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काम के दायरे
इतनी बड़ी बातों को छोड़ दें और सिर्फ इस पर विचार करें कि यदि कोई सफाईकर्मी भी पूरे मनोयोग से किसी पार्क का कोई कोना इस तरह से साफ करता है कि वह जगह आने-जाने वालों का मन प्रसन्न कर दे, तो उसके काम करने की प्रक्रिया और उस प्रक्रिया से गुजरने वाले क्षण साहित्य रचने या रेडियो सिग्नल पकड़ने वाला यंत्र बनाने वाले क्षणों से कमतर नहीं होते। पर असल में इंसान ने अपने-अपने विभिन्न कार्यों के लिए श्रेष्ठता की इतनी श्रेणियां बना रखी हैं कि अक्सर वह दूसरे के कार्यों का न तो महत्व समझ पाता है और न ही उन्हें यथोचित आदर दे पाता है। तो जो इन दायरों से बाहर निकल सके, वही सच्चा गुणग्राही हो सकता है।
सफलता और सादगी
बर्तन साफ करने के बाद वह भारतीय उद्योगपति की तरफ देखकर बोला 'बैठिए, मुझे ही हेनरी फोर्ड कहते हैं।' यह सुनकर उद्योगपति आश्चर्यचकित रह गए और उन्होंने कहा, 'आप इतने बड़े व्यक्ति होकर बर्तन स्वयं साफ कर रहे थे। यह काम तो एक नौकर भी कर सकता है।' उद्योगपति की बात सुनकर हेनरी फोर्ड मुस्कुराते हुए बोले, 'मैं शुरू में साधारण आदमी था। अपना काम स्वयं करता था। अपने कठोर परिश्रम के कारण ही मैं आज कारखानों का मालिक बन पाया हूं। मैं उन दिनों को भूल कर खुद पर गर्व न करूं इसलिए अपना काम स्वयं करता हूं और सही मायने में यही मेरी सफलता का राज है । सफल होने के लिए सादगी व ईमानदारी का होना बहुत जरूरी है।'
भारतीय उद्योगपति हेनरी फोर्ड की कामयाबी का राज समझ गए और उनके सामने नतमस्तक होकर वापस आ गए। रास्ते में उन्होंने संकल्प लिया कि वह भी अपने कार्य में पूर्ण ईमानदारी बरतेंगे तथा सादगीपूर्ण जीवन गुजारेंगे। जल्दी ही उद्योगपति ने भारत में अपनी अलग पहचान बना ली।
आस्था का प्रश्न
यह सुनकर राजकन्या रोने लगी और अपने पिता के घर लौटने की तैयारी करने लग गई। पति ने कहा, 'मैं जानता था कि यही होगा। तुम्हारा लालन-पालन महल में हुआ है, तुम मुझ जैसे गरीब के साथ निभा नहीं सकोगी।' राजा की बेटी ने उत्तर दिया, 'मैं गरीबी से नहीं डरती। मुझे दुख इस बात का है कि ईश्वर के प्रति आपका पूर्ण विश्वास नहीं है। इसी से आपने सोचा कि कल क्या खाएंगे और रोटी का टुकड़ा बचाकर रख लिया।
ईश्वर को देना होगा तो वह स्वयं देगा, हम इसकी चिंता क्यों करें। मैंने सोचा था कि मुझे ऐसा पति मिले जिसकी प्रभु भक्ति में कोई कमी न हो। इसी से मैंने आपका वरण किया पर मैं संभवत: गलत हूं।' युवक बहुत पछताने लगा। राजकन्या ने कहा, 'आप कान खोलकर सुन लीजिए कि आपके साथ रोटी का यह टुकड़ा रहेगा या मैं।' यह सुनकर युवक की आंखें खुल गईं। उसने रोटी का टुकड़ा फेंक दिया।
भारती का फैसला
लोग समझ नहीं पाए कि मालाएं हार-जीत का फैसला कैसे कर सकती हैं। लेकिन भारती से किसी ने कुछ नहीं कहा। वह चली गईं। उनकी गैरमौजूदगी में दोनों विद्वानों के बीच शास्त्रार्थ जारी रहा। कुछ समय बाद भारती लौटीं। उन्होंने ध्यान से दोनों के गले में पड़ी माला को देखा फिर अपना निर्णय सुनाया। शंकराचार्य विजयी हुए। लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि यह कैसा निर्णय है, यहां न रहते हुए भी उन्होंने अपने पति को पराजित घोषित कर दिया। एक विद्वान ने नम्रता से पूछा,' देवी, आप यहां नहीं थीं फिर आप को कैसे पता चला कि मंडन मिश्र शास्त्रार्थ में शंकराचार्य का मुकाबला नहीं कर सके?'
भारती ने कहा, 'जब मनुष्य हारने लगता है तो उसे गुस्सा आता है। गुस्सा आने पर शरीर का ताप बढ़ जाता है। क्रोध मनुष्य की आत्मा को जलाता है और उसका असर शरीर के हर अंग पर पड़ता है। आप ने गौर किया होगा कि क्रोध के ताप से मेरे पति के गले की माला मुरझा गई थी जबकि शंकराचार्य के गले की माला पहले की तरह खिली हुई थी।'
भारती के निर्णय का समर्थन मंडन मिश्र ने भी किया। उन्होंने माना कि वह शास्त्रार्थ में कमजोर पड़ रहे थे लेकिन अहंकारवश इस बात को स्वीकार नहीं कर रहे थे। सभी विद्वानों ने भारती के पक्षपात रहित निर्णय की सराहना की।
मुक्ति का मार्ग
उस समय उनका केवल एक ही शिष्य उनके पास था, आनंद। आनंद ही लंबे समय से बुद्ध की सेवा कर रहा था। आनंद ने सोचा कि बुद्ध का अंत समय निकट है। अगर यह बात पास के गांव में रहने वाले बुद्ध के शिष्यों को न बताई जाए तो वे नाराज होंगे। आनंद के यह बताने पर लोग बुद्ध का दर्शन करने उस वृक्ष के पास पहुंचने लगे। आसपास के इलाकों में इस बात की चर्चा फैल गई। एक व्यक्ति अपनी जिज्ञासा के समाधान के लिए काफी उत्सुक था।
वह भोलाभाला ग्रामीण था और दुनियादारी को ढंग से नहीं जानता था, फिर भी उसके मन में एक जिज्ञासा थी, जिसे लेकर वह परेशान था। बुद्ध ने उसे अपने पास बुलाया। उस ग्रामीण ने हाथ जोड़ कर बुद्ध से जीते जी मुक्ति पाने का मार्ग बताने की प्रार्थना की। बुद्ध ने ग्रामीण से कहा, 'जीते जी जन्म-मरण से मुक्ति प्राप्त करना चाहते हो तो जीवन में तीन बातें याद रखो और इन बातों पर अमल भी करो।'
सब लोग ध्यान से सुनने लगे। बुद्ध ने कहा,' पहली बात है पापों से, जहां तक संभव हो, बचो। दूसरी बात है जीवन में जितने भी पुण्य कर्म कर सकते हो, करो एवं तीसरी बात है अपना मन, चित्त निर्मल रखो।' ये शब्द कहते ही बुद्ध ने अपने प्राण त्याग दिए। बुद्ध की इन तीन शिक्षाओं को अपनाकर ग्रामीणों ने जीते जी मुक्ति का मार्ग पाया। ये तीन शिक्षाएं मानवता के लिए अमूल्य देन हैं।
असीमित पुण्य
नींद टूटते ही राजमाता बेचैन हो गईं। उन्होंने अपने कर्मचारियों को मंदिर से उस महिला को राजभवन लाने के लिए कहा। कर्मचारी मंदिर पहुंचे और वहां से उस महिला को पकड़ कर ले आए।
गरीब महिला थर-थर कांप रही थी। राजमाता ने उस गरीब महिला से कहा, 'मुझे अपने संचित पुण्य दे दो, बदले में मैं तुम्हें सोने की मुद्रएं दूंगी।' राजमाता की बात सुनकर वह महिला बोली, 'महारानी जी, मुझ गरीब से भला पुण्य कार्य कैसे हो सकते हैं। मैं तो खुद दर-दर भीख मांगती हूं। भीख में मिले चने चबाते-चबाते मैं तीर्थयात्रा को निकली थी।
कल मंदिर में दर्शन करने से पहले एक मुट्ठी सत्तू मुझे किसी ने दिए थे। उसमें से आधे सत्तू से मैंने भगवान सोमेश्वर को भोग लगाया तथा बाकी सत्तू एक भूखे भिखारी को खिला दिया। जब मैं भगवान को ठीक ढंग से प्रसाद ही नहीं चढ़ा पाई तो मुझे पुण्य कहां से मिलेगा?' गरीब महिला की बात सुनकर राजमाता का अहंकार नष्ट हो गया। वह समझ गईं कि नि:स्वार्थ समर्पण की भावना से प्रसन्न होकर ही भगवान सोमेश्वर ने उस महिला को असीमित पुण्य प्रदान किए हैं। इसके बाद राजमाता ने अहंकार त्याग दिया और मानव सेवा को ही अपना सवोर्परि धर्म बना लिया ।
अंतिम कसक
बीमारी के कारण उनके शरीर में असहनीय पीड़ा होने लगी। वे बार-बार ईश्वर से प्रार्थना करते और कहते, 'हे ईश्वर, अब मुझसे यह पीड़ा सही नहीं जाती। मुझे इस रोगग्रस्त शरीर से मुक्ति देकर अपने पास बुला लो।' लेकिन इस तरह मृत्यु को बुलाने से वह थोड़े ही आती है, उन्हें पीड़ा भुगतनी पड़ रही थी।
