारी को बेहद सफाई से छिपाकर बीमा करा लिया था। यह याद आते ही उन्हें अपने शरीर में होने वाली पीड़ा का कारण समझ में आ गया और उन्होंने तभी बीमा अधिकारी को बुलाया और उससे बोले, 'भैया, मैंने जब आपसे बीमा कराया था, उस समय मैं मधुमेह से ग्रस्त था। किंतु उस समय मैंने यह बात आपको नहीं बताई थी। इसलिए मेरा यह बीमा रद्द कर दिया जाए। मेरे मरने के बाद कोई भी इस बीमा राशि का अधिकारी नहीं होगा। मैंने न्यायाधीश के रूप में हमेशा सत्य का आचरण किया, किंतु व्यक्तिगत जीवन में मैं उस पर टिके रहने से लोभवश चूक गया। इसी कारण आज यह कष्ट भोग रहा हूं।' उनके कहने पर बीमा अधिकारी ने उनका बीमा रद्द कर दिया। बीमा रद्द होने के बाद उनके चेहरे पर संतोष व शांति की झलक दिखाई दी। इसके बाद उसी रात उन्होंने प्राण त्याग दिए।

ज्ञान की खोज

जाजलि नाम का एक ब्राह्मण था। वह ज्ञान प्राप्त करना चाहता था। इसके लिए वह जगह-जगह भटकता फिरा, अनेक साधु-महात्माओं के पीछे दौड़ता रहा, पर उसे कोई ऐसा ज्ञानी नहीं मिला, जिसे अपना गुरु बना कर वह आश्वस्त महसूस कर सके। अपनी खोज से उसे निराशा महसूस होने लगी कि अचानक एक दिन उसकी मुलाकात एक नए साधु से हुई।

जिज्ञासावश उससे भी जाजलि ने किसी सच्चे गुरु का पता बताने को कहा, जो उसे सही राह दिखा सके। साधु ने उसे सलाह दी कि वह उसी नगर के तुलाधार वैश्य के पास जाए। उसी से उसे ज्ञान मिलेगा। जाजलि पहले तो साधु को अविश्वास से देखता रहा, उसे लगा कि शायद साधु उसका मजाक बना रहा है। लेकिन उसके मुख पर गंभीरता देखकर जाजलि ने उसकी सलाह आजमाने का इरादा किया।

वह तुरंत ही साधु से विदा लेकर तुलाधार वैश्य की तलाश में निकल पड़ा। तुलाधार के पास पहुंचकर उसने अपनी इच्छा प्रकट की और निवेदन किया कि मुझे ऐसा ज्ञान दीजिए जिससे मेरा जीवन सुधर जाए।

तुलाधार ने विस्मय से उसकी ओर देखा, फिर बोला, भैया, मैं तो कोई ज्ञानी-पंडित नहीं हूं जो सच्ची राह दिखा सकूं। पर हां, वह रास्ता जरूर बता सकता हूं, जिस राह स्वयं चलता हूं। सच पूछो तो मैं हमेशा अपनी इस तराजू से मार्गदर्शन पाता हूं। इसकी डंडी हमेशा सीधी रखनी है, न ऊंची, न नीची। जाजलि ने अनुभव किया कि शायद यही कारण है कि दुकान पर आने वाले सभी लोगों के लिए तुलाधार -हर छोटे-बडे़, अमीर- गरीब के लिए अपना कार्य-व्यवहार हमेशा एक समान रखता है। जाजलि को समझ में आ गया कि हम जो कुछ कर्म करते हैं, उसका सीधा परिणाम हमारे मन पर होता है। कर्मयोगी की साधना और जप उसके कर्म में ही निहित होता है। उसी से उसकी चित्त शुद्धि होती है। और निर्मल मन पर ज्ञान का प्रभाव पड़ता है। जाजलि जिस उद्देश्य को लेकर तुलाधार के पास गया था, उसकी पूर्ति हो गई। उसे ज्ञान मिल गया।

