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आत्मा की रक्षा

राजनर्तकी आम्रपाली ने राह में एक युवा संन्यासी को देखा। वह उसके आकर्षण में बंधकर उसके पीछे चलने लगी। थोड़ी देर बाद संन्यासी एक वृक्ष की छाया में बैठ गया। आम्रपाली भी बैठ गई। उसने संन्यासी से प्रश्न किया, 'आपने युवावस्था में ही संन्यास क्यों ग्रहण किया?' संन्यासी ने उत्तर दिया, 'सत्य की खोज में।' आम्रपाली ने कहा, 'उस सत्य का क्या लाभ, जिसे पाने में आपका यौवन ही खत्म हो जाए।' संन्यासी ने कहा, 'पूर्ण आनंद तो साधु जीवन में ही है। और तुम जिसे सुख समझ रही हो वह तो क्षणिक है।' इस पर आम्रपाली बोली, 'आपका यह विश्वास असत्य सिद्ध होगा। आप कृपया मेरा आतिथ्य स्वीकार करें, जिसके लिए राजकुमार भी लालायित रहते हैं।' संन्यासी ने कुछ सोचकर कहा, 'यदि मेरे गुरु ने इसकी अनुमति दे दी तो मैं आऊंगा।' यह कहकर संन्यासी ने अपने झोले से एक आम निकालकर आम्रपाली को दिया और कहा, 'इसे संभालकर रखना। जब तक मैं आऊं यह खराब न हो।'

संन्यासी ने सारी घटना बुद्ध को बताई। बुद्ध ने संन्यासी को आम्रपाली का अतिथि बनने की अनुमति दे दी। इस पर कुछ अन्य शिष्यों ने आपत्ति व्यक्त की। बुद्ध ने उनकी शंका का निवारण करते हुए कहा, 'इसकी आंखों में थोड़ी भी तृष्णा या वासना नहीं है। यदि मैं मना कर देता तो भी यह मेरी बात अवश्य मानता।' इस बीच आम्रपाली आम को ताजा रखने का प्रयत्न करती रही लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। कुछ दिनों बाद संन्यासी उसके पास पहुंचा और उसने वह आम मांगा। लेकिन वह सड़ गया था, उसमें कीड़े पड़ गए थे।

संन्यासी ने उसकी गुठली निकाल ली और बाकी का हिस्सा फेंक दिया। उसने आम्रपाली से कहा, 'इस गुठली का कुछ नहीं बिगड़ा। इसमें अब भी पुन: उगने की शक्ति है। उसी तरह शरीर गल या सड़ जाएगा लेकिन आत्मा बची रहेगी। आत्मा का ध्यान करो।' यह सुनकर आम्रपाली ने भी बुद्ध की शरण में जाने का फैसला किया।

भक्त की आराधना

एक बार नारद जी श्रीकृष्ण से मिलने पहुंचे। वह बड़ी आतुरता से उनके कक्ष में प्रवेश करने लगे कि तभी द्वारपालों ने रास्ता रोक दिया। नारद जी ने कारण पूछा तो उत्तर मिला, 'प्रभु अभी आराधना में व्यस्त हैं ।' नारद ने कहा, 'रास्ता छोड़ो, मैं तुम्हारे इस बहकावे में नहीं आने वाला।' पर यह सुनकर भी संतरी डटे रहे। मन मसोस कर उन्हें प्रतीक्षा करनी पड़ी। कुछ देर बाद स्वयं श्रीकृष्ण ने कपाट खोले। नारद जी ने प्रणाम करके तुरंत शिकायत की, 'देखिए न, आपके द्वारपालों ने एक बेतुका बहाना बनाकर मुझे भीतर जाने से रोक दिया। ये कह रहे थे कि आप पूजा कर रहे हैं ।'

श्रीकृष्ण बोले, 'यह सत्यवचन है नारद। हम आराधना में ही मग्न थे।' नारद ने कहा, 'भगवन् आप और आराधना?' श्रीकृष्ण बोले, 'देखना चाहोगे, हम किसकी आराधना में लीन थे? आओ भीतर आओ।' भीतर एक पुष्पमंडित पालने पर अनेक छोटी-छोटी प्रतिमाएं झूल रही थीं। नारद जी ने एकाग्र दृष्टि से देखा। कुछ प्रतिमाएं गोकुल की गोप-मंडली की थीं, तो कुछ स्वयं उनकी। तब नारद जी ने बौराई आंखों से प्रभु को निहारा। फिर पूछा, 'भला आराध्य आराधकों की आराधना कब से करने लगा? भक्त गुहार करे और भगवान कृपा, यह सीधी रीत तो समझ में आती है। पर यह दूसरी अटपटी परंपरा आपने क्यों चलाई?' श्रीकृष्ण ने कहा, 'मुझे बताओ नारद, भक्त मेरी आराधना क्यों करते हैं? किस प्रयोजन से मेरी उपासना करते हैं?'

नारद बोले, 'प्रभु वे आपसे आपका प्रेम चाहते है।' श्रीकृष्ण ने कहा 'नारद, ठीक इसी प्रयोजन से मैं भी अपने भक्तों की आराधना करता हूं। मैं भी भक्त से प्रेम की आकांक्षा रखता हूं। भक्त से उसका प्रेम मांगता हूं। प्रेम का यही महादान पाने के लिए मैं निराकार से साकार होकर आता हूं। पर मानव इसी बात को नहीं समझ पाता। वह तो हमसे केवल धन-दौलत ही मांगता है जबकि मैं भक्त का प्रेम पाने के लिए उसकी ओर देखता रहता हूं।'

आदर्श की राह

लालबहादुर शास्त्री ने किशोरावस्था में ही अपना जीवन राष्ट्रीय आंदोलन तथा समाज-सुधार के लिए समर्पित कर दिया था। वह हमेशा लोगों को जागरूक करने व सद्कार्यों के प्रचार-प्रसार में ही लगे रहते थे। एक बार उन्होंने देखा कि वधू पक्ष की ओर से दहेज न मिलने पर वर पक्ष वाले वधू पक्ष वालों को जलील कर रहे थे और उन्हें खरी-खोटी सुना रहे थे। शास्त्री जी से रहा न गया, उन्होंने तत्काल हस्तक्षेप किया और वर पक्ष वालों को काफी फटकारा।

दहेज जैसी कुरीति को लेकर वह बेहद दु:खी हुए। इस घटना के बाद उन्होंने ठान लिया कि वह जिस युवती से विवाह करेंगे, उससे दहेज के नाम पर फूटी कौड़ी भी नहीं लेंगे। उनका मानना था कि ऐसा करने से ही समाज में शिक्षित युवाओं में दहेज का विरोध करने की चेतना जागेगी और इस कुरीति को देश से दूर किया जा सकेगा।

जब उनके विवाह की बातें चल रही थीं, तो उन्होंने apne अभिभावकों से साफ कह दिया कि वह इसी शर्त पर विवाह करेंगे कि दहेज के नाम पर एक फूटी-कौड़ी भी न ली जाए। अभिभावकों ने उनकी इस बात का समर्थन किया और इस तरह बिना दहेज के उनका विवाह सादगी के साथ संपन्न हुआ। जब वधू को विदा किया जाने लगा तो कई लोगों ने कहा कि लड़की का मायके से बिल्कुल खाली हाथ आना शुभ नहीं होता इसलिए शगुन के तौर पर उसे कुछ न कुछ तो दिया ही जाना चाहिए।

शास्त्री जी भी यह बात सुन रहे थे। उन्होंने लोगों से कहा, 'यदि आप सबका यही कहना है तो मैं आपकी बात का सम्मान करते हुए वधू को चरखा ले जाने की इजाजत दे सकता हूं।' उनकी बात मान ली गई और उनकी पत्नी ललिता जी केवल अपने साथ चरखा लेकर विदा हुईं। अपने आदर्श के प्रति शास्त्री जी की इस प्रतिबद्धता को देख लोग दंग रह गए।

अनूठा डॉक्टर

जर्मनी के सम्राट जॉर्ज जोसेफ प्रजा का दुख-दर्द जानने के लिए वेश बदलकर घूमा करते थे। एक दिन वह एक गली से गुजर रहे थे कि एक फटेहाल युवक ने उनका रास्ता रोककर कहा, 'मेरी मां कुछ समय से बीमार है। मैंने उसे कई डॉक्टरों को दिखाया, कोई भी उसके रोग को पहचान नहीं पाया। उसका शरीर जर्जर हो चुका है। यदि मुझे कुछ रुपये मिल जाएं तो मैं अंतिम बार उसका इलाज करना चाहता हूं। क्या आप मेरी मदद कर सकेंगे?' सम्राट ने जेब से रुपये निकाले और उसे देते हुए कहा, 'तुम डॉक्टर को बुलाकर लाओ। मैं तुम्हारी कुछ और भी मदद करने की कोशिश करूंगा। तुम मुझे अपना पता बता दो।'

जॉर्ज जोसेफ तुरंत उस व्यक्ति के घर पहुंचे। उन्होंने देखा कि एक वृद्धा चारपाई पर लेटी हुई है। एक बालक पास बैठा रो रहा है। सम्राट ने अपने को डॉक्टर बताकर महिला से उसकी बीमारी के बारे में पूछा। महिला ने कहा, 'मेरे पति ही घर का खर्च चलाते थे। हाल में उनकी मृत्यु हो गई। कमाने वाला कोई नहीं रहा।

मेरे मरने के बाद मेरे अनाथ बच्चों का क्या होगा, यही चिंता मुझे बीमार बनाए हुए है।' सम्राट ने कागज पर कुछ लिखा और वृद्धा को देते हुए कहा,'इस पर मैंने दवा लिख दी है। अपने बेटे को भेजकर मंगा लेना।' यह कहकर वह चले गए।

कुछ देर बाद वृद्धा का बेटा डॉक्टर को लेकर आया। वृद्धा ने उससे कहा, 'बेटा, अभी थोड़ी देर पहले एक डॉक्टर आया था। वह पर्चे पर कोई दवा लिखकर गया है।' बेटे के साथ आए डॉक्टर ने उसे देखने के बाद कहा, 'माता जी, आपके पास एक अनूठा डॉक्टर आया था। वह आपकी बीमारी का स्थायी इलाज कर गया है। वह कोई साधारण डॉक्टर नहीं था, वह तो हमारे देश का राजा था।' सम्राट जोसेफ ने उस कागज पर लिखा था कि वृद्धा तथा इसके परिवार को राजकोष से नियमित धन देने की व्यवस्था की जाए।