एक दिन वह सोचने लगे कि मुझसे जरूर कुछ न कुछ गलती हुई है, जिसकी मुझे पीड़ा के रूप में सजा भुगतनी पड़ रही है। बहुत सोचने पर उन्हें याद आया कि एक बार बीमा कराते समय उन्होंने अपनी मधुमेह की बीमारी को बेहद सफाई से छिपाकर बीमा करा लिया था। यह याद आते ही उन्हें अपने शरीर में होने वाली पीड़ा का कारण समझ में आ गया और उन्होंने तभी बीमा अधिकारी को बुलाया और उससे बोले, 'भैया, मैंने जब आपसे बीमा कराया था, उस समय मैं मधुमेह से ग्रस्त था। किंतु उस समय मैंने यह बात आपको नहीं बताई थी। इसलिए मेरा यह बीमा रद्द कर दिया जाए। मेरे मरने के बाद कोई भी इस बीमा राशि का अधिकारी नहीं होगा। मैंने न्यायाधीश के रूप में हमेशा सत्य का आचरण किया, किंतु व्यक्तिगत जीवन में मैं उस पर टिके रहने से लोभवश चूक गया। इसी कारण आज यह कष्ट भोग रहा हूं।' उनके कहने पर बीमा अधिकारी ने उनका बीमा रद्द कर दिया। बीमा रद्द होने के बाद उनके चेहरे पर संतोष व शांति की झलक दिखाई दी। इसके बाद उसी रात उन्होंने प्राण त्याग दिए।
ज्ञान की खोज
जिज्ञासावश उससे भी जाजलि ने किसी सच्चे गुरु का पता बताने को कहा, जो उसे सही राह दिखा सके। साधु ने उसे सलाह दी कि वह उसी नगर के तुलाधार वैश्य के पास जाए। उसी से उसे ज्ञान मिलेगा। जाजलि पहले तो साधु को अविश्वास से देखता रहा, उसे लगा कि शायद साधु उसका मजाक बना रहा है। लेकिन उसके मुख पर गंभीरता देखकर जाजलि ने उसकी सलाह आजमाने का इरादा किया।
वह तुरंत ही साधु से विदा लेकर तुलाधार वैश्य की तलाश में निकल पड़ा। तुलाधार के पास पहुंचकर उसने अपनी इच्छा प्रकट की और निवेदन किया कि मुझे ऐसा ज्ञान दीजिए जिससे मेरा जीवन सुधर जाए।
तुलाधार ने विस्मय से उसकी ओर देखा, फिर बोला, भैया, मैं तो कोई ज्ञानी-पंडित नहीं हूं जो सच्ची राह दिखा सकूं। पर हां, वह रास्ता जरूर बता सकता हूं, जिस राह स्वयं चलता हूं। सच पूछो तो मैं हमेशा अपनी इस तराजू से मार्गदर्शन पाता हूं। इसकी डंडी हमेशा सीधी रखनी है, न ऊंची, न नीची। जाजलि ने अनुभव किया कि शायद यही कारण है कि दुकान पर आने वाले सभी लोगों के लिए तुलाधार -हर छोटे-बडे़, अमीर- गरीब के लिए अपना कार्य-व्यवहार हमेशा एक समान रखता है। जाजलि को समझ में आ गया कि हम जो कुछ कर्म करते हैं, उसका सीधा परिणाम हमारे मन पर होता है। कर्मयोगी की साधना और जप उसके कर्म में ही निहित होता है। उसी से उसकी चित्त शुद्धि होती है। और निर्मल मन पर ज्ञान का प्रभाव पड़ता है। जाजलि जिस उद्देश्य को लेकर तुलाधार के पास गया था, उसकी पूर्ति हो गई। उसे ज्ञान मिल गया।
गहनों का त्याग
अवश्य दूंगा, गांधीजी ने उसकी उम्र को देखते हुए चिंता से पूछा, पर क्या तुमने अपने माता-पिता से ये गहने देने की आज्ञा ले ली है?
कौमुदी कुछ कहे इससे पहले ही एक सज्जन बोल उठे, कौमुदी के पिता सभा में उपस्थित हैं और मानपत्रों की जो नीलामी चल रही है, उसमें बोली लगाकर आपकी मदद कर रहे हैं। कौमुदी के पिता ने स्वीकार किया कि कौमुदी ने उनसे आज्ञा लेकर ही गहने दान दिए हैं। गांधीजी फिर भी संतुष्ट नहीं हुए, उन्होंने कौमुदी से कहा, तुमने जो गहने दिए हैं, उनके बदले नए नहीं पहनोगी? नहीं पहनूंगी, कौमुदी ने दृढ़ता से कहा। लेकिन गहने न पहनने से तुम्हारी माता को तो दुख होगा? हां, दुख तो होगा, लेकिन वे इसके लिए मुझ पर जबरदस्ती नहीं करेंगी, कौमुदी ने कहा। किंतु तुम शादी तो करोगी ही, तब तुम्हारा पति यदि गहनों के त्याग को पसंद न करे तो? गांधी जी ने चिंता से पूछा। कौमुदी एक क्षण के लिए विचारमग्न हो गई, फिर बोली, बापू! मैं ऐसा पति चुनूंगी जो मुझ पर गहने पहनने के लिए दबाव न डाले। यह सुनकर गांधीजी गद्गद हो गए और हस्ताक्षर देते समय लिखा, तुमने जो गहने दिए हैं, उनकी अपेक्षा तुम्हारा त्याग ही सच्चा अलंकार है।
श्लोक की कीमत
दैव योग से कुछ समय बाद भारवी की मृत्यु हो गई और उनकी पत्नी को आर्थिक समस्याओं ने घेर लिया। घर में और कुछ था नहीं, मजबूर हो कर वे भारवी के लिखे उस श्लोक को ही लेकर बाजार में बेचने के लिए पहुंचीं। यह भी एक संयोग ही था कि उधर नगर सेठ ने घोषणा कर रखी थी कि बाजार में जो वस्तु बिकने से वंचित रह जाएगी, उसे वह स्वयं खरीद लेगा। शाम हो गई पर किसी ने वह श्लोक खरीदने में रुचि नहीं दिखाई। बाजार खत्म होने के बाद बिकने से बचा रह गया वह श्लोक खरीदने के लिए सेठ भारवी की पत्नी के पास पहुंचे, पर कीमत बीस स्वर्ण मुदाएं सुनकर सन्न रह गए। प्रश्न प्रतिष्ठा का था, सो अनमने भाव से उसे खरीद लिया और शोभा के लिए उसे बड़े-बड़े स्वर्ण अक्षरों में लिखवाकर अपने शयन कक्ष में टंगवा दिया।
कुछ दिनों बाद सेठ की पत्नी गर्भवती हुई। लेकिन उसी समय अचानक सेठ को व्यापार के प्रयोजन से दूसरे देश जाना पड़ा। वहां कारोबार के सिलसिले में उसे लंबे समय तक रुकना पड़ा। कुछ वर्षों बाद जब सेठ वापस लौटा तो घर में अपनी पत्नी को एक किशोर के साथ लेटा हुआ पाया। वह घृणा और क्रोध से भर उठा। म्यान से तलवार निकालकर उन्हें मारने बढ़ा, तभी उसकी नजर दीवार पर टंगे भारवी के श्लोक पर पड़ी। श्लोक का मर्म समझकर उसने पहले पत्नी से पूछना उचित समझा, यह कौन है? पत्नी खुशी से भरी सो रहे किशोर के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, आपका पुत्र। नगर सेठ सोचने लगा, बीस स्वर्ण मुद्राओं में खरीदे इस श्लोक ने आज मुझे सर्वनाश से बचा लिया।
उचित पारिश्रमिक
विश्वेश्वरैया ने वकील को काम के बाद सात डॉलर देना मंजूर कर लिया। दस्तावेज तैयार होने के बाद वह उसे लेने के लिए वकील के घर पहुंचे। उस समय वकील महोदय घर पर नहीं थे। उनकी पत्नी ने उन्हें दस्तावेज दे दिया। विश्वेश्वरैया ने वहीं पर दस्तावेज को देखा। उन्हें वकील द्वारा बनाया गया दस्तावेज बहुत पसंद आया। वकील के काम से प्रभावित होकर विश्वेश्वरैया ने वकील की पत्नी को सात की जगह आठ डॉलर दे दिए और दस्तावेज लेकर वापस आ गए।
शाम को वकील महोदय विश्वेश्वरैया के पास पहुंचे और उन्हें एक अतिरिक्त दिया गया डॉलर वापस करने लगे। विश्वेश्वरैया उसे लेने से इनकार करते हुए बोले, 'महोदय, मुझे आपके द्वारा तैयार दस्तावेज बहुत अच्छा लगा, मैं अपने को रोक न सका। आपके काम से प्रसन्न होकर ही मैंने एक डॉलर अधिक दे दिया है।' विश्वेश्वरैया की इस बात पर वकील साहब ने कहा, 'मैंने आपसे बढ़िया कार्य के ही पैसे तय किए थे। पारिश्रमिक तय होने पर अच्छा काम करके देना ही मेरा धर्म था। इसलिए मैं अतिरिक्त राशि नहीं ले सकता।'
विश्वेश्वरैया के बहुत आग्रह के बावजूद वकील महोदय ने वह अतिरिक्त एक डॉलर नहीं लिया और उसे वापस देकर चले गए। विश्वेश्वरैया उस वकील की काम के प्रति अनूठी लगन देखकर गदगद हो गए। मैसूर लौटकर उन्होंने उस वकील के बारे में सबको बताया।
अक्षय भिक्षापात्र