गहनों का त्याग

गांधीजी जगह-जगह सभाएं करके हरिजन उत्थान के लिए धन एकत्र कर रहे थे। मालाबार के बगडरा गांव की सभा में उन्होंने अपने भाषण में कहा, जिस देश में करोड़ों लोग आधे पेट रहते हों और लगभग अस्सी प्रतिशत लोगों को पूरा पौष्टिक भोजन न मिलता हो, उस देश में गहना पहनना आंखों को बुरा लगता है। यह तो इतनी सारी पूंजी को रोक रखना या उसे बर्बाद हो जाने देना हुआ। इस आंदोलन में स्त्रियां व पुरुष अपने गहने दें तो मैं मानता हूं कि समाज को उससे स्पष्ट लाभ होगा। गांधीजी की बात सुनकर कौमुदी नामक एक पंद्रह वर्षीय छात्रा मंच पर आई और अपने हाथ, गले और कान से सारे गहने उतार कर गांधीजी की ओर बढ़ाते हुए उनसे पूछा, क्या इनके बदले आप मुझे अपने हस्ताक्षर देंगे?

अवश्य दूंगा, गांधीजी ने उसकी उम्र को देखते हुए चिंता से पूछा, पर क्या तुमने अपने माता-पिता से ये गहने देने की आज्ञा ले ली है?

कौमुदी कुछ कहे इससे पहले ही एक सज्जन बोल उठे, कौमुदी के पिता सभा में उपस्थित हैं और मानपत्रों की जो नीलामी चल रही है, उसमें बोली लगाकर आपकी मदद कर रहे हैं। कौमुदी के पिता ने स्वीकार किया कि कौमुदी ने उनसे आज्ञा लेकर ही गहने दान दिए हैं। गांधीजी फिर भी संतुष्ट नहीं हुए, उन्होंने कौमुदी से कहा, तुमने जो गहने दिए हैं, उनके बदले नए नहीं पहनोगी? नहीं पहनूंगी, कौमुदी ने दृढ़ता से कहा। लेकिन गहने न पहनने से तुम्हारी माता को तो दुख होगा? हां, दुख तो होगा, लेकिन वे इसके लिए मुझ पर जबरदस्ती नहीं करेंगी, कौमुदी ने कहा। किंतु तुम शादी तो करोगी ही, तब तुम्हारा पति यदि गहनों के त्याग को पसंद न करे तो? गांधी जी ने चिंता से पूछा। कौमुदी एक क्षण के लिए विचारमग्न हो गई, फिर बोली, बापू! मैं ऐसा पति चुनूंगी जो मुझ पर गहने पहनने के लिए दबाव न डाले। यह सुनकर गांधीजी गद्गद हो गए और हस्ताक्षर देते समय लिखा, तुमने जो गहने दिए हैं, उनकी अपेक्षा तुम्हारा त्याग ही सच्चा अलंकार है।

श्लोक की कीमत

महाकवि भारवी ने अपनी मृत्यु के पूर्व एक श्लोक लिखा, जिसका भाव है,'सहसा कोई कार्य मत करो। अविवेक भीषण विपदा के कारण होते हैं। गुण के लोभ में लक्ष्मी स्वयं आकर विवेकशील जनों का वरण करती है।' श्लोक लिखने के बाद भारवी ने उसे अपनी पत्नी को सौंप दिया।

दैव योग से कुछ समय बाद भारवी की मृत्यु हो गई और उनकी पत्नी को आर्थिक समस्याओं ने घेर लिया। घर में और कुछ था नहीं, मजबूर हो कर वे भारवी के लिखे उस श्लोक को ही लेकर बाजार में बेचने के लिए पहुंचीं। यह भी एक संयोग ही था कि उधर नगर सेठ ने घोषणा कर रखी थी कि बाजार में जो वस्तु बिकने से वंचित रह जाएगी, उसे वह स्वयं खरीद लेगा। शाम हो गई पर किसी ने वह श्लोक खरीदने में रुचि नहीं दिखाई। बाजार खत्म होने के बाद बिकने से बचा रह गया वह श्लोक खरीदने के लिए सेठ भारवी की पत्नी के पास पहुंचे, पर कीमत बीस स्वर्ण मुदाएं सुनकर सन्न रह गए। प्रश्न प्रतिष्ठा का था, सो अनमने भाव से उसे खरीद लिया और शोभा के लिए उसे बड़े-बड़े स्वर्ण अक्षरों में लिखवाकर अपने शयन कक्ष में टंगवा दिया।