सही न्याय

शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास को एक किसान ने पीट दिया। मामला शिवाजी के सामने आया। समर्थ रामदास बोले, 'इसने मुझे पीटा है, इसलिए दंड मैं दूंगा।' शिवाजी बोले, 'आपकी जैसी मर्जी।' रामदास ने कहा, 'इसे पांच बीघा जमीन दे दो।' सब सोचने लगे कि भला यह कौन सा दंड हुआ! समर्थ रामदास ने कहा, 'बेचारा गरीब है। यदि गरीब नहीं होता तो एक गन्ने के टुकड़े के लिए मुझे नहीं पीटता। इसे जमीन दे दो फिर यह किसी को नहीं पीटेगा।'

किसानों का संकल्प

किसी कारणवश इंद्र क्रुद्ध हो गए। उन्होंने घोषणा कर दी,'अब बारह वर्ष तक बरसात नहीं होगी।' घोषणा सुन जनता मायूस हो गई। फिर भी बारिश के मौसम में किसान हल और बैलों को लेकर खेतों में गए, भूमि को साफ किया, हल जोते। इंद्र समझ नहीं सके कि उनकी स्पष्ट घोषणा के बावजूद ये खेती क्यों कर रहे हैं। वेश बदलकर इंद्र नीचे आए। किसान इकट्ठा हो गए। इंद्र ने पूछा, 'क्या तुमने इंद्र की यह घोषणा नहीं सुनी कि बारह वर्ष तक बारिश नहीं होगी?' लोगों ने कहा, 'हां, सुनी है।' इंद्र बोले, 'फिर यह व्यर्थ का प्रयत्न क्यों कर रहे हो? क्यों भूमि को साफ कर रहे हो? क्यों बैलों को कष्ट दे रहे हो? क्यों बुआई की तैयारी कर रहे हो? वर्षा तो होगी नहीं।'

किसान बोले, 'वर्षा हो या नहीं, हम तो भूमि की सफाई करेंगे और हल भी चलाएंगे। यदि हम यह प्रयास छोड़ दें तो हमारी भावी पीढ़ी बिल्कुल बेकार हो जाएगी और कृषि करना भूल जाएगी। फिर बारह वर्ष के बाद हमारे बच्चे क्या खाएंगे। हम यह कार्य प्रतिवर्ष बराबर करते रहेंगे। मेघ बरसें या नहीं बरसें, यह उनकी इच्छा है, मगर हम अपना धंधा नहीं छोड़ेंगे, कृषि करते चले जाएंगे। ऐसा करते-करते एक दिन अवश्य बारिश भी होगी और खेती भी।' किसानों के दृढ़ संकल्प के सामने इंद्र भी झुक गए।

पहली आहुति

यह घटना उस समय की है, जब स्वामी श्रद्धानंद ने हरिद्वार में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना की थी। गुरुकुल गंगा नदी के पास सुनसान जंगल में बनाया गया था। वहां जंगली जानवर खुले में घूमा करते थे। स्वामी श्रद्धानंद ने आसपास के कई परिवारों से अपने बच्चों को गुरुकुल में भेजने का अनुरोध किया तो सबने यही कहकर मना कर दिया कि जंगल भयानक जीव-जंतुओं व जहरीले कीड़े-मकोड़ों से भरा हुआ है। यह सुनकर स्वामी जी अत्यंत दु:खी हुए। उन्होंने फिर हरेक परिवार से जाकर कहा, 'गुरुकुल में सबसे पहले मेरे दोनों बेटों का प्रवेश होगा और उसके बाद मेरे शुभचिंतकों व परिजनों के बच्चों का। यदि कोई समस्या उत्पन्न होगी तो वह उन बच्चों के माध्यम से ही पता चल जाएगी। किंतु यदि गुरुकुल में सभी सकुशल रहे तो फिर आप को अपने बच्चों का दाखिला कराना होगा।'

स्वामी श्रद्धानंद की यह बात सुनकर लोग हैरत से उनको देखते रह गए। किंतु स्वामी जी के दृढ़ निश्चय को देखकर उन्होंने इस बात की हामी भर दी कि सब बच्चों के सकुशल रहने पर वे भी अपने बच्चों का दाखिला वहां करा देंगे। कुछ समय बाद वहां अनेक बच्चे पढ़ने लगे। एक दिन स्वामी जी के एक सहयोगी ने उनसे पूछा, 'आपके व आपके परिजनों के बच्चों के आने के बाद दूसरे बच्चे भी यहां आने लग गए। इसका क्या कारण है?' सहयोगी की बात पर स्वामी जी बोले, 'वेदों में कहा गया है कि जिस कार्य को हम संपन्न कराना चाहते हैं, उसमें सबसे पहले स्वयं आहुति देनी चाहिए इसलिए मैंने गुरुकुल के निर्माण के लिए भी सबसे पहले अपनी कमाई दान में दी और उसके बाद सबसे पहले अपने दोनों पुत्रों को गुरुकुल में रखा ताकि लोग ये जान लें कि सभी बच्चे मेरे अपने बच्चों के समान हैं और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी मुझ पर अपने बच्चों की तरह ही है। इससे लोगों का भय निकल गया।'

सचिव की ईमानदारी

बड़ौदा के महाराजा एक बार विदेश गए। उनके साथ उनका सचिव भी था। एक बार सचिव खरीदारी के लिए बाजार गया। वहां उसने महाराजा के लिए एक दुकान से कुछ गहने खरीदे। दुकानदार ने सामान देने के बाद पूछा, 'आपका कमिशन?' सचिव ने कहा, 'मैं समझा नहीं। कैसा कमिशन?' दुकानदार ने समझाया, 'आपने महाराजा के गहने खरीदने के लिए हमारी दुकान को चुना। इसके बदले हम आपको कुछ कमिशन देंगे।' सचिव ने कहा, 'मैं तो महाराज का सेवक हूं इसलिए मुझे कमिशन लेने का कोई हक नहीं है। फिर आप जितना कमिशन देंगे उतना मूल्य बढ़ा देंगे।' दुकानदार ने कहा, 'कमिशन का मूल्य पर कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि हम यह राशि अपने प्रचार फंड से देते हैं। यह बात आप महाराजा को भी बता सकते हैं।' इस पर सचिव ने कहा, 'ठीक है, आप मुझे कमिशन दे दीजिए लेकिन उतना पैसा महाराजा के बिल में से कम कर दीजिए।' दुकानदार ने कहा, 'आपकी वफादारी और ईमानदारी प्रशंसनीय है। मैं महाराज को इस बारे में बताऊंगा।' सचिव बोला, 'आप ऐसा न करें क्योंकि यह तो मेरा कर्त्तव्य है। यह कोई प्रचार की चीज नहीं है।'

सबसे बड़ा धन

अहमद नामक एक फकीर थे। उनका ज्यादातर वक्त इबादत या लोगों की मदद में बीतता था। वह लोगों की समस्याओं का समाधान चुटकियों में कर देते थे। वह जो उपाय बताते या तरीके सुझाते, लोग उन पर आंख मूंदकर अमल करते थे।

एक दिन उनके पड़ोस में रहने वाले व्यापारी बहराम के घर से रोने-धोने व शोर-शराबे की आवाजें सुनाई पड़ीं। यह सुनते ही अहमद बहराम के घर जा पहुंचे। वहां पहुंचने पर अहमद को पता चला कि बहराम जब खरीदा गया माल ऊंटों पर लादकर घर ला रहा था तो रास्ते में डाकुओं ने उसका सारा सामान लूट लिया। अपनी सारी संपत्ति लुट जाने के कारण वह पागल सा हो गया और आत्महत्या करने जा रहा था । ऐन मौके पर कुछ लोगों ने आकर उसे आत्महत्या जैसा घृणित कार्य करने से बचा लिया। खुदकुशी न कर पाने के कारण वह आवेश में बिना सोचे-समझे रो-रो कर बोले जा रहा था, 'कंगाल होकर जीने का क्या मतलब है। मैं आखिर क्यों जिंदा रहूं?' अहमद को सामने खड़ा देखकर उसे थोड़ी राहत मिली।

अहमद ने उसके पास आकर पूछा, 'बहराम, जब तुम पैदा हुए थे, तो क्या वह धन तुम्हारे पास था जो लुटेरों ने लूट लिया?' यह सुनकर बहराम बोला, 'नहीं, मैंने बड़ा होने पर अपनी मेहनत से वह दौलत इकट्ठा की थी।' इस पर अहमद बोले, 'क्या लुटेरों ने मेहनत करने वाले तुम्हारे हाथ-पैरों को भी लूट लिया है?' बहराम बोला, 'नहीं'। इस पर अहमद ने कहा, 'तुम्हें तो किसी ने नहीं लूटा। तुम्हारी असली दौलत यानी तुम्हारे हाथ-पैर सही सलामत हैं और फिर तुम्हारे दिल में रहम है। इन से बढ़कर कोई और धन नहीं है। फिर तुम अपने आप को कंगाल कैसे बता रहे हो?' अहमद के इन शब्दों को सुनकर बहराम का सारा दु:ख-दर्द दूर हो गया। उसने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि वह मरने की बात सोच रहा था। अगले ही दिन से वह पूरी लगन के साथ व्यापार में जुट गया।
महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर श्रीकृष्ण की सम्मति से रानी द्रौपदी तथा अपने भाइयों के साथ शरशय्या पर पड़े भीष्म पितामह के समीप आए। युधिष्ठिर के निवेदन करने पर भीष्म पितामह उन्हें उपदेश देने लगे। इसी बीच रानी द्रौपदी को हंसी आ गई। बड़ों के बीच कुलवधू का इस तरह हंसना भीष्म पितामह को अच्छा नहीं लगा। उपदेश बीच में रोककर उन्होंने पूछा, 'बेटी, तू हंसी क्यों?' द्रौपदी ने कहा, 'मुझसे भूल हो गई पितामह, क्षमा करें।' लेकिन पितामह को संतोष नहीं हुआ। वह बोले, 'कोई भी शीलवती कुलवधू गुरुजनों के सम्मुख अकारण नहीं हंसती। संकोच छोड़कर तू अपने हंसने का कारण बता।'

