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सिद्धांत के विरुद्ध

यह घटना उस समय की है जब लाल बहादुर शास्त्री देश के गृह मंत्री थे। वह अपनी सादगी, सज्जनता, साफगोई और इमानदारी के लिए देश भर में जाने जाते थे। वह किसी भी कार्य के लिए सिफारिश के सख्त विरोधी थे। अपने इस गुण के कारण कई बार उन्हें लोगों के विरोध का भी सामना करना पड़ता था। एक दिन वह अपने कार्यालय में व्यस्त थे कि तभी उनके सचिव ने उनके एक मित्र के नाम की पर्ची भेजी। शास्त्री जी ने तुरंत अपने मित्र को मिलने के लिए अपने पास बुला लिया। आवभगत के बाद शास्त्री जी ने मित्र से आने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि उनके पुत्र ने उत्तर प्रदेश पुलिस में दारोगा पद के लिए आवेदन किया है। यदि शास्त्री जी भर्ती अधिकारी से सिफारिश कर दें तो उनके पुत्र को यह पद मिल सकता है।
शास्त्री जी ने यह सुनने के बाद अपने मित्र से मुखातिब होते हुए कहा, 'आप मुझसे मिलने आए इसका मुझे अपार हर्ष है जिसे मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकता। पर आपके पुत्र की लंबाई भर्ती मापदंडों के अनुसार काफी कम है। इसलिए उसे यह पद नहीं मिल सकता। इसकी सिफारिश करना मेरे सिद्धांतों के विरुद्ध जाना होगा।' मित्र ने हैरानी भरे शब्दों में कहा, 'शास्त्री जी, यह आप क्या कह रहे हैं? आपकी लंबाई भी काफी कम है। फिर अगर आप गृह मंत्री बन सकते हैं तो जरा सी लंबाई कम होने के कारण मेरा पुत्र दारोगा क्यों नहीं बन सकता?' इस पर शास्त्री जी बोले, 'मित्र, छोटा कद होने पर मैं गृह मंत्री अवश्य बन गया हूं पर इसके बावजूद दारोगा तो मैं चाहकर भी नहीं बन सकता। आपका बेटा भी गृह मंत्री बनना चाहे तो जरूर बन सकता है। दारोगा बनने के लिए निश्चित लंबाई जरूरी है, गृह मंत्री बनने के लिए नहीं।' शास्त्री जी की यह बात सुनकर उनके मित्र निरुत्तर हो गए।

कड़वे बोल

एक युवक शिक्षित व गुणवान था मगर वह बात-बात में लोगों से बड़े ही कड़वे शब्द बोलता था। अनेक बड़े-बूढ़े उसे हर तरह से समझा-समझा कर हार गए थे पर उसमें कोई परिवर्तन नहीं आया। उस युवक का एक बहुत ही प्रिय मित्र था। मित्र भी युवक के कड़वे बोल से परिचित था। वह युवक जब-तब अपने मित्र को भी छोटी-मोटी बात पर तीखा बोल देता था, किंतु मित्र उसकी बातों का बुरा नहीं मानता था क्योंकि वह जानता था कि युवक अंदर से होनहार और साफ मन का है। पर जब मित्र को अहसास हुआ कि युवक के कड़वे बोल के कारण अधिकतर लोग उसे घृणा की नजरों से देखने लगे हैं, तो उसने उसे सुधारने की सोची। इसके लिए मित्र ने युवक को अपने घर पर आमंत्रित किया। कुछ देर इधर-उधर की बातें करने के बाद उसने युवक को एक पेय पदार्थ दिया। यह अत्यंत मीठा था। इसे पीते ही युवक खुश हो गया और मित्र से बोला, 'वाह! इसे पीते ही मन आनंदित हो गया।'
थोड़ी देर बाद मित्र एक और पेय लेकर आया और बोला, 'यह एक खास चीज है। इसे पीकर देखो।' एक घूंट पीते ही युवक का चेहरा विकृत हो गया। वह नाक-भौं सिकोड़ते हुए बोला, 'यह तो बहुत ही कड़वा है।' युवक की इस बात पर मुस्कराता हुआ मित्र बोला, 'अच्छा, क्या तुम्हारी जुबान जानती है कि कड़वा क्या होता है।' इस पर युवक बोला, 'कड़वी और खराब चीजें तो जुबान पर आते ही पता चल जाती है।' मित्र ने कहा, 'नहीं, कड़वी चीजें जुबान पर आते ही पता नहीं चलतीं। अगर ऐसा होता तो लोग अपनी जुबान से कड़वी बातें क्यों निकालते?' यह सुनकर युवक लज्जित हो गया। मित्र ने समझाया, 'जो व्यक्ति कटु वचन बोलता है वह किसी व्यक्ति को दुख पहुंचाने से पहले अपनी जुबान को ऐसे ही गंदा करता है जैसे इस कड़वे पेय ने तुम्हारी जुबान को कर दिया है।'

क्या यही है देश का युवा नेतृत्व!