कुछ दिनों बाद सेठ की पत्नी गर्भवती हुई। लेकिन उसी समय अचानक सेठ को व्यापार के प्रयोजन से दूसरे देश जाना पड़ा। वहां कारोबार के सिलसिले में उसे लंबे समय तक रुकना पड़ा। कुछ वर्षों बाद जब सेठ वापस लौटा तो घर में अपनी पत्नी को एक किशोर के साथ लेटा हुआ पाया। वह घृणा और क्रोध से भर उठा। म्यान से तलवार निकालकर उन्हें मारने बढ़ा, तभी उसकी नजर दीवार पर टंगे भारवी के श्लोक पर पड़ी। श्लोक का मर्म समझकर उसने पहले पत्नी से पूछना उचित समझा, यह कौन है? पत्नी खुशी से भरी सो रहे किशोर के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, आपका पुत्र। नगर सेठ सोचने लगा, बीस स्वर्ण मुद्राओं में खरीदे इस श्लोक ने आज मुझे सर्वनाश से बचा लिया।

उचित पारिश्रमिक

यह घटना उस समय की है जब मैसूर रियासत के दीवान सर विश्वेश्वरैया राज्य के किसी कार्य से शिकागो गए हुए थे । वहां पर उन्हें किसी विषय पर एक दस्तावेज बनवाने की आवश्यकता महसूस हुई। इसके लिए उन्होंने कई लोगों से संपर्क किया। आखिरकार एक वकील का पता चला जो इस कार्य के लिए सबसे उपयुक्त थे। विश्वेश्वरैया ने उस वकील से संपर्क किया और उससे वह दस्तावेज बनाने की बात की। सारी बात जानने के बाद उस वकील ने दस्तावेज बनाने के लिए पारिश्रमिक के रूप में सात डॉलर मांगे।

विश्वेश्वरैया ने वकील को काम के बाद सात डॉलर देना मंजूर कर लिया। दस्तावेज तैयार होने के बाद वह उसे लेने के लिए वकील के घर पहुंचे। उस समय वकील महोदय घर पर नहीं थे। उनकी पत्नी ने उन्हें दस्तावेज दे दिया। विश्वेश्वरैया ने वहीं पर दस्तावेज को देखा। उन्हें वकील द्वारा बनाया गया दस्तावेज बहुत पसंद आया। वकील के काम से प्रभावित होकर विश्वेश्वरैया ने वकील की पत्नी को सात की जगह आठ डॉलर दे दिए और दस्तावेज लेकर वापस आ गए।

शाम को वकील महोदय विश्वेश्वरैया के पास पहुंचे और उन्हें एक अतिरिक्त दिया गया डॉलर वापस करने लगे। विश्वेश्वरैया उसे लेने से इनकार करते हुए बोले, 'महोदय, मुझे आपके द्वारा तैयार दस्तावेज बहुत अच्छा लगा, मैं अपने को रोक न सका। आपके काम से प्रसन्न होकर ही मैंने एक डॉलर अधिक दे दिया है।' विश्वेश्वरैया की इस बात पर वकील साहब ने कहा, 'मैंने आपसे बढ़िया कार्य के ही पैसे तय किए थे। पारिश्रमिक तय होने पर अच्छा काम करके देना ही मेरा धर्म था। इसलिए मैं अतिरिक्त राशि नहीं ले सकता।'

विश्वेश्वरैया के बहुत आग्रह के बावजूद वकील महोदय ने वह अतिरिक्त एक डॉलर नहीं लिया और उसे वापस देकर चले गए। विश्वेश्वरैया उस वकील की काम के प्रति अनूठी लगन देखकर गदगद हो गए। मैसूर लौटकर उन्होंने उस वकील के बारे में सबको बताया।