द्रौपदी हाथ जोड़कर बोली, 'यह बहुत ही अभद्रता की बात है, पर आप आज्ञा देते हैं तो कहनी ही पड़ेगी। आप अभी धर्म की ऐसी उत्तम व्याख्या कर रहे हैं किंतु जब मेरा चीरहरण हो रहा था तब आपका यह धर्मज्ञान कहां चला गया था? उस समय सभा में आप और न जाने कितने योद्धा बैठे थे। मैं कुल की मर्यादा की रक्षा के लिए आप लोगों से रो-रोकर प्रार्थना कर रही थी, मगर किसी ने मेरी रक्षा नहीं की। भरी सभा में मेरा अपमान पूरे कुल का अपमान था।

मुझे लगा कि उसी घटना के बाद आपको धर्म का ज्ञान हुआ। मन में यह बात आते ही मुझे हंसी आ गई। आप मुझे क्षमा करें।' इस पर पितामह ने कहा, 'तुम्हारा प्रश्न सही है। बेटी, मुझे धर्मज्ञान तो उस समय भी था, परंतु दुर्योधन का अन्यायपूर्ण अन्न खाने से मेरी बुद्धि मलीन हो गई थी और पौरुष जवाब दे चुका था, इसी से मैं उस सभा में ठीक निर्णय करने में असमर्थ हो गया था। परंतु अब अर्जुन के बाणों के लगने से मेरे शरीर का सारा रक्त निकल गया है और मेरी बुद्धि शुद्ध हो गई है। इससे इस समय मैं धर्म के तत्वों को समझ रहा हूं और उसका विवेचन कर रहा हूं।'

अन्न का असर

महाभारत युद्ध समाप्त होने के बाद धर्मराज युधिष्ठिर श्रीकृष्ण की सम्मति से रानी द्रौपदी तथा अपने भाइयों के साथ शरशय्या पर पड़े भीष्म पितामह के समीप आए। युधिष्ठिर के निवेदन करने पर भीष्म पितामह उन्हें उपदेश देने लगे। इसी बीच रानी द्रौपदी को हंसी आ गई। बड़ों के बीच कुलवधू का इस तरह हंसना भीष्म पितामह को अच्छा नहीं लगा। उपदेश बीच में रोककर उन्होंने पूछा, 'बेटी, तू हंसी क्यों?' द्रौपदी ने कहा, 'मुझसे भूल हो गई पितामह, क्षमा करें।' लेकिन पितामह को संतोष नहीं हुआ। वह बोले, 'कोई भी शीलवती कुलवधू गुरुजनों के सम्मुख अकारण नहीं हंसती। संकोच छोड़कर तू अपने हंसने का कारण बता।'

द्रौपदी हाथ जोड़कर बोली, 'यह बहुत ही अभद्रता की बात है, पर आप आज्ञा देते हैं तो कहनी ही पड़ेगी। आप अभी धर्म की ऐसी उत्तम व्याख्या कर रहे हैं किंतु जब मेरा चीरहरण हो रहा था तब आपका यह धर्मज्ञान कहां चला गया था? उस समय सभा में आप और न जाने कितने योद्धा बैठे थे। मैं कुल की मर्यादा की रक्षा के लिए आप लोगों से रो-रोकर प्रार्थना कर रही थी, मगर किसी ने मेरी रक्षा नहीं की। भरी सभा में मेरा अपमान पूरे कुल का अपमान था।

मुझे लगा कि उसी घटना के बाद आपको धर्म का ज्ञान हुआ। मन में यह बात आते ही मुझे हंसी आ गई। आप मुझे क्षमा करें।' इस पर पितामह ने कहा, 'तुम्हारा प्रश्न सही है। बेटी, मुझे धर्मज्ञान तो उस समय भी था, परंतु दुर्योधन का अन्यायपूर्ण अन्न खाने से मेरी बुद्धि मलीन हो गई थी और पौरुष जवाब दे चुका था, इसी से मैं उस सभा में ठीक निर्णय करने में असमर्थ हो गया था। परंतु अब अर्जुन के बाणों के लगने से मेरे शरीर का सारा रक्त निकल गया है और मेरी बुद्धि शुद्ध हो गई है। इससे इस समय मैं धर्म के तत्वों को समझ रहा हूं और उसका विवेचन कर रहा हूं।'

धर्म का सार

यह उन दिनों की बात है, जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका में थे। वहां कई महत्वपूर्ण जगहों पर उन्होंने व्याख्यान दिए। उनके व्याख्यानों का वहां जबर्दस्त असर हुआ। लोग स्वामी जी को सुनने और उनसे धर्म के विषय में अधिक अधिक से जानने को उत्सुक हो उठे। उनके धर्म संबंधी विचारों से प्रभावित होकर एक दिन एक अमेरिकी प्रोफेसर उनके पास पहुंचे। उन्होंने स्वामी जी को प्रणाम कर कहा, 'स्वामी जी, आप मुझे अपने हिंदू धर्म में दीक्षित करने की कृपा करें।'

इस पर स्वामी जी बोले, 'मैं यहां धर्म प्रचार के लिए आया हूं न कि धर्म परिवर्तन के लिए। मैं अमेरिकी धर्म-प्रचारकों को यह संदेश देने आया हूं कि वे धर्म परिवर्तन के अभियान को बंद कर प्रत्येक धर्म के लोगों को बेहतर इंसान बनाने का प्रयास करें। यही धर्म की सार्थकता है। यही सभी धर्मों का मकसद भी है। हिंदू संस्कृति विश्व बंधुत्व का संदेश देती है, मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानती है।' वह प्रोफेसर उनकी बातों से अभिभूत हो गए और बोले, 'स्वामी जी, कृपया इस बारे में और विस्तार से कहिए।'

प्रोफेसर की यह बात सुनकर स्वामी जी ने कहा, 'महाशय, इस पृथ्वी पर सबसे पहले मानव का आगमन हुआ था। उस समय कहीं कोई धर्म, जाति या भाषा न थी। मानव ने अपनी सुविधानुसार अपनी-अपनी भाषाओं, धर्म तथा जाति का निर्माण किया और अपने मुख्य उद्देश्य से भटक गया। यही कारण है कि समाज में तरह-तरह की विसंगतियां आ गई हैं। लोग आपस में विभाजित नजर आते हैं। इसलिए मैं तुम्हें यह कहना चाहता हूं कि तुम अपना धर्म पालन करते हुए अच्छे ईसाई बनो। हर धर्म का सार मानवता के गुणों को विकसित करने में है इसलिए तुम भारत के ऋषियों-मुनियों के शाश्वत संदेशों का लाभ उठाओ और उन्हें अपने जीवन में उतारो।' वह प्रोफेसर मंत्रमुग्ध यह सब सुन रहे थे। स्वामी जी के प्रति उनकी आस्था और बढ़ गई।

कौन हुआ गरीब

महर्षि कणाद अन्न के बिखरे दाने चुन-चुन कर खाते थे। जब राजा ने कणाद को अन्न और धन देना चाहा तो कणाद ने उसे गरीबों में बांट देने को कहा। इस पर राजा ने कहा कि आपसे बढ़कर गरीब कौन होगा। यह वृत्तांत सुनकर रानी बोलीं, 'महाराज! आपको उन्हें गरीब नहीं कहना चाहिए था। उनके पास स्वर्ण-सिद्धि की विद्या है। आप उनसे यह विद्या सीख लें।'

राजा फिर महर्षि के पास आया और बोला, 'मुझे स्वर्ण-सिद्धि की विद्या सिखाएं।' कणाद बोले,' आप मुझे गरीब बता रहे थे। पर मैं कभी आपके दरवाजे पर कुछ मांगने नहीं गया पर आप मुझसे मांगने के लिए याचक की तरह खड़े हो। बताओ गरीब कौन हुआ।'

दूसरे का हित

एक बार मराठों ने मालवा पर आक्रमण करके उसे जीत लिया। लेकिन मराठा सेना के पास खाद्यान्न की कमी हो गई। सेनापति ने अधिकारियों को आदेश दिया, 'जाओ, जहां से भी प्रचुर मात्रा में अन्न मिले, लेकर आओ।' अधिकारी गए, पर अन्न मिलता कहां से। खेत तो सारे जल गए थे। अंतत: वे खोजते-खोजते एक स्थान पर पहुंचे, जहां एक वृद्ध आदमी मिला।

एक अधिकारी ने पूछा, 'यहां अनाज कहां मिलेगा?' उसने कहा, 'मैं बताता हूं, मेरे साथ आओ।' सब उसके साथ चले। कुछ ही दूरी पर फसल से लहलहाता हुआ खेत मिला। अधिकारियों ने प्रसन्नता से कहा, 'अब हमें पर्याप्त अनाज मिल जाएगा।' बूढ़े ने कहा, 'नहीं, यहां नहीं, अभी आगे चलिए।' कुछ दूरी पर दूसरा खेत आया। फसल की ओर इशारा करते हुए वृद्ध ने कहा, 'यहां से अनाज ले लें।' अधिकारियों ने कहा, 'इस खेत से ज्यादा अनाज तो उस खेत में था, जिसे हम पीछे छोड़ आए।' बूढ़े ने कहा, 'आप ठीक कहते हैं, लेकिन वह खेत मेरा नहीं था। दूसरे के अन्न पर मेरा कोई हक नहीं है। उसे किसी और को देने का मुझे अधिकार नहीं। यह खेत मेरा है। इसका अन्न मैं किसी को भी दे सकता हूं।' अधिकारी अवाक् रह गए।

A Letter to Every Indian - APJ

The Ex - President of India DR. A. P. J. Abdul Kalam 's Speech in Hyderabad .

Why is the media here so negative?

Why are we in India so embarrassed to recognize our own strengths, our achievements?

We are such a great nation. We have so many amazing success stories but we refuse to acknowledge them. Why?

We are the first in milk production.

We are number one in Remote sensing satellites.

We are the second largest producer of wheat.

We are the second largest producer of rice.

Look at Dr. Sudarshan , he has transferred the tribal village into a self-sustaining, self-driving unit. There are millions of such achievements but our media is only obsessed in the bad news and failures and disasters.

I was in Tel Aviv once and I was reading the Israeli newspaper. It was the day after a lot of attacks and bombardments and deaths had taken place. The Hamas had struck... But the front page of the newspaper had the picture of a Jewish gentleman who in five years had transformed his desert into an orchid and a granary.. It was this inspiring picture that everyone woke up to. The gory details of killings, bombardments, deaths, were inside in the newspaper, buried among other news.