देश की राजनीतिक पार्टियों को इस बात का अहसास है कि इस बार के आम चुनाव में युवा वर्ग निर्णायक भूमिका निभाने वाला है। वे इस बात को लेकर सचेत हैं कि आज भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। देश के 54 फीसदी मतदाताओं की उम्र 40 साल से कम है। इसे ध्यान में रखकर तमाम सियासी पार्टियां युवाओं को आकर्षित करने में लगी हैं। इसके लिए वेबसाइट्स पर तरह-तरह के विज्ञापन दिए जा रहे हैं, एसएमएस भेजे जा रहे हैं। इसके अलावा कई अन्य तरीकों से भी उनसे संपर्क बनाने की मुहिम चल रही है।
नई सदी के नौजवान हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं, पर क्या उनकी आशाओं-आकांक्षाओं का कोई प्रतिबिंब लोकसभा में नजर आता है? क्या संसद में ऐसा कोई कामकाज हुआ है, जिससे युवाओं में इस संस्था के प्रति आस्था बढे़? संसद में नौजवानों का प्रतिनिधित्व करने वाले कितने सांसद हैं? चौदहवीं लोकसभा में उन्होंने कितनी बार युवाओं के लिए आवाज उठाई? चुनाव के मैदान में आज जो युवा उम्मीदवार खडे़ हैं, वे किसकी भावनाओं को व्यक्त कर रहे हैं? इन प्रश्नों की रोशनी में आज के राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो हमें निराशा ही हाथ लगती है।
कांग्रेस राहुल गांधी को देश की युवा पीढ़ी का आइकॉन बनाना चाहती है। प्रधानमंत्री पद के लिए आवश्यक सारी खूबियां राहुल में हैं, ऐसा अर्जुन सिंह, प्रणव मुखर्जी जैसे नेता कई बार बता चुके हैं। मगर राहुल के राजनीतिक परफॉर्मन्स का आकलन किया जाए, तो संसद के भीतर और बाहर उनमें आज तक कोई खास चमक नजर नहीं आई। राजस्थान में मजदूरों के साथ किया हुआ श्रमदान, उत्तर प्रदेश में दलित परिवारों के साथ रात गुजारना, खास तामझाम के साथ चुनाव के दौरान पेश किए गए रोड शो, विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसान परिवारों का हालचाल पूछना- ये सारी घटनाएं न्यूज चैनलों और प्रिंट मीडिया में बड़ी खबरें जरूर बनीं, लेकिन भारत जैसे बहुआयामी देश का प्रधानमंत्री पद संभालने की काबिलियत राहुल में है, ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ। चालीस साल की उम्र में राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने। राहुल अब 39 वर्ष के हैं। पार्टी के महासचिव पद का जिम्मा स्वीकार करने के लिए उन्हें तीन साल तक सोचना पड़ा।
हालांकि उनसे यह आशा थी कि कम से कम युवक कांग्रेस में नया जोश पैदा करने में वह जरूर कामयाब होंगे। लेकिन राहुल ने ज्यादातर प्रदेशों में उन्हीं युवाओं के हाथ में युवक कांग्रेस का नेतृत्व सौंप दिया, जिन्हें राजनीति विरासत में मिली थी। जनता के सुख- दुख में शामिल होने वाले जमीन से जुडे़ कार्यकर्ताओं को संगठन के पदों से दूर ही रखा गया। शायद इसी कारण देश भर में छात्रों-युवाओं का मूवमंट थमता नजर आ रहा है। हर राज्य में पार्टी चंद नेताओं के छोटे-छोटे गुटों में बंट चुकी है। ये गुट आपस में लड़ते हैं और पार्टी का भविष्य तबाह करते हैं।
इस बार ज्यादा से ज्यादा युवाओं को चुनाव मैदान में उतारने की बात पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में राहुल ने हाल में ही कही थी। परिणामों की परवाह न करते हुए अगर सचमुच इस निर्णय पर अमल होता तो शायद राहुल के नेतृत्व का देश के कोने-कोने में खास असर दिखता, पर कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची देखें तो उसमें पांच प्रतिशत भी युवा नजर नहीं आते। राहुल की बाबा टीम भी संकट में है। सचिन पायलट न जाने कितने दिन नया चुनाव क्षेत्र खोजते रहे। मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया के गुना क्षेत्र से ज्यादातर कांग्रेस उम्मीदवार हार गए। लगता है, नए नेतृत्व को सिंधिया भी आगे नहीं बढ़ा पाए। मुंबई में मिलिंद देवड़ा भी संकट में हैं। जिस मीनाक्षी नटराजन को राहुल ने मंदसौर से उम्मीदवार बनाया, वहां उनके खिलाफ कांग्रेस कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। राहुल की खास पसंद से कश्मीर के मुख्यमंत्री बने उमर अब्दुल्ला के खिलाफ भी नाराजगी के स्वर उभरने लगे हैं।
कांग्रेस की तुलना में बीजेपी की हालत और भी खराब है। राहुल को चैलिंज देने के लिए पार्टी ने वरुण गांधी को मैदान में उतारा। पीलीभीत की चुनाव रैली में वरुण ने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ जो आग भड़काई उसकी तीव्र प्रतिक्रिया पूरे देश में हुई है। एक स्वर से वरुण की आलोचना हो रही है लेकिन बीजेपी के वरिष्ठ नेता उनके बचाव में खड़े हो गए हैं। चुनाव आयुक्त कीसलाह को न मानते हुए बीजेपी ने वरुण को पीलीभीत से लड़ाने का निर्णय किया है। लंदन स्कूल ऑफ ईकनॉमिक्स जैसे विख्यात संस्थान में पढ़े वरुण ने खुद को ऐसी विद्वेषपूर्ण राजनीति से जोड़ लिया है, जिसका समर्थन देश के अधिकतर युवा नहीं करते। क्षेत्रीय दलों के नेता भी आए दिन पीएम बनने की अपनी इच्छा का इजहार करते रहते हैं, लेकिन इन दलों में भी वंशवाद हावी है। इन्होंने या तो युवराजों को टिकट दिए हैं या आपराधिक पृष्ठभूमि से आए युवाओं को।
चौदहवीं लोकसभा में 34 ऐसे सांसद थे, जिनकी उम्र 40 साल से कम थी। उनमें से 19 ऐसे थे जिन्हें राजनीति विरासत में मिली और वे संसद तक पहुंचे। सात सांसद ऐसे भी थे जो आपराधिक पृष्ठभूमि से संसद में आए। संतोष की बात यह है कि इनके साथ प. बंगाल से आए तीन और उड़ीसा से आए दो ऐसे सांसद भी थे जो इन दो श्रेणियों में नहीं आते। आम तौर पर वाम दलों का गठबंधन ऐसे युवाओं को उम्मीदवार बनाता रहा है। इंटरनैशनल ऐथलीट ज्योतिर्मय सिकदर इसका एक उदाहरण हैं। लेकिन राजनीतिक पार्टियां मध्यवर्ग से आने वाले अध्ययनशील और मेहनती युवाओं को प्रोत्साहन नहीं दे रही हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि राजनीति में साधारण परिवारों के युवाओं का भी प्रतिनिधित्व हो। फिर यह कैसे उम्मीद की जाए कि जो पार्टियां नई पीढ़ी को लुभाने की कवायद में जुटी हैं, वे सत्ता पाने के बाद युवा वर्ग के सपनों को पूरा कर पाएंगी? आज गांव या शहर के निम्न या मध्य वर्ग का कोई युवा अगर राजनीति में आकर देश के लिए कुछ सार्थक कार्य करना चाहे तो क्या वर्तमान राजनीति में उसके लिए कोई जगह है? देश के दस करोड़ युवा, जो इस चुनाव में पहली बार अपना वोट देंगे, इस सवाल का जवाब जरूर चाहेंगे।