व्यापारी बोला, 'मैं अपना सारा संचित धन और अन्न देने को प्रस्तुत हूं, किंतु वह इतना नहीं है कि उससे पूरी प्रजा के लिए एक सप्ताह के भोजन का प्रबंध हो सके।' नगर सेठ ने निवेदन किया, 'आज्ञा दें तो मैं अपना संपूर्ण कोष लुटा सकता हूं किंतु प्रजा को दस दिन भी उससे भोजन मिलेगा या नहीं इसमें संदेह है।' स्वयं नरेश ने भी अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। सभा मौन हो गई। सबने सिर झुका लिए। तभी सभा में सबसे पीछे खड़ी मैले-कुचैले वस्त्रों वाली एक भिखारिन ने हाथ जोड़कर कहा 'प्रभु आज्ञा दें तो मैं अकाल पीड़ितों को भोजन दूंगी।'
सभी की दृष्टि उसकी ओर उठ गई। किसी ने क्रोधपूर्वक पूछा, 'तेरे यहां क्या खजाना गड़ा है कि तू सबको भोजन देगी?' लेकिन तथागत उसे देखकर प्रसन्न हो गए। वह जानते थे कि नगरसेठ, व्यापारी और नरेश के मिले-जुले प्रयासों से जो काम नहीं हो सकता, वह सच्चे हृदय से सेवा के लिए तत्पर जनसेवक से हो सकता है। वह महिला गरीब भले ही थी लेकिन उसका साहस और संकट से लड़ने की आकांक्षा अनूठी थी।
सभा में उपस्थित लोगों की शंकाओं एवं संशय की परवाह किए बिना उस स्त्री ने कहा, 'मैं तो भगवान की कृपा के भरोसे प्रयास करूंगी। मेरा कर्त्तव्य बस प्रयास करना है। मेरा कोष तो आप सबके घर में हैं। आपकी उदारता से ही मेरा भिक्षापात्र अक्षय बनेगा।' सचमुच उस भिखारिणी का भिक्षापात्र अक्षय पात्र बन गया। वह जहां भिक्षा लेने गई, लोगों ने उसके लिए अपने भंडार खोल दिए। जब तक खेतों में अन्न पैदा नहीं हुआ, भिखारिणी प्रजा को भोजन देती रही।
अहिंसा का संकल्प
श्रावक मुनि बोले, 'इसके लिए तुम्हें अहिंसा-पालन का प्रण करना होगा।' यह सुनकर वह बोला, 'महाराज, यह तो असंभव है क्योंकि पक्षी ही मेरी आजीविका का साधन हैं। मैं अहिंसा का व्रत कैसे ले सकता हूं ?' इस पर मुनि ने कहा, 'यदि तुम ऐसा नहीं कर सकते तो कम से कम किसी एक पक्षी के प्रति अहिंसा बरतने का व्रत लो।' मुनि की बात पर बहेलिया प्रसन्न हो गया और बोला, 'ठीक है महाराज, मैं आज से यह प्रण करता हूं कि कौए को नहीं पकड़ूंगा, न ही उसकी हत्या करूंगा।'
इस प्रकार मुनि ने बहेलिए को आंशिक अहिंसा का व्रत दिला दिया। घर पहुंचते ही बहेलिए के दिमाग में आया कि जो प्राण कौए में है वही तो कबूतर में भी है। यदि कौए की हत्या हिंसा और पाप है तो अन्य पक्षियों की हत्या में हिंसा कैसे नहीं होगी। विचारों की इसी उधेड़बुन में वह रात भर सो नहीं पाया।
सवेरे उठकर वह मुनि के पास पहुंचा और पक्षियों को पकड़ने का जाल फेंकते हुए बोला, 'मुनिवर, मैं अब भविष्य में किसी भी प्राणी की हत्या नहीं करूंगा। मैं पूर्ण अहिंसा का व्रत लेता हूं। पक्षियों की जगह अब मैं शाक-भाजी बेचकर या अन्य कोई काम कर गुजारा करूंगा।' श्रावक मुनि बहेलिए की बात पर प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया। इसके बाद बहेलिये ने सब्जी की दुकान खोल ली जो धीरे-धीरे काफी चलने लगी। उसने अहिंसा का संकल्प अपनी आखिरी सांस तक निभाया ।
सबसे अच्छी गुरु दक्षिणा
आश्रम छोड़कर जाने के बाद शिष्य अलग-अलग पेशे अपनाते। अपने पेशे, अपने कामकाज से जिसे जो कमाई होती, उसका कुछ हिस्सा वह श्रद्धापूर्वक ऋषि को दे दिया करता था। एक बार आश्रम में एक अत्यंत सीधा-सादा शिष्य आया। वह साधारण गृहस्थ था। वह दिन भर मेहनत करके अपने परिवार का पालन पोषण करता था लेकिन उसके अंदर कुछ सीखने की तीव्र इच्छा थी इसलिए वह आश्रम में चला आया था। उसने अपने व्यवहार से सबका दिल जीत लिया। ऋषि उसे स्नेहपूर्वक पढ़ाया करते थे। जो कुछ उसे सिखाया जाता, उस पर वह मनोयोग से अमल करता था।
जब उसकी शिक्षा पूरी हुई तो उसने भी पूछा, 'गुरु जी दक्षिणा में क्या दूं?' ऋषि ने उससे भी वही कहा जो वह और शिष्यों से कहा करते थे। वह चला गया और एक साल बाद लौटा। बोला, 'दक्षिणा देने आया हूं।' ऋषि उसे देखकर बड़े खुश हुए, फिर उन्होंने पूछा, 'क्या लेकर आए हो बेटा?' उस शिष्य ने दस लोगों को खड़ा कर दिया, जो उसके गांव के थे। उसने कहा, 'मैं गुरु दक्षिणा में ये दस नए शिष्य लाया हूं।' ऋषि ने पूछा, 'किसलिए?' उसने कहा, 'जो शिक्षा आपने मुझे दी थी, मैंने उसे इन तक पहुंचाया। उतने से ही इनका जीवन संवर गया। अब आप इन सब को अपना शिष्य बना लें ताकि इतने लोग और आपके बताए रास्ते पर सही तरीके से चल सकें।' ऋषि ने प्रसन्न होकर कहा, 'तुमने मुझे अब तक की सबसे अच्छी गुरु दक्षिणा दी है।'
परिवार और प्रेम
दंपती असमंजस में पड़ गया, किसे बुलाएं, किसे छोड़ें। उन्होंने आगंतुकों से थोड़ा समय मांगा और आपस में सलाह करने के लिए वापस घर में आ गए। पूरा परिवार अंदर बैठकर सलाह करने लगा। स्त्री बोली, 'हमें वैभव को ही अंदर बुलाना चाहिए। उसके आने से बाकियों की कमी भी पूरी हो सकती है।' लेकिन उसकी बात काट कर पति ने कहा, 'वैभव सफलता का मोहताज है। इसलिए सफलता को ही बुलाओ। उसके साथ होने से वैभव अपने आप साथ आ जाएगा।' इस पर बेटे ने सलाह दी, 'नहीं पिताजी, आप सबसे पहले नीति को बुलाएं। जहां नीति होती है, वहीं सफलता मिलती है, और जहां सफलता मिलती है, वहां वैभव अपने आप आता है।'
इसके बाद सभी बहू की राय जानने के लिए उसकी ओर देखने लगे। वह धीरे से बोली, 'मेरी मानिए तो आप लोग सबसे पहले प्रेम को ही बुलाइए। बाकी सभी पात्र बाहरी जीवन के मददगार हैं, लेकिन घर-परिवार में सबसे बड़ा मित्र प्रेम ही होता है। प्रेम बना रहे तो अन्य आगंतुकों का साहचर्य किसी न किसी उद्यम से हासिल हो ही जाएगा।' बहू की सलाह पर दंपती ने बाहर आकर प्रेम को निमंत्रित किया। आश्चर्य कि जब प्रेम भीतर आया तो उसके पीछे-पीछे बाकी तीनों भी आ गए। अंदर आकर वे बोले, 'आप ने हम तीनों में से किसी एक को बुलाया होता, तो हम अकेले ही आते। पर प्रेम जहां जाता है, वहां हम अवश्य साथ होते हैं।'
तीर्थयात्रा का अर्थ
तीर्थयात्रा के दौरान उन लोगों ने वैसा ही किया। वे भगवान का स्मरण करते हुए हर नदी में स्नान करते और पोटली में बंधी ककड़ियों को भी नहलाते। कुछ समय के बाद वे अपने गांव आ पहुंचे। वे तुकाराम जी के पास गए और ककड़ियों की पोटली उन्हें दे दी। तुकाराम जी ने उन सब को दूसरे दिन भोजन के लिए अपने घर आमंत्रित किया।
तुकाराम जी ने उन ककड़ियों की सब्जी बनाई और परोसा। भोजन करने के बाद सब एक स्थान पर बैठ गए। उनसे तुकाराम जी ने पूछा, 'आप लोगों ने ककड़ियों को इतने तीर्थ स्थलों पर स्नान करवाया। उनके कड़वेपन में कोई परिवर्तन हुआ क्या?' उन लोगों ने उत्तर दिया, 'नहीं महाराज, ककड़ियों के कड़वेपन में कोई अंतर नहीं आया, वो तो वैसी की वैसी रहीं जैसी पहले थीं।' तुकाराम जी उन्हें समझाते हुए बोले, 'इतने तीर्थ स्थलों पर स्नान करके और इतने मंदिरों में जाकर भी ककड़ियां कड़वी ही रहीं। उन्होंने अपने कड़वेपन का सहज गुण त्यागा नहीं।
इसी प्रकार आप लोग भी तीर्थयात्रा करने के बाद भी वैसे के वैसे बने रहते हैं, आप में कोई परिवर्तन नहीं आता। जब आपके दुर्गुण छूटते ही नहीं तो सारी तीर्थयात्रा व्यर्थ है। तीर्थयात्रा से मनुष्य की बुद्धि का विकास होना चाहिए। हमारे मन में परिवर्तन लाने, उसे शुद्ध और निर्मल बनाने के लिए ही तीर्थयात्राएं रखी गई हैं। यह कोई विनोद यात्रा नहीं है।'
Shame on media and government...A BITTER TRUTH OF INDIAN GOVERNMENT
What the bloody hell........ ......... ....!!!