In India we only read about death, sickness, terrorism, crime.. Why are we so NEGATIVE?

Another question:

Why are we, as a nation so obsessed with foreign things?

We want foreign T.Vs, we want foreign shirts. We want foreign technology. Why this obsession with everything imported. Do we not realize that self-respect comes with self-reliance? I was in Hyderabad giving this lecture, when a 14 year old girl asked me for my autograph. I asked her what her goal in life is. She replied: I want to live in a developed India . For her, you and I will have to build this developed India . You must proclaim. India is not an under-developed nation; it is a highly developed nation.

Do you have 10 minutes?

Allow me to come back with a vengeance.

Got 10 minutes for your country? If yes, then read; otherwise, choice is yours.


YOU say that our government is inefficient.

YOU say that our laws are too old.

YOU say that the municipality does not pick up the garbage.

YOU say that the phones don't work, the railways are a joke. The airline is the worst in the world, mails never reach their destination.

YOU say that our country has been fed to the dogs and is the absolute pits.

YOU say, say and say. What do YOU do about

Take a person on his way to Singapore. Give him a name - 'YOURS'. Give him a face - 'YOURS'. YOU walk out of the airport and you are at your International best. In Singapore you don't throw cigarette butts on the roads or eat in the stores. YOU are as proud of their Underground links as they are. You pay $5 (approx. Rs. 60) to drive through Orchard Road (equivalent of Mahim Causeway or Pedder Road) between 5 PM and 8 PM. YOU come back to the parking lot to punch your parking ticket if you have over stayed in a restaurant or a shopping mall irrespective of your status identity… In Singapore you don't say anything, DO YOU? YOU wouldn't dare to eat in public during Ramadan, in Dubai . YOU would not dare to go out without your head covered in Jeddah.

YOU would not dare to buy an employee of the telephone exchange in London at 10 pounds (Rs.650) a month to, 'see to it that my STD and ISD calls are billed to someone else.'YOU would not dare to speed beyond 55 mph (88 km/h) in Washington and then tell the traffic cop, 'Jaanta hai main kaun hoon (Do you know who I am?). I am so and so's son. Take your two bucks and get lost.' YOU wouldn't chuck an empty coconut shell anywhere other than the garbage pail on the beaches in Australia and New Zealand .

Why don't YOU spit Paan on the streets of Tokyo? Why don't YOU use examination jockeys or buy fake certificates in Boston??? We are still talking of the same YOU. YOU who can respect and conform to a foreign system in other countries but cannot in your own. You who will throw papers and cigarettes on the road the moment you touch Indian ground. If you can be an involved and appreciative citizen in an alien country, why cannot you be the same here in India?

In America every dog owner has to clean up after his pet has done the job. Same in Japan.

Will the Indian citizen do that here?' He's right. We go to the polls to choose a government and after that forfeit all responsibility.

We sit back wanting to be pampered and expect the government to do everything for us whilst our contribution is totally negative. We expect the government to clean up but we are not going to stop chucking garbage all over the place nor are we going to stop to pick a up a stray piece of paper and throw it in the bin. We expect the railways to provide clean bathrooms but we are not going to learn the proper use of bathrooms.

We want Indian Airlines and Air India to provide the best of food and toiletries but we are not going to stop pilfering at the least opportunity.

This applies even to the staff who is known not to pass on the service to the public.

When it comes to burning social issues like those related to women, dowry, girl child! and others, we make loud drawing room protestations and continue to do the reverse at home. Our excuse? 'It's the whole system which has to change, how will it matter if I alone forego my sons' rights to a dowry.' So who's going to change the system?

What does a system consist of? Very conveniently for us it consists of our neighbours, other households, other cities, other communities and the government. But definitely not me and YOU. When it comes to us actually making a positive contribution to the system we lock ourselves along with our families into a safe cocoon and look into the distance at countries far away and wait for a Mr.Clean to come along & work miracles for us with a majestic sweep of his hand or we leave the country and run away.

Like lazy cowards hounded by our fears we run to America to bask in their glory and praise their system. When New York becomes insecure we run to England . When England experiences unemployment, we take the next flight out to the Gulf. When the Gulf is war struck, we demand to be rescued and brought home by the Indian government. Everybody is out to abuse and rape the country. Nobody thinks of feeding the system. Our conscience is mortgaged to money.

Dear Indians, The article is highly thought inductive, calls for a great deal of introspection and pricks one's conscience too…. I am echoing J. F. Kennedy's words to his fellow Americans to relate to Indians…..

'ASK WHAT WE CAN DO FOR INDIA AND DO WHAT HAS TO BE DONE TO MAKE INDIA WHAT AMERICA AND OTHER WESTERN COUNTRIES ARE TODAY'

Lets do what India needs from us.

Are our politicians qualified to lead us?

What qualifies our politicians to lead us? What credentials do they need to possess that allow us to hand over the running of the country to them? Unlike business organizations, where one reaches the top only after having gone through the grind and performed different roles, a politician can find himself or herself suddenly running a ministry with no prior experience of that field or for that matter of administration whatsoever.

A successful politician is good at something that is entirely unrelated to dealing with complex policy questions. An extreme example of this is of course that of Rabri Devi, who was thrust into a position of power through no fault of her own. The truth is that in most cases our leaders have no real right to take the decisions that they do, given their levels of competence. And particularly in a complex post-globalisation world, where one needs to account for a very large number of variables, this lack of credentials can be potentially devastating for a country.

But is the truth quite that simple? Do credentials really matter that much? What credentials does Sonia Gandhi, and Rajiv Gandhi before her, have to preside over the Congress? Growing up in Italy, could she have imagined the role she has ended up playing in a country she had absolutely no connections with? And regardless of whether you agree with her brand of politics and leadership or not, it is clear that she is today a credible leader of India’s largest political organization. Nothing in her education, background or perhaps even temperament prepared her for this job. The absence of credentials is glaring in the case of Barack Obama too; as a first-time Senator from Illinois, a state that seems to specialize in corrupt politicians, he has no reason to be running the world’s most powerful country. In a certain sense, one could argue that no job can prepare you for a job like that in any case.

Politicians across the world have no real qualifications to be in charge of our lives. We could argue that the world is in a bit of a mess precisely because of this. But then, one would be forced to look at the much vaunted, highly qualified and ridiculously paid chief executives of various large corporations in the West and ask if making stupid mistakes and remaining unrepentant is the exclusive preserve of politicians alone. It does seem that education and prior qualifications do not necessarily translate into effectiveness.

The much reviled dynastic urge in politics is not so reviled in business where we look upon inheritance much more benignly. So, we have young men and women, who may or not be remotely qualified or even interested being pitchforked into roles that carry huge responsibilities after a token stint of getting one’s hands dirty and starting from the bottom that usually lasts a couple of years. The surprising thing is that the failure rate of family succession does not seem to be that much higher than that of a professionally managed company. In India, we have enough examples of the contrary, where the second generation has in fact taken the business to a new orbit. For that matter, even if we take companies like Google and Facebook, we see that they are being run by the founders, who might have expertize in thinking up new algorithms but had no clue about how to run huge corporations and yet they seem to be doing just fine.

Could it be that the idea of competence is in part a device used to determine who gets to leadership positions when there are no other means available to figure this out? So when it is possible to either elect people through voting ^ as is the case with politicians ^ or with lineage ^ as is the case with family business ^ we rely on these methods. When such universally transparent and culturally incontrovertible methods are not available or seem inappropriate, we turn to an invented system based on notions of competence and capability.

If that be the case, then the idea of credentials and qualifications may actually limit the potential of human beings by falsely convincing them about what they can or cannot do. A Sonia Gandhi has turned out to be a credible leader of a huge completely alien political organization simply because she got the opportunity. She found some hidden reservoir of skills and learnt on the job. A young business scion is able to imagine possibilities that a bright management trainee cannot simply because he does not possess that vantage point. Of course, that is not to argue that qualifications do not matter at all, but merely that they are one of the several legitimate ways of determining capability.

What certainly does matter is opportunity. We are capable of much more than we are allowed to be and what we allow ourselves to be. We are all perhaps capable of doing something magnificent if only we had the opportunity. The difference between the seemingly capable and the apparently unsuitable may be much lower than we have imagined so far. Nothing prepared a Mahendra Singh Dhoni, adept at throwing wood at leather, to lead a diverse bunch of fractious egotistic celebrities under the intense scrutiny of a billion crazed fans with such effortless ease. There is a lesson in this and you won’t find it in any textbook.

फीस पर परेशान-सा है यहां हर शख्स

जब भी किसी मुद्दे पर कोई फैसला होता है तो उसमें ऐसा कभी नहीं होता कि सभी पक्ष नाराज़ हो जाएं। एक पक्ष खुश होता है तो दूसरा नाखुश, लेकिन दिल्ली में स्कूलों की फीस के मुद्दे पर हर शख्स परेशान-सा है। खासतौर पर पैरंट्स हैरान-परेशान हैं। वे अपने आपको एक चक्रव्यूह में फंसा महसूस कर रहे हैं। ऐसा चक्रव्यूह जिससे निकल पाने का कोई रास्ता उन्हें नहीं सूझ रहा। इस चक्रव्यूह में उन्होंने अपने आप प्रवेश नहीं किया, लेकिन कोई कसूर न होते हुए भी वे सजा पाने को मजबूर हैं।

छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद से ही वे हताश हैं। हालांकि सरकार ने उन्हें समय-समय पर साथ होने का सब्जबाग दिखाया लेकिन यह साथ केवल कागजी स्तर पर ही नजर आ रहा है, क्योंकि इस लड़ाई में वे अपने आपको बेहद अकेला महसूस कर रहे हैं। वेतन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद पब्लिक स्कूलों की ओर से टीचर्स के वेतन के अनुसार फीस में भी बढ़ोतरी की बातें शुरू हो गई थीं। दिल्ली सरकार ने तय किया कि फीस मनमर्जी के मुताबिक बढ़ाने नहीं दी जाएगी। इसके बाद सरकार ने फीस बढ़ोतरी पर एक कमिटी का गठन कर दिया. कमिटी की रिपोर्ट आई कि स्कूल 500 रुपये मासिक तक ट्यूशन फीस बढ़ा सकते हैं। स्कूलों का वगीर्करण भी कर दिया गया। यह फीस पिछले साल सितंबर से बढ़ाने की अनुमति दे दी गई यानी सात महीने की फीस और 2006 से अदा की जाने वाली टीचर्स की सैलरी का एरियर भी पैरंट्स के जिम्मे आ गया। यह एरियर तीन किस्तों में देने की बात कही गई।