मन की दशा!

एक युवक एक संत के आश्रम में पहुंचा। उसने संत से प्रार्थना की, 'मुझे दीक्षा दीजिए।' संत ने कहा, 'हमारे आश्रम में सौ शिष्य हैं, तू उनके लिए चावल कूट।' वह युवक तत्काल इस कार्य में जुट गया। वह रात-दिन चावल कूटता रहता। इस बीच कभी नींद आती तो सो जाता। न कभी वह गुरु से मिलने गया, न गुरु उसके पास आए।

इस प्रकार कई साल बीत गए। गुरु काफी वृद्ध हो गए। वह आश्रम की जिम्मेदारी और अपना पद किसी योग्य शिष्य को सौंपकर तपस्या के लिए निकल जाना देना चाहते थे। एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, 'आप लोग इतने साल मेरे साथ रहे, आपने इतने दिनों तक सत्संग किया है। आपके मन ने क्या महसूस किया, क्या पाया, आप उसका सार लिखकर मेरी कुटिया में रख देना। जिसका उत्तर मुझे सबसे अच्छा लगेगा उसे मैं अपना पद दे दूंगा और चला जाऊंगा।'

सभी शिष्यों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार लिखा। ज्यादातर ने यही लिखा कि मन एक दर्पण है, उस पर धूल जम गई है, सद्गुरु उसे साफ करते हैं। संत उनमें से किसी के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने कहा, 'जाओ उस चावल कूटने वाले युवक से पूछो कि उसका अभिप्राय क्या है।' सभी शिष्य उसके पास गए। उस युवक ने जब गुरु का आदेश सुना तो बोला, 'मुझे पढ़ना-लिखना नहीं आता। मैं जो बोलूं वह आप लोग लिखकर गुरु की कुटिया में रख देना। मेरी ओर से इतना ही लिखो कि जब गुरु मिल गया तो फिर मन बचा ही कहां है? वह मन का लुटेरा है। हमारा मन तो वह ले लेता है फिर हमें क्या चिंता? अब हमारी सारी जिम्मेदारी सद्गुरु पर है।' शिष्यों ने यह उत्तर लिखकर संत की कुटिया में रख दिया। संत ने उसे पढ़ा और दौड़कर उसके पास पहुंचे। उन्होंने उसे गले से लगा लिया। फिर उसे अपना पद देकर चले गए।

काम और पहचान!