The most difficult thing for any patriotic Indian is to keep quiet and take this mail as just another one.
I wish this mail reaches the right people, today itself.
Please take this as high priority to forward.





Hoisting Pakistan Flag and burning Indian Flag


A Kashmiri separatist leader burning the Indian Flag
Indian Flag Burnt in Srinagar
Shame on Indian Govt and Media also for not making it Breaking News
The only country of the world, where one can dare to burn the national flag..
All these become the masala breaking news of Indian news channels:
*If Tendulkar cuts the cake which is made to look like national flag, he is condemned.
*If Mandira Bedi wears a saree with the flags of all the countries being portrayed on that, is made to apologies.
*If one cop in Kolkata and one in Bangalore is terminated of his duties for throwing the Indian national flag on ground, by mistake.
Then why double standards:
*During the ongoing Amarnath Sangarsh, Jammuites holding the Indian National Flag and chanting 'Bharat Mata ki Jai' are open fired by the J&K Police on orders from the Police Commissioner( belongs to Kashmir) Peaceful protesters are killed.
*Like in case of Amarnath case, people in Kashmir when want to get some demand fulfilled, protest by burning Indian national Flag, hoisting Pakistani Flag and chanting 'Hindustan Murdabad, Pakistan Jindabad'. But no body condemns. Infact, all such protest are followed by a team of union ministers visiting Kashmir and immediately sanctioning a few thousand crore rupees for Kashmiris.
*Every year on 14th Aug (Pakistani Indipendence Day), Pakistani flag is hoisted every where in Kashmir, including the govt. buildings and on 15th Aug, same people burn the Indian flag.
This only happens in India!!!!
just see the pictures above..
Really shame on Indian media
Who never shows these pics...
shame shame shame
If These Are Breaking News


I plead you to take initiative, raise your voice against this kind of anti-nationalist activities.
Also, not to forget the political leaders who just for preserving their vote-banks let this happen.
And last, but no way the least, the insensitive, irresponsible and money-thirsty journalism, which does not raise voives,
does not build a correct opinion of a common man; rather distracts the attention of people to stupid, worthless things such as comedy shows, tv serials,
news related to what is the daily routine of Salman Khan and Sanjay Dutt in prison and what food did that have.
JAI HIND...
CONGRESS KAA NAYA NARA "JAI HO.....A SONG OF SLUMDOG MILLIONAIRE....."
TRULY ACCEPTABLE...........AND PROVE THEY ARE REALLY BEHIND CREATING SLUMS WHICH IN RETURN GIVES AN OSCAR WINNING MOVIE "SLUMDOG MILLIONAIRE" ............G8......REALLY JAI HO............
Why Indian Moms r simply d best?
The next day, he brings three beautiful women into the house and sits them down on the couch and they chat for a while. Later, he says, "Okay Ma, guess which one I'm going to marry." She immediately replies, "The one on the right." " That's amazing, Ma. You're right. How did you know?"
The Indian mother replies,
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" I DON'T LIKE HER "
call 1098 (only in India ) - child helpline
Please circulate this message which can help feed many children.
PLEASE, DON'T BREAK THIS CHAIN.....
'Helping hands are better than Praying Lips'..
Pass this to all whom you know and whom you don t k now as well..
नजीर की दयालुता
नजीर साहब बेकसूर घोड़े को मौत के मुंह में जाते देख द्रवित हो गए और बोले, 'महाराज, इस घोड़े को आप मारिए नहीं, हमें दे दीजिए।' यह सुनकर राजा आश्चर्यचकित हो गए और बोले, 'नजीर साहब, यदि आप इस घोड़े पर बैठेंगे तो फिर हमारे बच्चों को कौन पढ़ाएगा?' राजा के यह कहने पर नजीर साहब बोले, 'महाराज, आप घबराइए मत, हमें कुछ नहीं होगा। हम आपको इस बात का भरोसा दिलाते हैं।'
नजीर साहब के अनेक बार ऐसा कहने पर राजा ने घोड़ा उन्हें दे दिया। घोड़ा शांत भाव से उनके साथ चला गया। दूसरे दिन राजा समेत उनके सभी कारिंदे यह देखकर हैरान रह गए कि नजीर साहब उसी घोड़े पर आराम से बैठकर बच्चों को पढ़ाने के लिए आए हैं। उन्हें हैरान देख नजीर साहब मुस्कराते हुए बोले, 'इसमें इतनी हैरानी न करिए। इस मूक प्राणी को भी मुहब्बत समझने की अक्ल खुदा ने दी है।' यह सुनकर राजा अत्यंत शर्मिंदा हुए और जान गए कि हर प्राणी प्रेम का भूखा होता है। फर्क यह है कि कई लोग मूक प्रेम की भाषा नहीं समझ पाते। वह घोड़ा लंबे समय तक नजीर साहब के साथ रहा।
मां की आज्ञा
कर्जन को जब इसका पता चला तो उन्होंने पहल करते हुए एक दिन कहा, 'मिस्टर मुखर्जी, आप को खुशी होगी कि इस बार लंदन जाने वालों की लिस्ट में आप का नाम सबसे ऊपर होगा।' मुखर्जी ने कहा, 'थैंक्यू सर।' मुखर्जी जब शाम को घर लौटे तो उन्होंने यह बात अपनी मां को बताई। पहले तो मां चुप रहीं, फिर बोलीं, 'क्यों बेटा, मेरे पास रहने में तुम्हें दिक्कत हो रही है जो तुम मुझे छोड़ कर जाना चाहते हो? कोई मां अपने पुत्र को विदेश जाने की आज्ञा नहीं दे सकती। मैं भी नहीं दूंगी।'
मां की बात सुन कर मुखर्जी ने लन्दन जाने का इरादा छोड़ दिया। दूसरे दिन वह सीधे कर्जन के पास पहुंचे और उन्होंने कहा, 'सर, मैं लंदन नहीं जा सकता।' कर्जन चौंक कर बोले, 'आखिर क्यों? लंदन जाना तो भारतीय अपना गौरव समझते हैं।' मुखजीर् ने कहा, 'आप ठीक कह रहे सर, लेकिन मेरी मां की इच्छा नहीं है कि मैं लंदन जाऊं।' कर्जन बोले, 'क्या मेरी आज्ञा से बढ़ कर आपकी मां की इच्छा है। यह नहीं हो सकता। आपको जाना ही होगा। अपनी मां से जाकर कहिए कि यह लॉर्ड का हुक्म है।' मुखर्जी कर्जन के रवैये से तिलमिला गए। उन्होंने जेब से एक कागज निकाला और उस पर कुछ लिख कर कर्जन को देते हुए कहा, 'यह रहा मेरा इस्तीफा।' इस्तीफे में लिखा था- मैं मां कीआज्ञा को आप के आदेश से ऊंचा मानता हूं इसलिए मेरा इस्तीफा स्वीकार करें। कर्जन ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया ।
वास्तविक सुख
राबिया बोलीं, 'गुरुदेव, इसमें कोई राज नहीं है। मेरी छोटी कुटिया भी मुझे बड़ी लगती है। एक दरी है, वह लगती है कि सबसे आरामदेह बिछावन है। मेरी कुटिया में एक वक्त के भोजन की भी सामग्री होती है तो मुझे लगता है कि मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि प्रभु ने मुझे भूखा नहीं सोने दिया। जब मैं सोती हूं तो मुझे यह पता नहीं होता कि मेरे पीठ के नीचे गद्दा है या टाट। उस समय मुझे दिन भर के किए गए सत्कर्मों के स्मरण से परम आनंद मिलता है कि मैं अपना सब कुछ भूल कर परम पिता की गोद में सुख पूर्वक सो जाती हूं।'
संत जाने लगे तो राबिया बोली, 'क्या मैं भी आप के साथ चलूं धन इकट्ठा करने?' संत ने कहा, 'तुमने बता दिया कि दुनिया का परम सुख कहां है। अब मुझे आश्रम की जरूरत नहीं है।' वह काशी लौटकर अपने शिष्यों से बोले, 'अब हमें भव्य आश्रम की जरूरत नहीं है। जितना धन इकट्ठा हुआ है उसे गरीबों में बांट दो।' वह स्वयं एक साधारण कुटिया बना कर रहने लगे।