दिल्ली में भले ही सरकारी स्कूलों का बोर्ड एग्जाम का रिजल्ट दिन दूनी-रात चौगुनी तरक्की कर रहा हो, लेकिन सचाई यही है कि आज भी पैरंट्स पब्लिक स्कूलों को ही तरजीह देते हैं। शिक्षा मंत्री हों, शिक्षा निदेशक या अन्य कोई प्रभावशाली व्यक्ति, किसी का भी बच्चा सरकारी स्कूल का स्टूडेंट नहीं है। दिल्ली के 2,000 से ज्यादा पब्लिक स्कूल एजुकेशन सिस्टम में सरकार का सहयोग तो कर रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि ज्यादातर स्कूल सिर्फ दुकानें बनकर रह गए हैं। इन स्कूल मालिकों का सीधा-सा तर्क है कि डीटीसी के बजाय अगर आपको एसी कैब में सफर करना है तो किराया अधिक देना ही होगा।

लिहाजा आज न तो स्कूल संतुष्ट हैं, न टीचर और न ही पैरंट्स। तीन चौथाई पब्लिक स्कूल ऐसे हैं जो टीचर्स को पूरा वेतन देते ही नहीं। केवल कागजों में पूरा वेतन दिया जाता है और अब कागजों में ही वेतन भी बढ़ा दिया जाएगा। जाहिर है कि इन स्कूलों के टीचर केवल मन मसोसकर बैठे हैं। बाकी एक चौथाई स्कूल ऐसे हैं जिन्हें यह लग रहा है कि सरकार ने जितना वेतन बढ़ाने की इजाजत दी है, वह पर्याप्त नहीं है। वे इस आदेश के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी में हैं। पैरंट्स इस बोझ को सहने की स्थिति में नहीं हैं।

सरकार ने पैरंट्स से कहा कि आपको कोई ऐतराज है तो शिकायत करो। जिसका बच्चा स्कूल में पढ़ रहा है, वह शिकायत का जोखिम कैसे उठा सकता है। कुछ पैरंट्स ने हिम्मत दिखाई और शिकायत की लेकिन आज तक एक भी स्कूल के खिलाफ कोई कार्रवाई की सूचना नहीं है। स्कूलों ने बोर्ड एग्जाम के एडमिट कार्ड देने के नाम पर भी ब्लैकमेलिंग की और नतीजे आने पर भी इसी प्रकार का रवैया होगा। स्कूल नए सेशन में फिर फीस बढ़ाने पर आमादा हैं और उनका यह भी तर्क है कि सरकार कानूनन इससे रोक ही नहीं सकती।

इस मामले में सरकार को जमीनी कार्रवाई करनी चाहिए थी। स्कूल मैनेजमेंट, टीचर और पैरंट्स तीनों पक्षों को एक साथ बैठाकर कोई ऐसा हल तलाश करना चाहिए था ताकि कोई भी अपने आपको ठगा-सा महसूस न करे। जब तक दिमागी तौर पर यह बात साफ नहीं होगी कि स्कूल शिक्षा की दुकान नहीं हैं और शिक्षा मुहैया कराना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है, तब तक इस चक्रव्यूह से नहीं निकला जा सकता। खासतौर पर चुनावी माहौल में सभी पक्षों को संतुष्ट करना और भी जरूरी है।

इस शहर का हर पेड़ बीमार-सा क्यों है

15 सितंबर 2008 की रात। बाबा खड़क सिंह मार्ग पर रात 10 बजे सन्नाटा छा जाता है। इस सन्नाटे को तोड़ा एक जोरदार धमाके जैसी आवाज ने। आसपास के लोग भौचक्के रह गए। डीआईजेड एरिया के सरकारी फ्लैट्स में रहने वाले बाहर निकले तो पता चला कि सड़क किनारे खड़ा एक पेड़ अचानक ही धराशायी हो गया है। जब इस नीम के पेड़ की मौत हुई तो उसके नीचे एक कार खड़ी थी। पेड़ धड़ाम से कार पर ही गिरा। कार पूरी तरह पिचक गई। गनीमत रही कि उस समय कार में कोई नहीं था। लोगों में चर्चा हुई कि नीम के इस हरे-भरे पेड़ को अचानक क्या हुआ कि वह अनायास मौत का ग्रास बन गया।

दरअसल, राजधानी में कंक्रीट का जंगल हरियाली को निगल रहा है और यह पेड़ भी कंक्रीट के दानव का शिकार बन गया। क्या आप जानते हैं कि हर पेड़ के चारों तरफ कम से कम छह फुट जगह अवश्य छोड़ी जानी चाहिए, लेकिन अधिकतर स्थानों पर इस नियम पर अमल नहीं किया जाता। एनडीएमसी ने अपने बजट में ट्री एंबुलेंस बनाने की घोषणा की है। यह एंबुलेंस बीमार और क्षतिग्रस्त पेड़ों की रक्षा करेगी। लेकिन वास्तव में एनडीएमसी इलाके के 95 हजार पेड़ों की क्या हालत है या उन्हें बचाने के लिए क्या किया जा रहा है, इस सवाल का जवाब आरटीआई से जानने की कोशिश की गई। आरटीआई एक्टिविस्ट देवाशीष भट्टाचार्य को जो जवाब मिले हैं, वह काफी चौंकाने वाले भी हैं और यह भी पता चलता है कि हॉर्टिकल्चर विभाग के पास पेड़ों को बचाने का कोई साधन नहीं है। यही नहीं, जहां विभाग के अधिकारी पेड़ बचाना भी चाहते हैं, वहां उनकी चलती ही नहीं है।

जिस पेड़ का ऊपर जिक्र किया गया है, एनडीएमसी ने माना है कि उसे कोई बीमारी नहीं थी। हालांकि विभाग का दावा है कि उसके कर्मचारी पेड़ों की बाकायदा निगरानी करते हैं लेकिन इसकी कोई अवधि तय नहीं है। इस नीम के पेड़ के किसी तरह बीमार या क्षतिग्रस्त होने की सूचना भी उनके पास नहीं थी। ऐसे में उस पर किसी कीटनाशक के छिड़काव की जरूरत भी महसूस नहीं की गई। जाहिर है हॉर्टिकल्चर विभाग इस पेड़ की मौत का कारण नहीं जानता और न ही इसके लिए किसी को दोषी मानता है।

एनडीएमसी क्षेत्र में तेज हवा के चलते ही अचानक पेड़ों के गिरने की घटनाएं बढ़ गई हैं। पिछले तीन सालों में करीब तीन सौ पेड़ अचानक ही मौत का शिकार हो गए हैं। इनमें से अधिकतर ब्रिटिश काल के हैं और उन्हें सड़क किनारे प्लान करके रोपा गया था। ऐसे पेड़ों को बनाए रखने की जिम्मेदारी हॉर्टिकल्चर विभाग की ही होती है लेकिन उनके आसपास फुटपाथ बनाकर उसकी जड़ों में हवा-पानी जाने का रास्ता बंद कर दिया जाता है। विभाग ने आरटीआई के जवाब में माना है कि प्रत्येक पेड़ के आसपास 6-6 फुट की जगह खाली छोड़ी जानी चाहिए।

इस तरह के निर्देश भी जारी किए जाते हैं लेकिन विभाग ने माना है कि कई बार ठेकेदार पेड़ों की जान की परवाह नहीं करते। जाहिर है कि ठेकेदार को प्रति वर्ग फुट के हिसाब से कंक्रीट बिछाने का ठेका मिलता है और वह इस नियम की परवाह नहीं करता। अधिकारी भी आंखें मूंद लेते हैं। वैसे, विभाग ने दावा किया है कि जब ऐसी कोई शिकायत सामने आती है तो संबंधित एंजीनियर को बताया जाता है। जनता से भी अनुरोध किया गया है कि वे जब ऐसा होता देखें तो विभाग को सूचित करें। क्या इस पेड़ की जगह कोई नया पौधा रोपा गया तो विभाग का जवाब है कि अगले महीने यानी मार्च में रोपा जाएगा।

पॉलिथीन पर बैन, हो पालन तो मिले चैन

भले ही यह हाई कोर्ट के निर्देश पर मुमकिन हो पाया हो, लेकिन पर्यावरणविद् अब दिल्ली में पॉलिथीन की थैलियों पर प्रतिबंध की कवायद से खुश हैं। उन्हें उम्मीद है कि अब पर्यावरण को पॉलिथीन जैसे राक्षस से मुक्ति मिल सकेगी। दिल्ली वाले फिर से कपड़े के थैले, जूट बैग या कागज के लिफाफों की ओर लौट आएंगे। अब पॉलिथीन से वातावरण का प्रदूषण तो कम होगा ही, सीवर-नाले इन थैलियों से जाम नहीं होंगे। गाय और दूसरे जानवर इन थैलियों को निगलकर मौत के मुंह में नहीं जाएंगे।

सुखद स्थिति की कल्पना से संतोष तो होता है लेकिन शंकाएं भी कम नहीं हैं। ऐसे कितने फैसले हैं जिन पर पूरी तरह अमल हो पाता है? पॉलिथीन की थैलियों पर रोक तो पहले से ही है। पहले भी नोटिफिकेशन हो चुका है, जिसमें कहा गया था कि 40 माइक्रोन से पतली थैली का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। ऐसा करने पर पांच साल की कैद या एक लाख रुपया जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं। इस बार जारी नोटिफिकेशन में 40 माइक्रोन की शर्त हटा दी गई है। अगर शाब्दिक अर्थ निकाला जाए तो पॉलिथीन की थैलियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जा रहा है, लेकिन सरकार इस बारे में खुद भी असमंजस में है।

पर्यावरण विभाग के अफसर इस बारे में बात करने से कतराते हैं। दरअसल सरकार के पास ऐसा कोई यंत्र नहीं है जो यह बता सके कि फलां पॉलिथीन बैग की मोटाई 40 माइक्रोन है या नहीं। यह ठीक वैसा ही है जैसे कार के शीशों की पारदर्शिता की सीमा तो तय कर दी गई लेकिन कोई मापक यंत्र ही मौजूद नहीं था या ट्रांसपोर्ट विभाग के पास यह जानने के लिए कोई मशीन नहीं है कि किसी वाहन की आरसी (रजिस्ट्रेशन) नकली है या असली या सड़कों पर पल्यूशन की जांच के लिए न अफसर हैं और न ही मशीनरी।