एक व्यक्ति एक ही काम करते-करते ऊब जाता है और उससे मुक्ति की बात सोचने लगता है। शायद इसीलिए छुट्टी की व्यवस्था की गई ताकि लोग अपनी थकान मिटा आएं और फिर से तरोताजा होकर अपने मूल काम में जुट जाएं। लोग तरोताजा होने के लिए घूमते फिरते हैं, मनोरंजन करते हैं। अगर किसी के पास यह सुविधा हो कि वह जब चाहे अपना काम बदल ले तो क्या वह बदल लेगा? शायद नहीं। अगर ऐसा होता तो दुनिया में विशेषज्ञता की अवधारणा नहीं आई होती। काम बदलने की एक तो गुंजाइश कम है लेकिन इसके लिए हमारा शरीर और मन तैयार भी नहीं होता।
हमें एक ही काम की आदत पड़ जाती है और हमें लगता है कि हम कुछ और नहीं कर सकते। दरअसल यह आदत से ज्यादा हमारी पहचान का मामला है। हर व्यक्ति अपने काम से अपनी एक पहचान बनाता है। लेकिन यह पहचान समाज के लिए नहीं अपने लिए भी होती है। हम अपने लिए भी अपनी एक पहचान बनाते हैं। हमारा काम दरअसल हमें हमारी एक पहचान देता है। इसलिए हम उस काम को छोड़ना नहीं चाहते क्योंकि उससे हमारी पहचान मिटने का खतरा रहता है।

दुख का महत्व!

कोई नहीं चाहता कि उसके जीवन में दुख-तकलीफ आए। हम दुख को नकारते जरूर हैं पर उसे अपने जीवन से बाहर नहीं करते। प्राय: उसे संजो कर रखते हैं। जब हमारे सामने कोई अपने किसी कष्ट की चर्चा शुरू करता है तो हम भी अपने किसी पुराने दुख पर बात करने लगते हैं।
अगर हम दुख पर चर्चा करते दो लोगों को देखें तो लगेगा कि दोनों में अपने कष्ट को बड़ा बताने की होड़ सी लगी हुई है। हर व्यक्ति अपने कष्ट को सबसे बड़ा मानता है क्योंकि उसकी अनुभूति से वह सीधा जुड़ा होता है। अगर मनुष्य को अपने दुखों से प्यार नहीं होता तो साहित्य में ट्रैजिडी की अवधारणा ही सामने नहीं आती, केवल सुखांत साहित्य रचा जाता। असल में दुख एक कसौटी है। दुख की चर्चा के पीछे यह भाव रहता है कि देखो मैं इतनी तकलीफों को पार कर यहां तक पहुंचा हूं, मैं इतने कष्टों के बीच भी अविचल रहा हूं। दुख के माध्यम से हम स्वयं को प्रमाणित करते हैं। दुख एक ध्वज है जिसे लहराकर हम अपनी सफलता की घोषणा करते हैं।

निर्णायक की ईमानदारी!

राफेल और एंजेलो इटली के महान चित्रकार थे। उनकी चित्रकारी के नमूने जो कोई भी देखता, दांतों तले उंगली दबा लेता था। एक ही क्षेत्र का होने के कारण दोनों में हमेशा प्रतिस्पर्द्धा चलती रहती थी और एक समय ऐसा आया, जब दोनों एक-दूसरे के दुश्मन बन गए। एक बार इटली के एक व्यापारी ने देवालय की दीवारों पर चित्र बनाने के लिए राफेल को आमंत्रित किया। व्यापारी ने राफेल को पारिश्रमिक के रूप में सौ सिक्के अग्रिम के रूप में दिए और शेष राशि काम पूरा होने के बाद देने का वादा किया। राफेल ने दिन-रात एक कर चार उत्कृष्ट भित्ति चित्र बनाए। चित्र बन जाने पर व्यापारी शेष राशि देने में आनाकानी करने लगा।
राफेल के बार-बार पारिश्रमिक मांगने पर व्यापारी ने कहा, 'चित्र कुछ खास नहीं हैं। इन चित्रों का वास्तविक मूल्य उतना ही है जितना मैंने पहले ही भुगतान कर दिया है।' जब राफेल ने आपत्ति की तो व्यापारी ने कहा कि चित्र की श्रेष्ठता की जांच के लिए वह एक निरीक्षक की नियुक्ति करेगा। निरीक्षक जो फैसला देगा वह उसे मान्य होगा। राफेल ने इस पर अपनी सहमति दे दी।
व्यापारी को राफेल और एंजेलो की दुश्मनी के बारे में पता था, सो उसने जानबूझकर एंजेलो को निरीक्षक नियुक्त किया। व्यापारी को उम्मीद थी कि राफेल से दुश्मनी के कारण एंजेलो उन चित्रों को घटिया करार देगा और इस तरह उसके पैसे बच जाएंगे। नियत दिन एंजेलो ने देवालय पर बनाए गए राफेल के चित्रों का निरीक्षण किया। उसने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा कि ये चित्र वाकई बहुत मेहनत से बनाए गए हैं। इनमें रंगों एवं रेखाओं का तालमेल भी उत्कृष्ट कोटि का है और इन चित्रों को चित्रकला की एक शानदार उपलब्धि के रूप में देखा जाएगा। एंजेलो ने अपने संबंधों की परवाह न करते हुए राफेल के पक्ष में फैसला सुनाया और व्यापारी को शेष पारिश्रमिक के भुगतान का निर्देश दिया।

मां की इच्छा!