बालिका की सीख
जब वह राष्ट्रपति आवास पर पहुंचे तो लिंकन अपने काम में व्यस्त थे फिर भी उन्होंने बाप-बेटी का भव्य स्वागत किया और आने का कारण पूछा। उस व्यक्ति ने कहा, 'मेरी बेटी आपकी बहुत बड़ी प्रशंसक है। वह आपसे मिलने के लिए बहुत हठ कर रही थी। इसलिए मैं उसे आपके पास लेकर आया हूं ताकि वह आपको देख सके।' इतना सुनते ही लिंकन उठ खड़े हुए और उस बालिका को अपनी गोद में उठाकर अपने छोटे से बगीचे में घूमने लगे। उन्होंने उस बालिका से हंस-हंस कर ढेर सारी बातें की और उसका मनोरंजन किया।
बालिका को खुश देखकर लिंकन भी बेहद खुश हो रहे थे। जब वे लौटकर जाने लगे तो बालिका ने कहा, 'पिताजी, हमारे राष्ट्रपति तो बहुत सुंदर हैं। बहुत प्यारे हैं। आप तो कहते थे कि वे भद्दे हैं, बदसूरत हैं, मैं उन्हें देखकर डर जाऊंगी। मगर मुझे तो जरा भी डर नहीं लगा। मुझे तो उनके साथ बड़ा मजा आया।' यह सुनकर पिता ने लज्जा से नजरें झुका लीं। बालिका ने उसे बहुत बड़ी सीख दी थी।
आत्मा की रक्षा
संन्यासी ने सारी घटना बुद्ध को बताई। बुद्ध ने संन्यासी को आम्रपाली का अतिथि बनने की अनुमति दे दी। इस पर कुछ अन्य शिष्यों ने आपत्ति व्यक्त की। बुद्ध ने उनकी शंका का निवारण करते हुए कहा, 'इसकी आंखों में थोड़ी भी तृष्णा या वासना नहीं है। यदि मैं मना कर देता तो भी यह मेरी बात अवश्य मानता।' इस बीच आम्रपाली आम को ताजा रखने का प्रयत्न करती रही लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। कुछ दिनों बाद संन्यासी उसके पास पहुंचा और उसने वह आम मांगा। लेकिन वह सड़ गया था, उसमें कीड़े पड़ गए थे।
संन्यासी ने उसकी गुठली निकाल ली और बाकी का हिस्सा फेंक दिया। उसने आम्रपाली से कहा, 'इस गुठली का कुछ नहीं बिगड़ा। इसमें अब भी पुन: उगने की शक्ति है। उसी तरह शरीर गल या सड़ जाएगा लेकिन आत्मा बची रहेगी। आत्मा का ध्यान करो।' यह सुनकर आम्रपाली ने भी बुद्ध की शरण में जाने का फैसला किया।
भक्त की आराधना
श्रीकृष्ण बोले, 'यह सत्यवचन है नारद। हम आराधना में ही मग्न थे।' नारद ने कहा, 'भगवन् आप और आराधना?' श्रीकृष्ण बोले, 'देखना चाहोगे, हम किसकी आराधना में लीन थे? आओ भीतर आओ।' भीतर एक पुष्पमंडित पालने पर अनेक छोटी-छोटी प्रतिमाएं झूल रही थीं। नारद जी ने एकाग्र दृष्टि से देखा। कुछ प्रतिमाएं गोकुल की गोप-मंडली की थीं, तो कुछ स्वयं उनकी। तब नारद जी ने बौराई आंखों से प्रभु को निहारा। फिर पूछा, 'भला आराध्य आराधकों की आराधना कब से करने लगा? भक्त गुहार करे और भगवान कृपा, यह सीधी रीत तो समझ में आती है। पर यह दूसरी अटपटी परंपरा आपने क्यों चलाई?' श्रीकृष्ण ने कहा, 'मुझे बताओ नारद, भक्त मेरी आराधना क्यों करते हैं? किस प्रयोजन से मेरी उपासना करते हैं?'
नारद बोले, 'प्रभु वे आपसे आपका प्रेम चाहते है।' श्रीकृष्ण ने कहा 'नारद, ठीक इसी प्रयोजन से मैं भी अपने भक्तों की आराधना करता हूं। मैं भी भक्त से प्रेम की आकांक्षा रखता हूं। भक्त से उसका प्रेम मांगता हूं। प्रेम का यही महादान पाने के लिए मैं निराकार से साकार होकर आता हूं। पर मानव इसी बात को नहीं समझ पाता। वह तो हमसे केवल धन-दौलत ही मांगता है जबकि मैं भक्त का प्रेम पाने के लिए उसकी ओर देखता रहता हूं।'
आदर्श की राह
लालबहादुर शास्त्री ने किशोरावस्था में ही अपना जीवन राष्ट्रीय आंदोलन तथा समाज-सुधार के लिए समर्पित कर दिया था। वह हमेशा लोगों को जागरूक करने व सद्कार्यों के प्रचार-प्रसार में ही लगे रहते थे। एक बार उन्होंने देखा कि वधू पक्ष की ओर से दहेज न मिलने पर वर पक्ष वाले वधू पक्ष वालों को जलील कर रहे थे और उन्हें खरी-खोटी सुना रहे थे। शास्त्री जी से रहा न गया, उन्होंने तत्काल हस्तक्षेप किया और वर पक्ष वालों को काफी फटकारा।
दहेज जैसी कुरीति को लेकर वह बेहद दु:खी हुए। इस घटना के बाद उन्होंने ठान लिया कि वह जिस युवती से विवाह करेंगे, उससे दहेज के नाम पर फूटी कौड़ी भी नहीं लेंगे। उनका मानना था कि ऐसा करने से ही समाज में शिक्षित युवाओं में दहेज का विरोध करने की चेतना जागेगी और इस कुरीति को देश से दूर किया जा सकेगा।
जब उनके विवाह की बातें चल रही थीं, तो उन्होंने apne अभिभावकों से साफ कह दिया कि वह इसी शर्त पर विवाह करेंगे कि दहेज के नाम पर एक फूटी-कौड़ी भी न ली जाए। अभिभावकों ने उनकी इस बात का समर्थन किया और इस तरह बिना दहेज के उनका विवाह सादगी के साथ संपन्न हुआ। जब वधू को विदा किया जाने लगा तो कई लोगों ने कहा कि लड़की का मायके से बिल्कुल खाली हाथ आना शुभ नहीं होता इसलिए शगुन के तौर पर उसे कुछ न कुछ तो दिया ही जाना चाहिए।
शास्त्री जी भी यह बात सुन रहे थे। उन्होंने लोगों से कहा, 'यदि आप सबका यही कहना है तो मैं आपकी बात का सम्मान करते हुए वधू को चरखा ले जाने की इजाजत दे सकता हूं।' उनकी बात मान ली गई और उनकी पत्नी ललिता जी केवल अपने साथ चरखा लेकर विदा हुईं। अपने आदर्श के प्रति शास्त्री जी की इस प्रतिबद्धता को देख लोग दंग रह गए।
अनूठा डॉक्टर
जॉर्ज जोसेफ तुरंत उस व्यक्ति के घर पहुंचे। उन्होंने देखा कि एक वृद्धा चारपाई पर लेटी हुई है। एक बालक पास बैठा रो रहा है। सम्राट ने अपने को डॉक्टर बताकर महिला से उसकी बीमारी के बारे में पूछा। महिला ने कहा, 'मेरे पति ही घर का खर्च चलाते थे। हाल में उनकी मृत्यु हो गई। कमाने वाला कोई नहीं रहा।
मेरे मरने के बाद मेरे अनाथ बच्चों का क्या होगा, यही चिंता मुझे बीमार बनाए हुए है।' सम्राट ने कागज पर कुछ लिखा और वृद्धा को देते हुए कहा,'इस पर मैंने दवा लिख दी है। अपने बेटे को भेजकर मंगा लेना।' यह कहकर वह चले गए।
कुछ देर बाद वृद्धा का बेटा डॉक्टर को लेकर आया। वृद्धा ने उससे कहा, 'बेटा, अभी थोड़ी देर पहले एक डॉक्टर आया था। वह पर्चे पर कोई दवा लिखकर गया है।' बेटे के साथ आए डॉक्टर ने उसे देखने के बाद कहा, 'माता जी, आपके पास एक अनूठा डॉक्टर आया था। वह आपकी बीमारी का स्थायी इलाज कर गया है। वह कोई साधारण डॉक्टर नहीं था, वह तो हमारे देश का राजा था।' सम्राट जोसेफ ने उस कागज पर लिखा था कि वृद्धा तथा इसके परिवार को राजकोष से नियमित धन देने की व्यवस्था की जाए।
सही न्याय
किसानों का संकल्प
किसान बोले, 'वर्षा हो या नहीं, हम तो भूमि की सफाई करेंगे और हल भी चलाएंगे। यदि हम यह प्रयास छोड़ दें तो हमारी भावी पीढ़ी बिल्कुल बेकार हो जाएगी और कृषि करना भूल जाएगी। फिर बारह वर्ष के बाद हमारे बच्चे क्या खाएंगे। हम यह कार्य प्रतिवर्ष बराबर करते रहेंगे। मेघ बरसें या नहीं बरसें, यह उनकी इच्छा है, मगर हम अपना धंधा नहीं छोड़ेंगे, कृषि करते चले जाएंगे। ऐसा करते-करते एक दिन अवश्य बारिश भी होगी और खेती भी।' किसानों के दृढ़ संकल्प के सामने इंद्र भी झुक गए।
पहली आहुति
स्वामी श्रद्धानंद की यह बात सुनकर लोग हैरत से उनको देखते रह गए। किंतु स्वामी जी के दृढ़ निश्चय को देखकर उन्होंने इस बात की हामी भर दी कि सब बच्चों के सकुशल रहने पर वे भी अपने बच्चों का दाखिला वहां करा देंगे। कुछ समय बाद वहां अनेक बच्चे पढ़ने लगे। एक दिन स्वामी जी के एक सहयोगी ने उनसे पूछा, 'आपके व आपके परिजनों के बच्चों के आने के बाद दूसरे बच्चे भी यहां आने लग गए। इसका क्या कारण है?' सहयोगी की बात पर स्वामी जी बोले, 'वेदों में कहा गया है कि जिस कार्य को हम संपन्न कराना चाहते हैं, उसमें सबसे पहले स्वयं आहुति देनी चाहिए इसलिए मैंने गुरुकुल के निर्माण के लिए भी सबसे पहले अपनी कमाई दान में दी और उसके बाद सबसे पहले अपने दोनों पुत्रों को गुरुकुल में रखा ताकि लोग ये जान लें कि सभी बच्चे मेरे अपने बच्चों के समान हैं और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी मुझ पर अपने बच्चों की तरह ही है। इससे लोगों का भय निकल गया।'
