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काम के दायरे

हमारा दिल नहीं मानता कि सभी कलाओं और आविष्कारों की श्रेष्ठता मूलत: एक ही है। सभी का मकसद जीवन को सुविधाजनक व आनंददायक बनाना है तथा अपनी एकाग्रता, प्रयास और लगन से उस उत्कृष्टता को हासिल कर लेना है। तो इस स्तर पर उन विविध प्रयासों में कोई भेद नहीं हो सकता। हम यह स्वीकार नहीं कर पाते कि कोई अच्छी कविता अपने रचे जाने की प्रक्रिया या उद्देश्य में किसी मोटर इंजन के आविष्कार जैसी ही है और टीवी-मोबाइल जैसी ईजाद भी टॉलस्टाय या गोर्की की रचनाओं जैसी ही सूक्ष्म दृष्टि और संवेदनशीलता की मांग करती है।

इतनी बड़ी बातों को छोड़ दें और सिर्फ इस पर विचार करें कि यदि कोई सफाईकर्मी भी पूरे मनोयोग से किसी पार्क का कोई कोना इस तरह से साफ करता है कि वह जगह आने-जाने वालों का मन प्रसन्न कर दे, तो उसके काम करने की प्रक्रिया और उस प्रक्रिया से गुजरने वाले क्षण साहित्य रचने या रेडियो सिग्नल पकड़ने वाला यंत्र बनाने वाले क्षणों से कमतर नहीं होते। पर असल में इंसान ने अपने-अपने विभिन्न कार्यों के लिए श्रेष्ठता की इतनी श्रेणियां बना रखी हैं कि अक्सर वह दूसरे के कार्यों का न तो महत्व समझ पाता है और न ही उन्हें यथोचित आदर दे पाता है। तो जो इन दायरों से बाहर निकल सके, वही सच्चा गुणग्राही हो सकता है।