क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की बहादुरी और कर्मठता से अंग्रेज शासक भयभीत रहते थे। एक बार उन्हें गोरखपुर की जेल में रखा गया था। उस दौरान उन्हें फांसी दी जाने वाली थी। एक दिन उनके मां-पिता जेल में उनसे मिलने आए। बिस्मिल ने आगे बढ़कर पिता की चरण धूल सिर से लगाई। फिर वह अपनी मां से लिपट गए। कुछ देर तक लिपटे रहे। उनकी आंखें भर आईं। इस बात को उनकी मां ने महसूस कर लिया।
मां ने उनकी पीठ थपथपाकर कहा, 'अरे, मेरा बहादुर बेटा रो रहा है क्या? ऐसा कैसे हो सकता है। तुम्हें किस बात का डर है?' मां की बात सुनकर रामप्रसाद मुस्कराए और बोले, 'मां, तुम भी अच्छी तरह जानती हो कि ये आंसू मृत्यु के भय से नहीं बह रहे। मैं तो किसी घड़ी मौत को गले लगाने के लिए तैयार हूं। ये आंसू तो तुम्हारी जैसी प्यारी मां को देखकर आ गए। पता नहीं अगले जन्म में मुझे इतनी स्नेहशील मां मिलेगी कि नहीं।' मां ने कहा, 'बेटे, बहादुरों को ऐसी ही मां मिलती है। मैं तो खुद भगवान से यह प्रार्थना करके आई हूं कि मुझे हर जन्म में तेरे जैसा बहादुर बेटा मिले।'

कर्मों से मिला कष्ट!

जीवन के अंतिम दिनों में रामकृष्ण परमहंस काफी बीमार रहते थे। वह अक्सर दर्द से छटपटाते रहते। यह देखकर उनके भक्त बहुत दुखी रहते थे। एक बार उनके कुछ प्रिय भक्तों ने कहा, 'हमें एक बात समझ में नहीं आती। आपने काली माता से प्राप्त शक्तियों से सैकड़ों रोगियों को पीड़ा से मुक्त किया है। फिर उनका प्रयोग अपने लिए क्यों नहीं करते?'

परमहंस बोले, 'मुझे जो कष्ट मिला है वह कर्मानुसार है। किसलिए मिला है, यह भी मैं जानता हूं। जो शक्ति काली मां ने मुझे दी है वह परमार्थ के लिए है, जिसका मैं अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग नहीं कर सकता। उनका अपने लिए प्रयोग करके मैं उनकी नजरों में अप्रामाणिक नहीं बनना चाहता।'

हलो गॉड! प्लीज इंसानी मॉडल भी बदलो

दुनिया बदल रही है। कितनी तेजी से बदल रही है, जब तक यह सोचकर कमरे से बाहर निकलता हूं कुछ और बदल चुका होता है। मामला कुछ ऐसा ही हो जाता है जैसे जस्ट मैरिड लिखी हुई कार दूल्हा- दुल्हन को लेकर जाए और सीधे तलाक वाले वकील के घर पर जाकर रुके।
मुझे ईश्वर से शिकायत है कि उसने कुछ नहीं बदला- सूरज, हवा, पानी वगैरह। खैर मुझे सबसे ज्यादा प्रॉब्लम इन चीजों से न होकर, आदमी के ढांचे से है। इंसानी मॉडल जैसा हजारों बरस पहले था, आज भी वैसा ही है, सिर्फ पूंछ गायब हो गई है। गॉड! इट्स नॉट फेयर। अब समय आ गया है कि इन्सान का ढांचा भी बदले। मेरे कुछ सुझाव हैं कि आदमी में बदलाव कैसा होना चाहिए।
ईश्वर को मालूम होना चाहिए कि आज दुनिया की सबसे बड़ी समस्या बिजली, पानी या प्रदूषण की नहीं है। लादेन और लिट्टे की भी नहीं है। सबसे बड़ी समस्या है डैंड्रफ की। आदमी का मॉडल ऐसा होना चाहिए कि डैंड्रफ की गुंजायश ही न रहे। पूरा सिर डैंड्रफ प्रूफ। महिलाओं के बाल उनकी इच्छा से ही बढ़ें और चमकीले हों। मुझे मालूम है कि जब सबके बाल ऐसे होंगे तो गंजापन स्टेटस सिंबल बन जाएगा, फिर भी आप चेंज कर ही दें। साथ ही जूंओं को भी कहीं और शिफ्ट कर दें, कम से कम बालों में तो न रहें।
ईश्वर को इंसान का नया मॉडल बनाते समय इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए अब इंसान के सिर के पीछे एक तीसरी आंख भी अवश्य रहे, कॉलर से थोड़ा सा ऊपर। आजकल पीछे देखते रहना बहुत जरूरी है दुर्घटनाओं से बचने के लिए। और आगे की आंख खराब होने पर पीछे वाली आंख स्पेयर पार्ट का काम भी कर सकती है।
नाक की जरूरत सांस के लिए ज्यादा है या चश्मा टिकाने के लिए, यह अभी तक स्पष्ट नहीं है। अगर नाक चश्मे के लिए ही है तो इस सुरंगयुक्त फ्लाईओवर को चेहरे से हटा दें, तो अच्छा लगेगा। अगर नाक सांस लेने के लिए है, तो कम से कम गॉड जी इस पर एक एयर फिल्टर तो लगा दें।
मूछें नाक पर अंडरलाइन की तरह हैं। इन्हें हटाया जा सकता है। बिना मूछों के भी लोग कपिलदेव को ऐश्वर्या राय तो नहीं समझेंगे न। दांत वाइट की जगह कलर्ड ही होने चाहिए, पर ध्यान रहे कि रंग पक्का हो, ब्रश करते समय उतरे नहीं। अच्छा हो कि हर दांत का रंग अलग- अलग हो।
सुझाव यह भी है कि दांत 30 बरस की उम्र में टूट कर फिर से नए आएं, नए रंगों के साथ। इससे लाइफ में चार्म बना रहेगा। दाढ़ी का रंग भी दांतों के रंग से मैचिंग का ही होना चाहिए। मल्टीकलर होने पर और बेहतर। वैसे मर्द बहुत दुखी हो चुके हैं रोज शेव करते- करते।
दिल का किस्सा सबसे पेचीदा है। सोचते सब दिमाग से हैं, और बदनाम दिल होता है। दरअसल दिल का काम सिर्फ इतना है कि खून साफ करे, न कि सबसे इंसाफ करे। इसलिए यह पूरा शरीर ऐसा ढक्कनदार होना चाहिए कि जिसे खोलकर पूरी साफ सफाई की जा सके, नो सर्जरी।
आदमी हर चीज के लिए तो दो- दो हाथ नहीं कर सकता। वैसे अब दो हाथ होना पर्याप्त नहीं है। कम से कम एक हाथ तो एक्स्ट्रा चाहिए, मोबाइल फोन के लिए। या फिर शरीर में एक जेबनुमा चीज लगा दो, जिसमें मोबाइल रखा या टांगा जा सके। वहां से कान तक इन्टरनल वायरिंग हो जिससे बिना हाथ का उपयोग किए आदमी मोबाइल पर बात कर सके। वैसे इस जेब वाले सुझाव में समस्या ये है कि मोबाइल छिप जाएगा। उसका रेट, फीचर्स, लुक -सब छिप पाएगा। मोबाइल अगर इम्प्रेशन के काम न आया तो क्या फायदा। सो पहले वाला सुझाव ही मान लें। एक हाथ एक्स्ट्रा दे दें। फाइनल!
वैसे तो गॉड जी! मैं आपको और भी कई सुझाव दे सकता हूं, बट यू नो, मुझे बिना मांगे सलाह देने की आदत नहीं है। बेसिकली इट्स योअर जॉब, जस्ट डू इट!