सचिव की ईमानदारी
सबसे बड़ा धन
एक दिन उनके पड़ोस में रहने वाले व्यापारी बहराम के घर से रोने-धोने व शोर-शराबे की आवाजें सुनाई पड़ीं। यह सुनते ही अहमद बहराम के घर जा पहुंचे। वहां पहुंचने पर अहमद को पता चला कि बहराम जब खरीदा गया माल ऊंटों पर लादकर घर ला रहा था तो रास्ते में डाकुओं ने उसका सारा सामान लूट लिया। अपनी सारी संपत्ति लुट जाने के कारण वह पागल सा हो गया और आत्महत्या करने जा रहा था । ऐन मौके पर कुछ लोगों ने आकर उसे आत्महत्या जैसा घृणित कार्य करने से बचा लिया। खुदकुशी न कर पाने के कारण वह आवेश में बिना सोचे-समझे रो-रो कर बोले जा रहा था, 'कंगाल होकर जीने का क्या मतलब है। मैं आखिर क्यों जिंदा रहूं?' अहमद को सामने खड़ा देखकर उसे थोड़ी राहत मिली।
अहमद ने उसके पास आकर पूछा, 'बहराम, जब तुम पैदा हुए थे, तो क्या वह धन तुम्हारे पास था जो लुटेरों ने लूट लिया?' यह सुनकर बहराम बोला, 'नहीं, मैंने बड़ा होने पर अपनी मेहनत से वह दौलत इकट्ठा की थी।' इस पर अहमद बोले, 'क्या लुटेरों ने मेहनत करने वाले तुम्हारे हाथ-पैरों को भी लूट लिया है?' बहराम बोला, 'नहीं'। इस पर अहमद ने कहा, 'तुम्हें तो किसी ने नहीं लूटा। तुम्हारी असली दौलत यानी तुम्हारे हाथ-पैर सही सलामत हैं और फिर तुम्हारे दिल में रहम है। इन से बढ़कर कोई और धन नहीं है। फिर तुम अपने आप को कंगाल कैसे बता रहे हो?' अहमद के इन शब्दों को सुनकर बहराम का सारा दु:ख-दर्द दूर हो गया। उसने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि वह मरने की बात सोच रहा था। अगले ही दिन से वह पूरी लगन के साथ व्यापार में जुट गया।
द्रौपदी हाथ जोड़कर बोली, 'यह बहुत ही अभद्रता की बात है, पर आप आज्ञा देते हैं तो कहनी ही पड़ेगी। आप अभी धर्म की ऐसी उत्तम व्याख्या कर रहे हैं किंतु जब मेरा चीरहरण हो रहा था तब आपका यह धर्मज्ञान कहां चला गया था? उस समय सभा में आप और न जाने कितने योद्धा बैठे थे। मैं कुल की मर्यादा की रक्षा के लिए आप लोगों से रो-रोकर प्रार्थना कर रही थी, मगर किसी ने मेरी रक्षा नहीं की। भरी सभा में मेरा अपमान पूरे कुल का अपमान था।
मुझे लगा कि उसी घटना के बाद आपको धर्म का ज्ञान हुआ। मन में यह बात आते ही मुझे हंसी आ गई। आप मुझे क्षमा करें।' इस पर पितामह ने कहा, 'तुम्हारा प्रश्न सही है। बेटी, मुझे धर्मज्ञान तो उस समय भी था, परंतु दुर्योधन का अन्यायपूर्ण अन्न खाने से मेरी बुद्धि मलीन हो गई थी और पौरुष जवाब दे चुका था, इसी से मैं उस सभा में ठीक निर्णय करने में असमर्थ हो गया था। परंतु अब अर्जुन के बाणों के लगने से मेरे शरीर का सारा रक्त निकल गया है और मेरी बुद्धि शुद्ध हो गई है। इससे इस समय मैं धर्म के तत्वों को समझ रहा हूं और उसका विवेचन कर रहा हूं।'
अन्न का असर
द्रौपदी हाथ जोड़कर बोली, 'यह बहुत ही अभद्रता की बात है, पर आप आज्ञा देते हैं तो कहनी ही पड़ेगी। आप अभी धर्म की ऐसी उत्तम व्याख्या कर रहे हैं किंतु जब मेरा चीरहरण हो रहा था तब आपका यह धर्मज्ञान कहां चला गया था? उस समय सभा में आप और न जाने कितने योद्धा बैठे थे। मैं कुल की मर्यादा की रक्षा के लिए आप लोगों से रो-रोकर प्रार्थना कर रही थी, मगर किसी ने मेरी रक्षा नहीं की। भरी सभा में मेरा अपमान पूरे कुल का अपमान था।
मुझे लगा कि उसी घटना के बाद आपको धर्म का ज्ञान हुआ। मन में यह बात आते ही मुझे हंसी आ गई। आप मुझे क्षमा करें।' इस पर पितामह ने कहा, 'तुम्हारा प्रश्न सही है। बेटी, मुझे धर्मज्ञान तो उस समय भी था, परंतु दुर्योधन का अन्यायपूर्ण अन्न खाने से मेरी बुद्धि मलीन हो गई थी और पौरुष जवाब दे चुका था, इसी से मैं उस सभा में ठीक निर्णय करने में असमर्थ हो गया था। परंतु अब अर्जुन के बाणों के लगने से मेरे शरीर का सारा रक्त निकल गया है और मेरी बुद्धि शुद्ध हो गई है। इससे इस समय मैं धर्म के तत्वों को समझ रहा हूं और उसका विवेचन कर रहा हूं।'
धर्म का सार
यह उन दिनों की बात है, जब स्वामी विवेकानंद अमेरिका में थे। वहां कई महत्वपूर्ण जगहों पर उन्होंने व्याख्यान दिए। उनके व्याख्यानों का वहां जबर्दस्त असर हुआ। लोग स्वामी जी को सुनने और उनसे धर्म के विषय में अधिक अधिक से जानने को उत्सुक हो उठे। उनके धर्म संबंधी विचारों से प्रभावित होकर एक दिन एक अमेरिकी प्रोफेसर उनके पास पहुंचे। उन्होंने स्वामी जी को प्रणाम कर कहा, 'स्वामी जी, आप मुझे अपने हिंदू धर्म में दीक्षित करने की कृपा करें।'
इस पर स्वामी जी बोले, 'मैं यहां धर्म प्रचार के लिए आया हूं न कि धर्म परिवर्तन के लिए। मैं अमेरिकी धर्म-प्रचारकों को यह संदेश देने आया हूं कि वे धर्म परिवर्तन के अभियान को बंद कर प्रत्येक धर्म के लोगों को बेहतर इंसान बनाने का प्रयास करें। यही धर्म की सार्थकता है। यही सभी धर्मों का मकसद भी है। हिंदू संस्कृति विश्व बंधुत्व का संदेश देती है, मानवता को सबसे बड़ा धर्म मानती है।' वह प्रोफेसर उनकी बातों से अभिभूत हो गए और बोले, 'स्वामी जी, कृपया इस बारे में और विस्तार से कहिए।'
प्रोफेसर की यह बात सुनकर स्वामी जी ने कहा, 'महाशय, इस पृथ्वी पर सबसे पहले मानव का आगमन हुआ था। उस समय कहीं कोई धर्म, जाति या भाषा न थी। मानव ने अपनी सुविधानुसार अपनी-अपनी भाषाओं, धर्म तथा जाति का निर्माण किया और अपने मुख्य उद्देश्य से भटक गया। यही कारण है कि समाज में तरह-तरह की विसंगतियां आ गई हैं। लोग आपस में विभाजित नजर आते हैं। इसलिए मैं तुम्हें यह कहना चाहता हूं कि तुम अपना धर्म पालन करते हुए अच्छे ईसाई बनो। हर धर्म का सार मानवता के गुणों को विकसित करने में है इसलिए तुम भारत के ऋषियों-मुनियों के शाश्वत संदेशों का लाभ उठाओ और उन्हें अपने जीवन में उतारो।' वह प्रोफेसर मंत्रमुग्ध यह सब सुन रहे थे। स्वामी जी के प्रति उनकी आस्था और बढ़ गई।
कौन हुआ गरीब
राजा फिर महर्षि के पास आया और बोला, 'मुझे स्वर्ण-सिद्धि की विद्या सिखाएं।' कणाद बोले,' आप मुझे गरीब बता रहे थे। पर मैं कभी आपके दरवाजे पर कुछ मांगने नहीं गया पर आप मुझसे मांगने के लिए याचक की तरह खड़े हो। बताओ गरीब कौन हुआ।'
दूसरे का हित
एक अधिकारी ने पूछा, 'यहां अनाज कहां मिलेगा?' उसने कहा, 'मैं बताता हूं, मेरे साथ आओ।' सब उसके साथ चले। कुछ ही दूरी पर फसल से लहलहाता हुआ खेत मिला। अधिकारियों ने प्रसन्नता से कहा, 'अब हमें पर्याप्त अनाज मिल जाएगा।' बूढ़े ने कहा, 'नहीं, यहां नहीं, अभी आगे चलिए।' कुछ दूरी पर दूसरा खेत आया। फसल की ओर इशारा करते हुए वृद्ध ने कहा, 'यहां से अनाज ले लें।' अधिकारियों ने कहा, 'इस खेत से ज्यादा अनाज तो उस खेत में था, जिसे हम पीछे छोड़ आए।' बूढ़े ने कहा, 'आप ठीक कहते हैं, लेकिन वह खेत मेरा नहीं था। दूसरे के अन्न पर मेरा कोई हक नहीं है। उसे किसी और को देने का मुझे अधिकार नहीं। यह खेत मेरा है। इसका अन्न मैं किसी को भी दे सकता हूं।' अधिकारी अवाक् रह गए।
A Letter to Every Indian - APJ
Why is the media here so negative?
Why are we in India so embarrassed to recognize our own strengths, our achievements?
We are such a great nation. We have so many amazing success stories but we refuse to acknowledge them. Why?