यह फैसला जल्दबाजी में लागू करने की बजाय सरकार को एक कार्ययोजना अवश्य तय करनी होगी। अगर पॉलिथीन से छुटकारा पाना है तो विकल्प भी पेश करना होगा। पॉलिथीन की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण यह है कि इसकी लागत तो कम है ही, यह मजबूत और सुविधाजनक भी रहता है। इसलिए गारमंट हो या फिर कोई ठोस सामान, यहां तक कि लिक्विड के लिए भी पॉलिथीन ही प्रयोग में लाया जाता है। कपड़े, जूट के बैग या इको फ्रेंडली पेपर बैग एक सीमा तक ही विकल्प बन सकते हैं क्योंकि न तो ये सभी जरूरतें पूरी कर पाएंगे और न ही लागत के हिसाब से पॉलिथीन जितने सस्ते होंगे। सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए इस क्षेत्र में सब्सिडी और अन्य सुविधाएं जुटानी होंगी।

विकल्पों की तलाश के लिए हिमाचल और गोवा जैसे उन राज्यों की ओर भी देखना होगा जो पॉलिथीन पर प्रतिबंध जैसा कड़ा फैसला ले चुके हैं। सरकार को पॉलिथीन पर प्रतिबंध ऐसा फैसला बनाना होगा, जिस पर अमल होता है। ऐसा फैसला नहीं जैसे 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को सिगरेट नहीं मिलेगी या 14 साल के कम उम्र के बच्चों से घरों-ढाबों में काम नहीं कराया जा सकेगा या ऑटो रिक्शा में तीन से ज्यादा सवारियां नहीं बैठेंगी। इन नियमों को तो इधर-उधर कहीं भी टूटते देखा जा सकता है।

दिल्ली-6 की गलियों में कैसे मटके मसककली

क्या आपने दिल्ली-6 देखी है? जी नहीं, मैं फिल्म की बात नहीं कर रहा बल्कि मैं बात कर रहा हूं पुरानी दिल्ली की। उस दिल्ली की जो अपने आप में विरासत का वैभव और इतिहास का गौरव समेटे हुए है। आज उस दिल्ली का हाल यूं है कि कंधे से कंधा टकराकर चलना भी आसान नहीं है। चारों तरफ अवैध कब्जों की भरमार है और वहां से फुर्र करके निकल भागने की इच्छा होती है। यही वजह है कि पुरानी दिल्ली के अधिकतर गली-कूचे अब दुकानों में बदल गए हैं। वहां रिहायश लगातार कम होती जा रही है। इन गली-कूचों की कम होती आबादी की वजह ही थी कि अब चांदनी चौक संसदीय क्षेत्र शालीमार बाग तक जा पहुंचा है।

बात केवल चांदनी चौक की ही नहीं है। पूरी दिल्ली की भीड़-भाड़ अब ऐसे मुकाम पर आ पहुंची है कि दिल्ली की रवानगी पर भी विराम लगने की आशंका पैदा होने लगी है। यह रिपोर्ट चौंकाती नहीं है कि अगले दो सालों में राजधानी की सड़कों पर आप एक घंटे में केवल 6-7 किमी ही चल पाएंगे। दिल्ली की आबादी के साथ ही बढ़ती जा रही है वाहनों की तादाद और उससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि हमारी पूरी व्यवस्था इस सचाई से आंखें मूंदे हुए है। दिल्ली की तुलना अन्य बड़े शहरों से करें तो लगता है कि अब कुछ न करने का समय आ गया है। राजधानी की आबादी 1.70 करोड़ के करीब है जबकि दिल्ली का कुल एरिया है 1483 वर्ग किमी। न्यू यार्क का एरिया है 17, 400 वर्ग किमी और उसकी आबादी है 1.89 करोड़। इसी तरह सबसे ज्यादा भीड़-भाड़ वाले महानगर तोक्यो पर नजर डालें तो उसकी आबादी है 1.27 करोड़ और एरिया है 2187 वर्ग किमी। अब बताइए कि दिल्ली को लेकर चिंता हुई या नहीं।

यह सच है कि किसी को दिल्ली आकर बसने से रोका नहीं जा सकता। यह संभव भी नहीं है लेकिन सरकार को ऐसी नीतियां अवश्य बनानी होंगी कि एक तरफ तो जहां दिल्ली को ग्रेटर दिल्ली का रूप मिले, वहीं दिल्ली की आबादी बढ़ने से रोकी जा सके। यह सवाल अब हाई कोर्ट के सामने विचाराधीन है कि अगर डीडीए अपनी किसी हाउसिंग स्कीम की घोषणा करता है तो वह केवल दिल्ली वालों के लिए ही हो। हाल ही में डीडीए घोटाला इसीलिए संभव हो पाया कि राजधानी में अनुसूचित जनजाति की आबादी नहीं है और साढ़े 7 फीसदी फ्लैट रिजर्व करना उसकी संवैधानिक मजबूरी थी। जो व्यक्ति डीडीए का फ्लैट लेगा, वह दिल्ली आकर बसेगा। डीयू को ही देख लें। हर साल उसकी 35 हजार सीटों में से 15 हजार दिल्ली से बाहर के स्टूडेंट को मिल जाती हैं। डीयू सेंट्रल यूनिवर्सिटी है और उसमें एडमिशन के अधिकार से किसी को वंचित नहीं रखा जा सकता। जब डीयू में एडमिशन होगा तो स्टूडेंट दिल्ली आकर रहेंगे ही।

इस सवाल को कभी गंभीरता से नहीं लिया जाता क्योंकि इस बारे में व्यक्त किया गया कोई भी नजरिया राजनीतिक चश्मे से ही देखा जाता है - चाहे उपराज्यपाल यह बात कहें या फिर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित। समस्या की गहराई और दिल्ली को बचाने की ललक किसी में दिखाई नहीं देती। दिल्ली की भीड़ कम करने के कई तरीके सुझाए जाते हैं - ऑफिस दिल्ली के आसपास हों, थोक बाजारों को राजधानी की सीमाओं के बाहर रखा जाए, सड़कों की भीड़ कम करने के लिए पेरिफेरल रोड बनाए जाएं आदि-आदि। इस सुझावों पर अमल के लिए कभी भी इच्छाशक्ति नहीं दिखाई जाती। दरअसल उसी इच्छाशक्ति की जरूरत है और साथ ही यह भी तय करना जरूरी है कि अगर आप दिल्ली से प्यार करते हैं तो इस मसले को राजनीति से दूर रखें। तभी दिल्ली-6 का गौरव भी लौट सकेगा और सभी दिल्ली पर गर्व भी कर सकेंगे।

HANS AND OWL

एक बार स्वामी विवेकानंद अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में व्याख्यान दे रहे थे। उसमें बड़ी संख्या में छात्र, अध्यापक और विभिन्न विषयों के विद्वान मौजूद थे, जो बड़ी उत्सुकता से स्वामी जी को सुन रहे थे। स्वामी जी के भाषण का मुख्य विषय था- भारतीय संस्कृति तथा अध्यात्म का रहस्य।

स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति तथा धर्म के सभी तत्वों का वैज्ञानिक महत्व भी है, इसलिए संस्कृति तथा अध्यात्म को वैज्ञानिकता से जोड़ कर देखा जाता है। यह सुनकर एक अमेरिकी व्यक्ति उनके भाषण में दखल देते हुए बीच में उठकर बोला, 'वास्तव में आपकी संस्कृति महान है तभी तो आपके यहां देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू बताया गया है, जिसे दिन में दिखाई भी नहीं देता। अब जरा बताइए कि उल्लू को देवी लक्ष्मी का वाहन बताने के पीछे क्या वैज्ञानिक तर्क है?'

उस व्यक्ति का प्रश्न सुनकर स्वामी जी अत्यंत सहजतापूर्वक बोले, 'पश्चिमी देशों की तरह भारत में धन को ही सब कुछ नहीं माना गया है। इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने चेतावनी दी है कि लक्ष्मी रूपी धन के असीमित मात्रा में पास आते ही मनुष्य आंखें होते हुए भी उल्लू की तरह अंधा हो जाता है। इसी का संकेत देने के लिए लक्ष्मी का वाहन 'उल्लू' बताया गया है और इसके पीछे यही वैज्ञानिक तर्क है।' स्वामी जी के इस जवाब पर सभी वाह-वाह कर उठे।

इसके बाद स्वामी जी फिर बोले, 'सरस्वती ज्ञान और विज्ञान की प्रतीक है। यह मानव का विवेक जागृत करने वाली देवी है इसलिए सरस्वती का वाहन हंस बताया गया है, जो नीर-क्षीर विवेक का प्रतीक है। इसलिए अब आप यह भलीभांति समझ गए होंगे कि संस्कृति व धर्म के सभी तत्वों के पीछे वैज्ञानिक तर्क छिपे हुए हैं।' वहां उपस्थित सभी लोगों के साथ ही वह व्यक्ति भी देवी-देवताओं के वाहनों की यह अवधारणा सुनकर स्वामी जी के प्रति नतमस्तक हो गया और उस दिन से भारतीय संस्कृति का प्रशंसक बन गया ।

Ten Interviewing Rules

In the current job market, you'd better have your act together, or you won't stand a chance against the competition. Check yourself on these 10 basic points before you go on that all-important interview.

Look Sharp

Before the interview, select your outfit. Depending on the industry and position, get out your best duds and check them over for spots and wrinkles. Even if the company has a casual environment, you don't want to look like you slept in your clothes. Above all, dress for confidence. If you feel good, others will respond to you accordingly.

Be on Time

Never arrive late to an interview. Allow extra time to arrive early in the vicinity, allowing for factors like getting lost. Enter the building 10 to 15 minutes before the interview.

Do Your Research

Researching the company before the interview and learning as much as possible about its services, products, customers and competition will give you an edge in understanding and addressing the company's needs. The more you know about the company and what it stands for, the better chance you have of selling yourself. You also should find out about the company’s culture to gain insight into your potential happiness on the job.