आस्था का वह कोना!

नए शहर में घर मिला तो उसमें किचन और टॉइलट के अलावा कुल तीन कमरे थे। दो बेडरूम और एक ड्राइंगरूम है। फिर बेडरूमों के बीच कामकाजी बंटवारा यह हुआ कि एक पति-पत्नी का और दूसरा बच्चे का। धीरे-धीरे घर में जरूरत की चीजें भरती गईं। उनके बीच जो थोड़ा-बहुत स्पेस बचता था, वहीं चिंता के क्षणों में चहलकदमी की जा सकती थी या रात को सारे लोग साथ बैठ कर टीवी देख सकते थे। रोज सुबह नहा कर अगरबत्ती जलाने और मंत्र बुदबुदाने का सिलसिला किशोरावस्था में ही टूट चुका था इसलिए घर में भगवान के लिए जगह निकालने की बात ही कभी दिमाग में नहीं आई।
इधर गांव से मां आई तो देखकर आश्चर्य हुआ कि इस अल्लम-गल्लम के बीच ही उसने थोड़ी सी जगह अपने ठाकुर जी के लिए भी निकाल ली। बेटे के कमरे की एक आलमारी में किताबें-कॉपियां, कॉमिक्स और खिलौने भरे रहते थे। उसी में से एक खाना उसने अगरबत्ती और दिया जलाने के लिए सुरक्षित कर लिया। जो पतली सी गद्दी बेंत वाली कुर्सी पर बिछाने के काम आती थी, वह पूजा के लिए मां की पार्ट टाइम आसनी बन जाने लगी। घंटी, तस्वीरें और मूर्तियां वह गांव से अपने साथ लाई थी- इनके बिना तो उसका बिस्तरबंद ही नहीं बंधता। दो-चार फूल घर की बालकनी में हमेशा खिले रहते हैं और मां के आदेश पर अगरबत्तियां मेरी पत्नी थोक भाव में लेती आईं। इस तरह गांव जितना भव्य तो नहीं, लेकिन कामचलाऊ पूजा-पाठ के लिए पर्याप्त एक मंदिर इसी घर में निकल आया।
जब भी मां यहां होती है, सुबह साढ़े चार बजे घर की एक बत्ती जल जाती है। जाड़ा हो या गर्मी, पांच बजे तक मां नहा-धोकर तैयार हो जाती है। उसकी परेशानी सिर्फ एक ही है- सुबह-सुबह जल देने के लिए ताजे पानी की। नल में पानी साढ़े छह बजे के बाद आता है। लेकिन हर रोज वह अत्यंत धीरज से डेढ़ घंटे तक इंतजार करती है। यह क्रम कभी भंग नहीं होता, भले ही जाड़े के दिनों में घर के बाकी सदस्य इस पर मन ही मन झुंझलाते-बुड़बुड़ाते रहें।
मैं अक्सर सोचता हूं, यह सारा कुछ किस लिए? कौन से देवता इससे खुश हो जाने वाले हैं? और हो भी जाएं तो इस महानगर में रोज ही चली आने वाली नई-नई मुसीबतों से निपटने में उनसे भला किस मदद की उम्मीद की जा सकती है?
जवान होने के बाद मेरा जीने का व्याकरण कुछ और ही हो गया, लिहाजा मां के सोचने के तरीके को बहुत गंभीरता से समझने की कोशिश मैंने कभी नहीं की। अब लगता है कि बात-बेबात नाराज होकर आपा खो देने या परेशानी की घड़ियों में हताशा में डूब जाने या किसी बात का गलत अर्थ लगा कर अपना और पूरे घर का मूड खराब कर देने के जो दुर्गुण मेरे अंदर मौजूद हैं, उनसे मां का वास्ता जरा कम ही है। बुरे से बुरे हालात में भी कुछ रास्ता निकल आने की उम्मीद, उसे खोज लाने की जुगत मुझे अपने मन की गहराइयों में घुसकर टटोलनी पड़ती है। लेकिन यहां तक पहुंचने से पहले सब कुछ तितर-बितर हो जाने की आशंकाएं मुझे नाउम्मीदी के जिस मुकाम तक पहुंचा चुकी होती हैं, वैसा मैंने मां के साथ होते कभी नहीं देखा।
क्या आस्था ने यह कठिन चढ़ाई चढ़ने में वाकई मां को कुछ मदद पहुंचाई है?
मेरे और मां के मिजाज के बीच का यह फर्क किशोरावस्था की तरफ बढ़ते मेरे बेटे के साथ दोनों के अलग-अलग तरह के रिश्तों में भी जाहिर होता है। मां-बाप की बातों का प्रतिरोध उसकी सहज वृत्ति है, लेकिन दादी से बहस करते हुए उसका तीखापन गायब हो जाता है। क्या इस फर्क की वजह मेरी मां के पास मौजूद आस्था की पूंजी ही है?
माँ का ठाकुर जी वाला कोना बेटे के कमरे में है और बीच-बीच में मैं उसे भी स्कूल जाने से पहले अगरबत्ती जलाते देखता हूं। मेरे लिए वह जगह आज भी घर के एक कमरे में मौजूद आलमारी का एक खाना ही है लेकिन वहां ठहरी अगरबत्ती की खुशबू ने उसे एक अलग शख्सियत दे दी है। हम पति-पत्नी पूजा नहीं करते, लेकिन घर में नया-नया बना यह आस्था का कोना जितना मां का है, उतना ही हमारा भी है।