We are the first in milk production.
We are number one in Remote sensing satellites.
We are the second largest producer of wheat.
We are the second largest producer of rice.
Look at Dr. Sudarshan , he has transferred the tribal village into a self-sustaining, self-driving unit. There are millions of such achievements but our media is only obsessed in the bad news and failures and disasters.
I was in Tel Aviv once and I was reading the Israeli newspaper. It was the day after a lot of attacks and bombardments and deaths had taken place. The Hamas had struck... But the front page of the newspaper had the picture of a Jewish gentleman who in five years had transformed his desert into an orchid and a granary.. It was this inspiring picture that everyone woke up to. The gory details of killings, bombardments, deaths, were inside in the newspaper, buried among other news.
In India we only read about death, sickness, terrorism, crime.. Why are we so NEGATIVE?
Another question:
Why are we, as a nation so obsessed with foreign things?
We want foreign T.Vs, we want foreign shirts. We want foreign technology. Why this obsession with everything imported. Do we not realize that self-respect comes with self-reliance? I was in Hyderabad giving this lecture, when a 14 year old girl asked me for my autograph. I asked her what her goal in life is. She replied: I want to live in a developed India . For her, you and I will have to build this developed India . You must proclaim. India is not an under-developed nation; it is a highly developed nation.
Do you have 10 minutes?
Allow me to come back with a vengeance.
Got 10 minutes for your country? If yes, then read; otherwise, choice is yours.
YOU say that our government is inefficient.
YOU say that our laws are too old.
YOU say that the municipality does not pick up the garbage.
YOU say that the phones don't work, the railways are a joke. The airline is the worst in the world, mails never reach their destination.
YOU say that our country has been fed to the dogs and is the absolute pits.
YOU say, say and say. What do YOU do about
Take a person on his way to Singapore. Give him a name - 'YOURS'. Give him a face - 'YOURS'. YOU walk out of the airport and you are at your International best. In Singapore you don't throw cigarette butts on the roads or eat in the stores. YOU are as proud of their Underground links as they are. You pay $5 (approx. Rs. 60) to drive through Orchard Road (equivalent of Mahim Causeway or Pedder Road) between 5 PM and 8 PM. YOU come back to the parking lot to punch your parking ticket if you have over stayed in a restaurant or a shopping mall irrespective of your status identity… In Singapore you don't say anything, DO YOU? YOU wouldn't dare to eat in public during Ramadan, in Dubai . YOU would not dare to go out without your head covered in Jeddah.
YOU would not dare to buy an employee of the telephone exchange in London at 10 pounds (Rs.650) a month to, 'see to it that my STD and ISD calls are billed to someone else.'YOU would not dare to speed beyond 55 mph (88 km/h) in Washington and then tell the traffic cop, 'Jaanta hai main kaun hoon (Do you know who I am?). I am so and so's son. Take your two bucks and get lost.' YOU wouldn't chuck an empty coconut shell anywhere other than the garbage pail on the beaches in Australia and New Zealand .
Why don't YOU spit Paan on the streets of Tokyo? Why don't YOU use examination jockeys or buy fake certificates in Boston??? We are still talking of the same YOU. YOU who can respect and conform to a foreign system in other countries but cannot in your own. You who will throw papers and cigarettes on the road the moment you touch Indian ground. If you can be an involved and appreciative citizen in an alien country, why cannot you be the same here in India?
In America every dog owner has to clean up after his pet has done the job. Same in Japan.
Will the Indian citizen do that here?' He's right. We go to the polls to choose a government and after that forfeit all responsibility.
We sit back wanting to be pampered and expect the government to do everything for us whilst our contribution is totally negative. We expect the government to clean up but we are not going to stop chucking garbage all over the place nor are we going to stop to pick a up a stray piece of paper and throw it in the bin. We expect the railways to provide clean bathrooms but we are not going to learn the proper use of bathrooms.
We want Indian Airlines and Air India to provide the best of food and toiletries but we are not going to stop pilfering at the least opportunity.
This applies even to the staff who is known not to pass on the service to the public.
When it comes to burning social issues like those related to women, dowry, girl child! and others, we make loud drawing room protestations and continue to do the reverse at home. Our excuse? 'It's the whole system which has to change, how will it matter if I alone forego my sons' rights to a dowry.' So who's going to change the system?
What does a system consist of? Very conveniently for us it consists of our neighbours, other households, other cities, other communities and the government. But definitely not me and YOU. When it comes to us actually making a positive contribution to the system we lock ourselves along with our families into a safe cocoon and look into the distance at countries far away and wait for a Mr.Clean to come along & work miracles for us with a majestic sweep of his hand or we leave the country and run away.
Like lazy cowards hounded by our fears we run to America to bask in their glory and praise their system. When New York becomes insecure we run to England . When England experiences unemployment, we take the next flight out to the Gulf. When the Gulf is war struck, we demand to be rescued and brought home by the Indian government. Everybody is out to abuse and rape the country. Nobody thinks of feeding the system. Our conscience is mortgaged to money.
Dear Indians, The article is highly thought inductive, calls for a great deal of introspection and pricks one's conscience too…. I am echoing J. F. Kennedy's words to his fellow Americans to relate to Indians…..