Be Prepared

Bring along a folder containing extra copies of your resume, a copy of your references and paper to take notes. You should also have questions prepared to ask at the end of the interview. For extra assurance, print a copy interview take-along checklist.

Show Enthusiasm

A firm handshake and plenty of eye contact demonstrate confidence. Speak distinctly in a confident voice, even though you may feel shaky.

Listen

One of the most neglected interviewing skills is listening. Make sure you are not only listening, but also reading between the lines. Sometimes what is not said is just as important as what is said.

Answer the Question Asked

Candidates often don't think about whether or not they actually are answering the questions asked by their interviewers. Make sure you understand what is being asked, and get further clarification if you are unsure.

Give Specific Examples

One specific example of your background is worth 50 vague stories. Prepare your stories before the interview. Give examples that highlight your successes and uniqueness. Your past behavior can indicate your future performance.

Ask Questions

Many interviewees don't ask questions and miss the opportunity to find out valuable information. Your questions indicate your interest in the company or job.

Follow Up

Whether it's through email or regular mail, the follow-up is one more chance to remind the interviewer of all the valuable traits you bring to the job and company. You don't want to miss this last chance to market yourself.

It is important to appear confident and cool for the interview. One way to do that is to be prepared to the best of your ability. There is no way to predict what an interview holds, but by following these important rules you will feel less anxious and will be ready to positively present yourself.

राजा का त्याग

एक बार काशी नरेश ने कोसल पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। कोसल के राजा ने आत्मसमर्पण नहीं किया और वहां से पलायन कर गए। कोसल की प्रजा अपने राजा के जाने से अत्यंत दुखी थी और उन्हें हमेशा याद करती रहती थी। काशी नरेश को यह सहन नहीं हुआ। उन्होंने घोषणा की कि जो कोई भी कोसल के पराजित राजा को जीवित पकड़कर उनके सामने लाएगा, उसे पर्याप्त धन दिया जाएगा और कोसल का मंत्री नियुक्त कर दिया जाएगा।

इस घोषणा का प्रजा पर कोई असर नहीं पड़ा। उधर कोसल के राजा जंगलों में भटक रहे थे। एक दिन उनकी मुलाकात एक भिखारी जैसे व्यक्ति से हुई। राजा ने उसका परिचय पूछा तो वह बोला, 'मैं बहुत बड़ा व्यापारी था मगर मेरा जहाज पानी में डूब गया, जिससे मेरा सारा माल बह गया और मैं दाने-दाने को मोहताज हो गया हूं। अब मैं कोसल के राजा के पास मदद मांगने जा रहा हूं।' यह सुनकर राजा अत्यंत द्रवित हो गए।

उन्हें काशी नरेश की घोषणा का पता चल गया था,सो उन्होंने इस व्यक्ति की सहायता की एक योजना बनाई। वह उसे लेकर कोसल पहुंचे और वहां काशी नरेश से बोले, 'मैं कोसल का राजा तुम्हारे सामने हूं। अब तुम मुझे पकड़ लो और अपनी घोषणा के अनुसार इस व्यक्ति को मंत्री पद और धनराशि दे दो।' काशी नरेश कोसल के राजा को हतप्रभ देखते रह गए। कुछ देर बाद वह सिंहासन से उतर कर राजा के चरणों में गिरकर क्षमा मांगते हुए बोले, 'महाराज, मुझे क्षमा करें, जो राजा प्रजा के बीच लोकप्रिय हो, अत्यंत निर्भय हो, मौत से भी न डरे और अपनी जान पर खेलकर दूसरों की मदद के लिए सदैव तैयार रहे उसे मैं तो क्या, कोई भी पराजित नहीं कर सकता।' यह कहकर उन्होंने कोसल के राजा का हाथ पकड़कर उन्हें ससम्मान सिंहासन पर बिठा दिया और चले गए ।

इश्वर की संतान !

किसी गांव में एक वृद्ध व्यक्ति अपनी झोपड़ी के सामने बैठा जूते बना रहा था। तभी वहां गेरुआ वस्त्र पहने एक संत उसके पास आए और बोले, बाबा, बहुत दूर से चल कर आ रहा हूं। मुझे बहुत तेज प्यास लगी है। क्या पीने को पानी मिलेगा? वृद्ध व्यक्ति की आंखें आश्चर्य से उन्हें देखती रह गईं। उसे संत के वचनों पर विश्वास नहीं हो रहा था। वह असमंजस में पड़ गया कि संत को आखिर क्या उत्तर दे? संत समझ गए कि यह व्यक्ति द्वंद्व में फंस गया है। कुछ उत्तर न मिलते देख उन्होंने फिर कहा, बाबा, अगर पानी नहीं हो तो किसी दूसरे स्थान पर जाकर अपनी प्यास बुझाऊं। वृद्ध हाथ जोड़कर बोला, स्वामी जी, आप स्वयं देख रहे हैं कि मैं जूते बना रहा हूं। क्या मेरे हाथ का दिया जल ग्रहण कर सकेंगे। गांव के लोग मेरे दिए जल को पीना तो दूर, छूना भी स्वीकार नहीं करते।

वृद्ध की बात सुनकर संत ठहाका लगाकर हंस पड़े। संत के इस तरह हंसने से वृद्ध और भी ज्यादा डर गया। लेकिन दूसरे ही क्षण स्वामी जी शांत भाव से बोले, यह तो मैं अपनी खुली आंखों से देख ही रहा हूं। लेकिन मुझे इससे कोई सरोकार नहीं। तुम मुझे खुशी-खुशी जल पिलाओ। यदि तुम्हें कोई आपत्ति न हो तो मैं भोजन भी तुम्हारे घर करूंगा। स्वामी जी की बात सुनकर वृद्ध व्यक्ति के आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही। वह नतमस्तक हो गया।

स्वामी जी ने वृद्ध की मानसिक उद्विग्नता को शांत करते हुए कहा, इस धरती पर कोई छोटा-बड़ा नहीं है। हम सब एक ही ईश्वर की संतान है। उस ईश्वर का अंश प्रत्येक जीव में विद्यमान है। जो ईश्वर की संतान को छोटा और हीन समझता है, उससे घृणा करता है, उसे ईश्वर भी उसी तरह देखते हैं और वैसा ही व्यवहार करते हैं। स्वामी जी ने उस वृद्ध व्यक्ति के घर पानी ही नहीं पिया, वरन प्रेम पूर्वक भोजन भी ग्रहण किया। वह स्वामी थे विवेकानंद।

सिकंदर को सबक

बात उस समय की है कि जब सिकंदर विश्व को जीतने के अभियान पर निकला था। अपनी सेनाओं के साथ एक-एक कर उसने कई शहर रौंद डाले। उसे सफलता मिलती गई, उसका आत्मविश्वास बढ़ता गया।

एक बार किसी नगर में लड़ते-लड़ते जब वह थक गया तो एक घर के सामने उसने घोड़ा रोका। दरवाजा खटखटाने पर एक बुढ़िया ने दरवाजा खोला। सिकंदर ने कहा, 'मुझे जोर की भूख लगी है। खाना दो।' बुढि़या ने सिकंदर को पहचान लिया और अंदर चली गई। कुछ देर बाद वह एक थाल लेकर आई जिस पर कपड़ा ढका था। सिकंदर ने कपड़ा हटाया तो देखा, खाने की जगह जेवर रखे हैं। उसने कहा, 'मैंने खाना मांगा था। जेवर तो मैं खा नहीं सकता।'

इस पर बुढ़िया बोली, 'तुम्हारी भूख रोटियों से मिट जाती तो तुम यहां क्यों आते। तुम्हारे देश में तो रोटियां हैं ही। तुम्हें तो सोने की भूख है।' बुढ़िया की बात सुनकर सिकंदर बिना लड़े वापस चला गया। जाते-जाते उसने नगर के मुख्य रास्ते पर शिलालेख लगवाया जिस पर लिखा था, 'अज्ञानी सिकंदर को इस नगर की महान नारी ने अच्छा सबक सिखाया।'

विद्या की रेखा

बौद्धिक जाने-माने ऋषि थे। उनके आश्रम में कई छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे। उन छात्रों में कुछ राजकुमार थे तो कुछ अत्यंत निर्धन परिवारों के बालक भी। एक दिन ऋषि वृक्ष के नीचे बैठकर संस्कृत के रूप पढ़ा रहे थे। अध्याय समाप्त होने के बाद उन्होंने एक निर्धन छात्र को संस्कृत के रूप सुनाने को कहा पर वह बालक उन रूपों को सुनाने में असमर्थ रहा। इससे क्रोधित ऋषि ने डंडा मारने हेतु छात्र को हाथ आगे करने को कहा। छात्र ने डरते-डरते हाथ आगे कर दिए। उस छात्र के हाथ देखकर ऋषि बोले, 'वत्स, तुम्हें मारना ही व्यर्थ है क्योंकि तुम्हारे हाथ में तो विद्या की रेखा ही नहीं है। तुम्हारा शिक्षा ग्रहण करना ही निरर्थक है।' फिर उन्होंने उसके हाथ की ओर संकेत करते हुए कहा, 'देखो, विद्या की रेखा यहां होती है।' छात्र दुखी मन से उठा और आश्रम के बाहर चला गया। थोड़ी देर बाद जब वह वापस आया तो उसकी हथेली से खून निकल रहा था।


ऋषि ने पूछा, 'तुम्हारे हाथ में क्या हुआ? यह घाव कैसे हो गया?' छात्र ने अत्यंत सहजता के साथ कहा, 'ऋषिवर, यह घाव नहीं है बल्कि विद्या की रेखा है जिसे मैंने स्वयं अपनी हथेली पर बना लिया है।' ऋषि ने तुरंत छात्र का उपचार किया। वह उसकी इच्छा शक्ति और साहस से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने उस दिन से उस पर और अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया। छात्र ने अपने गुरु का अपने प्रति प्रेम देखकर अथक परिश्रम करना प्रारंभ कर दिया।

वह दिन-प्रतिदिन उन्नति करने लगा। उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति, परिश्रम, लगन और ऋषि के अथक लगाव ने उसे संस्कृत का विद्वान बना दिया। इस बालक ने ही आगे चलकर संस्कृत का पहला व्याकरण ग्रंथ लिखा जो संसार भर में बेहद प्रसिद्ध हुआ। यह संस्कृत का बेजोड़ ग्रंथ माना जाता है। वह ज्ञानी बालक आगे चलकर व्याकरणाचार्य पाणिनी के नाम से विख्यात हुआ।