लोगों को इस्तेमाल नहीं, प्यार करना चाहिए

एक आदमी अपनी नई चमचमाती कार की सफाई कर रहा था कि उसी समय उसके 4 साल के बेटे ने कहीं से एक पत्थर का टुकड़ा उठाकर कार पर स्क्रैच लगा दिया। गुस्से में वह अपने बेटे का हाथ खींचकर बस मारता चला गया। उसे यह एहसास भी नहीं हुआ कि उसने अपने बेटे के हाथ को बुरी तरह से ऐंठ रखा है। बाद में उसे हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां पता चला कि उसके हाथों में कई जगह फ्रैक्चर्स हैं , जिसकी वजह से बच्चे की कोई भी उंगलियां काम नहीं कर रही हैं। बच्चे ने अपने पापा को दर्द भरी निगाहों से देखा और पूछा, ' पापा मेरी उंगलियां कब ठीक होंगी ?'
वह आदमी काफी दुखी था और अपने बच्चे के इस सवाल पर बिल्कुल मूक बना रहा। वह वापस अपनी कार के पास गया और गुस्से में बार-बार उसे ठोकर मारी। अपनी ही करनी से दुखी उस बाप की नज़र कार के उसी स्क्रैच पर पड़ी , जिसे देखकर उसके आंसू बहने लगे। कार पर बेटे ने लिखा था , ' लव यू डैड ' ( मैं आपसे प्यार करता हूं पापा)। ग़म में डूबे उस बाप ने अगले ही दिन आत्महत्या कर ली। शायद सही ही कहा गया है कि गुस्से और प्यार की कोई सीमा नहीं होती है , पर खूबसूरत और अच्छी लाइफ के लिए बेहतर है कि आप बाद वाले शब्द यानी ' प्यार ' को चुनें।
चीजें इस्तेमाल करने के लिए होती है और लोग प्यार करने के लिए होते हैं, लेकिन आज दुनिया की यही दिक्कत है कि लोगों का इस्तेमाल किया जाता है और चीजों से लोग प्यार करते हैं। क्या आप मानते हैं कि आज वास्तव में प्यार और जज़्बात के मायने बदल गए हैं। चीज़ों को लोग इतनी अहमियत दे बैठते हैं और उससे इतना प्यार कर बैठते हैं कि उसके सामने इंसानियत भी दम तोड़ देती है ?

सबसे सुखी

बुद्ध एक बार पाटलिपुत्र पहुंचे। उनके विहार में प्रतिदिन अनेक लोग मिलने और अपनी श्रद्धा अर्पित करने आते थे। उनके साथ चर्चा होती थी, प्रवचन भी होता था। कई आगंतुक सिर्फ बुद्ध के उपदेश सुनने के लिए आते थे, कई लोग अपने मन की उलझनों के बारे में भी उन से पूछते थे, बुद्ध उनका समाधान करते थे। एक दिन बुद्ध की उस सभा में सम्राट, अमात्य, सेनापति व भद्रसेन भी मौजूद थे। प्रवचन के बाद आनंद ने एक प्रश्न किया, भंते, सुख क्या है? यहां सबसे सुखी कौन है?
बुद्ध क्षण भर मौन रहे और उपस्थित भद्र जनों की ओर देखा। उनके उत्तर की प्रतीक्षा में सभा में सन्नाटा छाया रहा।
भक्त जन सोचने लगे कि बुद्ध अवश्य राजा, अमात्य या किसी नगर श्रेष्ठि की ओर इंगित करेंगे। परंतु बुद्ध ने सबसे पीछे एक कोने में बैठे एक फटेहाल, कृशकाय व्यक्ति की ओर संकेत कर कहा, वह ...सबसे अधिक सुखी वह है। भक्तजन चकित रह गए। इतने धनी और वैभव संपन्न लोगों के बीच भला यह फटेहाल व्यक्ति कैसे सबसे सुखी हो सकता है।
दुविधा और बढ़ गई। तब बुद्ध ने लोगों की जिज्ञासा को देखते हुए स्वयं एक प्रश्न किया कि आप सब अपनी-अपनी जरूरतों के बारे में बताएं। सभी ने अपनी- अपनी जरूरतें बताईं। अंत में उस फटेहाल व्यक्ति की भी बारी आई। उससे भी पूछा कि तुम्हारी क्या-क्याजरूरतें हैं। यदि कभी पाने का अवसर मिले तो क्या पाना चाहोगे? उसने कहा, कुछ भी नहीं। फिर भी आपने पूछा है, तो कहूंगा कि मुझमें ऐसी चाह पैदा हो कि मन में और कोई चाह पैदा न हो। क्यों? क्या तुम्हें नए वस्त्र और धन नहीं चाहिए? आनंद ने पूछा। नहीं, मेरी आवश्यकताएं इतने से पूरी हो जाती हैं, उसने कहा। उपस्थिति जनों को समाधान मिल गया, व्यक्ति धन, वैभव, वेशभूषा आदि से सुखी नहीं होता। सुख व्यक्ति के भीतर रहता है। और जिस व्यक्ति के भीतर प्यास है, और पाने की चाह है, महत्वाकांक्षा है -वह भला कैसे सुखी हो सकता है।

रचनाकार की भावना

पत्नी की फटकार से आहत तुलसीदास घर-बार छोड़ कर काशी आ गए और वहां उन्होंने स्वामी नरहरिदास के शरण में रहकर पंदह वर्षों तक वेदों और पुराणों का अध्ययन किया। बाद में उन्होंने रामचरितमानस की रचना की। इस ग्रंथ की ख्याति धीरे-धीरे देश भर में फैल गई लेकिन तुलसीदास पर इसका कोई असर नहीं हुआ। वह पहले की तरह ही दीन-हीन अवस्था में एक कुटिया में रहते थे।
पुस्तक की प्रशंसा सुन कर एक बार काशी के राजा उनके पास आए और बोले, 'अब आप साधारण व्यक्ति नहीं रहे। प्रभु के स्वरूप को आपने जिस तरह प्रतिबिंबित किया है वह कोई साधारण आदमी नहीं कर सकता। आप तो साक्षात भगवान के अवतार हैं। रामचरितमानस एक साधारण पुस्तक भर नहीं है। इसमें आपने भगवान राम के समूचे स्वरूप को जिस तरह अंकित किया है, वह बेजोड़ है। ऐसा महान रचयिता दीन-हीन अवस्था में एक कुटिया में रहे, यह मुझे मंजूर नहीं है। आप को राज्य की तरफ से सभी तरह की सुविधाएं दी जाएंगी। अब आप गरीबी का चोला उतार कर फेंक दीजिए।'
इस पर तुलसीदास ने कहा, 'राजन्, आप जिस पुस्तक की इतनी प्रशंसा कर रहे हैं और जिसकी वजह से आप मुझे हर तरह की सुविधाएं देने को कह रहे है, वह मेरी गरीबी के कारण ही लिखी गई। मैं ऐश्वर्य में रहकर शायद प्रभु के प्रति इतना समर्पित नहीं हो पाता। मुझे सुख-साधन की चाह होती तो मैं इस रास्ते पर बढ़ता ही नहीं। अब तो मैं जिस रास्ते पर बढ़ गया हूं उससे वापस नहीं लौट सकता। प्रभु के चरणों में जो सुख है वह कहीं और नहीं है। कृपया मुझे इस सुख से वंचित मत कीजिए। आप मुझे रामचरितमानस का रचयिता तुलसीदास ही रहने दीजिए, कुछ और मत बनाइए। मुझे प्रभु से दूर मत कीजिए राजन्।' तुलसीदास के ये शब्द सुन कर राजा का अभिमान चूर-चूर हो गया। वह चुपचाप लौट गए।

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A Mysterious Tree in Andhra Pradesh

At a glance you may be confused the above tree with a massive trunk with a 'Baobab'
tree (which is renowned to possess the largest tree trunks of the world) but, this is yet
another unknown specie which is seen in the close proximity of a hermitage deep in the
dense forest in 'Andra Pradesh' in India.
Now have a close look at the bark and experience the unbelievable figures of creatures engraved in the surface
of the entire tree trunk!!
Absolutely real!!!













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