सच्चा पुरस्कार

यह प्रख्यात स्वतंत्रता सेनी गोपालकृष्ण गोखले के बचपन की कथा है। एक दिन गणित के उनके शिक्षक ने सब बच्चों की उत्तर-पुस्तिकाएं जांचने के बाद उन्हें बुलाया, उनकी पीठ थपथपाकर शाबाशी दी और कहा, 'मैं तुम्हें यह पुस्तक पुरस्कार के रूप में दे रहा हूं क्योंकि तुमने सारे सवालों के सही उत्तर दिए हैं ।'

पुरस्कार का नाम सुनते ही गोखले रो पड़े। जब शिक्षक ने रोने का कारण पूछा, तब गोखले ने रोते-रोते उत्तर दिया, 'मुझे आप इनाम नहीं दंड दीजिए।' शिक्षक ने आश्चर्य से पूछा, 'बेटे, क्या बात है, क्या तुम्हें पुरस्कार पसंद नहीं है?' गोखले ने जवाब दिया, 'असल बात यह है कि परीक्षा में दिए गए प्रश्नों में से एक का उत्तर मुझे नहीं सूझ रहा था। उसका उत्तर मैंने अपने एक मित्र से पूछकर लिखा है, ऐसे में मैं इस पुरस्कार का हकदार कैसे हो सकता हूं।'

गोखले का जवाब सुनकर गुरुजी प्रसन्न हो उठे। वह बोले, 'बेटे, पहले मैं तुम्हें यह पुरस्कार तुम्हारी बुद्धि के लिए दे रहा था, पर अब यह इनाम तुम्हारी सचाई के लिए दे रहा हूं। मैं चाहता हूं, तुम इसी तरह सदा सच बोलते रहो।'

ज्ञान की गंगा

सुभाषचंद बोस जब बहुत छोटे थे, तब एक रात वह बिछावन से उतरकर जमीन पर सो गए। थोड़ी देर बाद जब उनकी मां का ध्यान गया तो उन्होंने पूछा, 'बेटा, तुम नीचे क्यों सोए हो?' सुभाष ने कहा, 'मां, गुरुजी कह रहे थे कि हमारे पूर्वज ऋषि-मुनि थे, वे भूमि पर सोते थे और कठोर जीवन जीते थे। मैं भी ऋषि बनूंगा, सो कठोर जीवन का अभ्यास कर रहा हूं।'

इस बीच सुभाष के पिता भी जाग गए। उन्होंने कहा, 'केवल जमीन पर सोकर तुम ऋषि नहीं बन सकते। इसके लिए तुम्हें ज्ञान अर्जित करना होगा और सेवा का संकल्प लेना होगा।' सुभाष ने यह सीख गिरह बांध ली और एक दिन वह एक सामान्य व्यक्ति से लाखों भारतीय के प्रिय 'नेताजी' बन गए।

पांच साल में 10 गुनी हुई राहुल की संपत्ति-आख़िर कैसे !

अमेठी से कांग्रेस के लोकसभा प्रत्याशी राहुल गांधी की संपत्ति पिछले पांच सालों में अच्छी-खासी बढ़ गई है और वह करोड़पति हो गए हैं। उन्होंने शनिवार को अपना नामांकन पत्र भरते समय दिए हलफनामे में बताया कि उनके पास कुल 2.25 करोड़ रुपये की संपत्ति है। जबकि, 2004 के चुनाव के दौरान उनके पास मात्र 22 लाख रुपये की संपत्ति थी। पिछले पांच साल में राहुल ने रीयल एस्टेट में भी जमकर निवेश किया है। उन्होंने दिल्ली में 1.34 करोड़ रुपये में दिल्ली में दो दुकानें और हरियाणा में छह एकड़ का एक प्लॉट खरीदा है।

संपत्ति वर्ष -2004: कुल 22 लाख रुपये
वर्ष -2009: 2.25 करोड़ रुपये

संपत्ति वर्ष -2004: बैंक डिपॉजिट 10.11 लाख यूको बैंक में और 99 हजार सिटी बैंक में। इसके अलावा विदेश के तीन खातों में क्रमश : 27, 700 पाउंड, 19, 200 डॉलर और 2,700 पाउंड

वर्ष -2009: 70 हजार नकद के अलावा सिटी बैंक में 7.4 लाख, एचडीएफसी बैंक में 3.4 लाख और एसबीआई में 7744 रुपये की जमा हैं।

संपत्ति वर्ष -2004: शेयर 3.9 लाख रुपये के
वर्ष -2009 : 7 लाख 29, 621 रुपये के

नॉन-बैंकिंग डिपॉजिट संपत्ति वर्ष -2004: एलआईसी और अन्य निवेश 3.80 लाख रुपये के
वर्ष -2009: 10.2 लाख रुपये की बीमा पॉलिसी , पोस्टल और नैशनल सेविंग्स ।

संपत्ति वर्ष -2004: जूलरी 1.25 लाख रुपये के
वर्ष -2009:1.5 लाख रुपये के

रीयल एस्टेट संपत्ति वर्ष -2004: दिल्ली में 9.8 लाख का फॉर्म हाउस

वर्ष -2009: दिल्ली के साकेत में प्लस मेट्रोपॉलिटन मॉल में दो दुकानें हरियाणा में छह एकड़ का प्लॉट। कुल कीमत -1.63 करोड़

वाह भाई राहुल जी, कृपा करके ये भी बताने का कष्ट करें की आपने यह सब कैसे किया। कृपया अपनी सम्पति को बढ़ाने का जरिए भी बताएं। आपकी इस छोटी सी जानकारी से आप देश के अनगिनत लोगों को गरीबी के काल से बचा सकते हैं । ये एक छोटा सा उदहारण है, हमारे देश के नेताओं का।

हम लोग कब जागेंगे ? आख़िर कब।

गीता का रहस्य

एक व्यक्ति एक संत से मिलने गया। संत उस समय अपने आश्रम के पास की ज़मीन खोद रहे थे। व्यक्ति ने संत को प्रणाम और कहा, 'महात्मा जी, मैं आपसे गीता का रहस्य जानना चाहता हूं।' संत बोले, 'अच्छा, आप बैठिए।' यह कहने के बाद वह फिर अपने काम में लग गए। व्यक्ति चुपचाप उन्हें फावड़ा चलाते हुए देखता रहा। वह सोच रहा था कि पता नहीं कब संत का काम समाप्त होगा और वह उसे गीता का ज्ञान कराएंगे। जब काफी समय बीत गया तो उस व्यक्ति का धैर्य चुकने लगा।
आखिरकार उसने कहा, 'मैं तो आपकी ख्याति सुनकर बहुत दूर से आपके पास आया था। पर आपके लिए समय की कोई कीमत ही नहीं है।' संत ने ठहाका लगाया और कहा, 'भाई तब से गीता का रहस्य ही तो समझा रहा हूं मैं।' उस व्यक्ति ने आश्चर्य से कहा, 'कहां समझा रहे हैं। तब से तो मैं बैठा हुआ हूं और आप फावड़ा चला रहे हैं। आप तो एक शब्द भी नहीं बोले।' संत ने कहा, 'बोलने की आवश्यकता ही कहां है। गीता का उपदेश है कर्म करो और फल की चिंता न करो। देखो, मैं अपना कर्म कर रहा हूं।' उस व्यक्ति ने समझ लिया कि संत का आशय क्या है।

MAA LAXSHMI A GODESS OF WEALTH & PROSPERITY

Mahalakshmi or Sridevi is the goddess of wealth and prosperity. Our ancients who depicted energy in appealing forms, created images of gods and goddesses to portray its various aspects and attributes. One has to go deep within the forms, decipher the secret messages of the various symbols in each form, and transcend them to go into the divine energy space into the formless.
Devi as Mahalakshmi is popularly depicted as a beautiful woman of golden complexion. She is shown with four hands, seated on a full-bloomed lotus and holding a lotus bud, which stands for beauty, purity and fertility. The lotus is also a flower which blooms in dirty mud symbolising the unlimited potential in each one of us to bloom in any environment.
Mahalakshmi is surrounded by water, and water symbolises life. Water must constantly flow. If it doesn’t, it leads to stagnation. Money must also flow and circulate, hence it is called currency coming from the root word current. All those who hoard money, who do not allow it to flow, do not understand the nature of money and life. Circulation is the secret of a healthy economy. It is also vital to a healthy life.
Lakshmi’s bright image reflects grandeur and richness in every way, for God wants us to be rich and prosperous. Her four hands represent the four ends of human life. They are dharma or righteousness, kama or desires, artha or wealth, and moksha or liberation from the cycle of birth and death. These are the pillars of our life and are the basis of the Vedas and Upanishads.
Mahalakshmi showers gold coins from her right hand blessing her devotees to attract wealth. She is dressed in a green saree depicting fertility, growth and the manifested energy. At times she is wearing a red saree as red symbolises activity and potential energy.
Two white elephants are shown standing next to the goddess and spraying water. This denotes ceaseless effort, in accordance with one’s dharma and governed by wisdom and purity, leading to both material and spiritual prosperity.
Mahalakshmi is also associated with the white owl, which has two symbolism. One of wisdom and luck, the other stands for stupidity which means that wealth not handled properly can vanish because of arrogance and pride. Hence Lakshmi is said to be chanchal or fickle minded. Some scriptures mention Lakshmi’s sister A lakshmi who causes misfortune, depicting the state of not adhering to the Laws of Money.
The word Lakshmi is derived from the Sanskrit word Lakshya, which means, aim or goal. Lakshmi or money will come to all those who have a clear aim or goal. As clear as Arjuna’s focus when he says, “I only see the eye of the bird”, to his guru Dronacharya. Friday is most associated with Lakshmi. Friday is Shukrawar in Sanskrit or planet Venus. Venus is a beneficent planet which rules material comfort and luxury. Also Friday comes from Freia, the Viking goddess of fertility. Dusk is the time of Lakshmi Pooja. It is important to keep the house spotlessly clean and pure. Lakshmi likes cleanliness, and she will visit the cleanest house first. This is also the reason why the broom is worshipped on Diwali with offerings of haldi and kumkum or turmeric and vermilion.
We also worship money, ornaments and other material possessions to express our gratitude to Goddess Lakshmi for showering her grace on us.