'ASK WHAT WE CAN DO FOR INDIA AND DO WHAT HAS TO BE DONE TO MAKE INDIA WHAT AMERICA AND OTHER WESTERN COUNTRIES ARE TODAY'
Lets do what India needs from us.
Are our politicians qualified to lead us?
A successful politician is good at something that is entirely unrelated to dealing with complex policy questions. An extreme example of this is of course that of Rabri Devi, who was thrust into a position of power through no fault of her own. The truth is that in most cases our leaders have no real right to take the decisions that they do, given their levels of competence. And particularly in a complex post-globalisation world, where one needs to account for a very large number of variables, this lack of credentials can be potentially devastating for a country.
But is the truth quite that simple? Do credentials really matter that much? What credentials does Sonia Gandhi, and Rajiv Gandhi before her, have to preside over the Congress? Growing up in Italy, could she have imagined the role she has ended up playing in a country she had absolutely no connections with? And regardless of whether you agree with her brand of politics and leadership or not, it is clear that she is today a credible leader of India’s largest political organization. Nothing in her education, background or perhaps even temperament prepared her for this job. The absence of credentials is glaring in the case of Barack Obama too; as a first-time Senator from Illinois, a state that seems to specialize in corrupt politicians, he has no reason to be running the world’s most powerful country. In a certain sense, one could argue that no job can prepare you for a job like that in any case.
Politicians across the world have no real qualifications to be in charge of our lives. We could argue that the world is in a bit of a mess precisely because of this. But then, one would be forced to look at the much vaunted, highly qualified and ridiculously paid chief executives of various large corporations in the West and ask if making stupid mistakes and remaining unrepentant is the exclusive preserve of politicians alone. It does seem that education and prior qualifications do not necessarily translate into effectiveness.
The much reviled dynastic urge in politics is not so reviled in business where we look upon inheritance much more benignly. So, we have young men and women, who may or not be remotely qualified or even interested being pitchforked into roles that carry huge responsibilities after a token stint of getting one’s hands dirty and starting from the bottom that usually lasts a couple of years. The surprising thing is that the failure rate of family succession does not seem to be that much higher than that of a professionally managed company. In India, we have enough examples of the contrary, where the second generation has in fact taken the business to a new orbit. For that matter, even if we take companies like Google and Facebook, we see that they are being run by the founders, who might have expertize in thinking up new algorithms but had no clue about how to run huge corporations and yet they seem to be doing just fine.
Could it be that the idea of competence is in part a device used to determine who gets to leadership positions when there are no other means available to figure this out? So when it is possible to either elect people through voting ^ as is the case with politicians ^ or with lineage ^ as is the case with family business ^ we rely on these methods. When such universally transparent and culturally incontrovertible methods are not available or seem inappropriate, we turn to an invented system based on notions of competence and capability.
If that be the case, then the idea of credentials and qualifications may actually limit the potential of human beings by falsely convincing them about what they can or cannot do. A Sonia Gandhi has turned out to be a credible leader of a huge completely alien political organization simply because she got the opportunity. She found some hidden reservoir of skills and learnt on the job. A young business scion is able to imagine possibilities that a bright management trainee cannot simply because he does not possess that vantage point. Of course, that is not to argue that qualifications do not matter at all, but merely that they are one of the several legitimate ways of determining capability.
What certainly does matter is opportunity. We are capable of much more than we are allowed to be and what we allow ourselves to be. We are all perhaps capable of doing something magnificent if only we had the opportunity. The difference between the seemingly capable and the apparently unsuitable may be much lower than we have imagined so far. Nothing prepared a Mahendra Singh Dhoni, adept at throwing wood at leather, to lead a diverse bunch of fractious egotistic celebrities under the intense scrutiny of a billion crazed fans with such effortless ease. There is a lesson in this and you won’t find it in any textbook.
फीस पर परेशान-सा है यहां हर शख्स
छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद से ही वे हताश हैं। हालांकि सरकार ने उन्हें समय-समय पर साथ होने का सब्जबाग दिखाया लेकिन यह साथ केवल कागजी स्तर पर ही नजर आ रहा है, क्योंकि इस लड़ाई में वे अपने आपको बेहद अकेला महसूस कर रहे हैं। वेतन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद पब्लिक स्कूलों की ओर से टीचर्स के वेतन के अनुसार फीस में भी बढ़ोतरी की बातें शुरू हो गई थीं। दिल्ली सरकार ने तय किया कि फीस मनमर्जी के मुताबिक बढ़ाने नहीं दी जाएगी। इसके बाद सरकार ने फीस बढ़ोतरी पर एक कमिटी का गठन कर दिया. कमिटी की रिपोर्ट आई कि स्कूल 500 रुपये मासिक तक ट्यूशन फीस बढ़ा सकते हैं। स्कूलों का वगीर्करण भी कर दिया गया। यह फीस पिछले साल सितंबर से बढ़ाने की अनुमति दे दी गई यानी सात महीने की फीस और 2006 से अदा की जाने वाली टीचर्स की सैलरी का एरियर भी पैरंट्स के जिम्मे आ गया। यह एरियर तीन किस्तों में देने की बात कही गई।
दिल्ली में भले ही सरकारी स्कूलों का बोर्ड एग्जाम का रिजल्ट दिन दूनी-रात चौगुनी तरक्की कर रहा हो, लेकिन सचाई यही है कि आज भी पैरंट्स पब्लिक स्कूलों को ही तरजीह देते हैं। शिक्षा मंत्री हों, शिक्षा निदेशक या अन्य कोई प्रभावशाली व्यक्ति, किसी का भी बच्चा सरकारी स्कूल का स्टूडेंट नहीं है। दिल्ली के 2,000 से ज्यादा पब्लिक स्कूल एजुकेशन सिस्टम में सरकार का सहयोग तो कर रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि ज्यादातर स्कूल सिर्फ दुकानें बनकर रह गए हैं। इन स्कूल मालिकों का सीधा-सा तर्क है कि डीटीसी के बजाय अगर आपको एसी कैब में सफर करना है तो किराया अधिक देना ही होगा।
लिहाजा आज न तो स्कूल संतुष्ट हैं, न टीचर और न ही पैरंट्स। तीन चौथाई पब्लिक स्कूल ऐसे हैं जो टीचर्स को पूरा वेतन देते ही नहीं। केवल कागजों में पूरा वेतन दिया जाता है और अब कागजों में ही वेतन भी बढ़ा दिया जाएगा। जाहिर है कि इन स्कूलों के टीचर केवल मन मसोसकर बैठे हैं। बाकी एक चौथाई स्कूल ऐसे हैं जिन्हें यह लग रहा है कि सरकार ने जितना वेतन बढ़ाने की इजाजत दी है, वह पर्याप्त नहीं है। वे इस आदेश के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी में हैं। पैरंट्स इस बोझ को सहने की स्थिति में नहीं हैं।
सरकार ने पैरंट्स से कहा कि आपको कोई ऐतराज है तो शिकायत करो। जिसका बच्चा स्कूल में पढ़ रहा है, वह शिकायत का जोखिम कैसे उठा सकता है। कुछ पैरंट्स ने हिम्मत दिखाई और शिकायत की लेकिन आज तक एक भी स्कूल के खिलाफ कोई कार्रवाई की सूचना नहीं है। स्कूलों ने बोर्ड एग्जाम के एडमिट कार्ड देने के नाम पर भी ब्लैकमेलिंग की और नतीजे आने पर भी इसी प्रकार का रवैया होगा। स्कूल नए सेशन में फिर फीस बढ़ाने पर आमादा हैं और उनका यह भी तर्क है कि सरकार कानूनन इससे रोक ही नहीं सकती।
इस मामले में सरकार को जमीनी कार्रवाई करनी चाहिए थी। स्कूल मैनेजमेंट, टीचर और पैरंट्स तीनों पक्षों को एक साथ बैठाकर कोई ऐसा हल तलाश करना चाहिए था ताकि कोई भी अपने आपको ठगा-सा महसूस न करे। जब तक दिमागी तौर पर यह बात साफ नहीं होगी कि स्कूल शिक्षा की दुकान नहीं हैं और शिक्षा मुहैया कराना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है, तब तक इस चक्रव्यूह से नहीं निकला जा सकता। खासतौर पर चुनावी माहौल में सभी पक्षों को संतुष्ट करना और भी जरूरी है।
इस शहर का हर पेड़ बीमार-सा क्यों है
दरअसल, राजधानी में कंक्रीट का जंगल हरियाली को निगल रहा है और यह पेड़ भी कंक्रीट के दानव का शिकार बन गया। क्या आप जानते हैं कि हर पेड़ के चारों तरफ कम से कम छह फुट जगह अवश्य छोड़ी जानी चाहिए, लेकिन अधिकतर स्थानों पर इस नियम पर अमल नहीं किया जाता। एनडीएमसी ने अपने बजट में ट्री एंबुलेंस बनाने की घोषणा की है। यह एंबुलेंस बीमार और क्षतिग्रस्त पेड़ों की रक्षा करेगी। लेकिन वास्तव में एनडीएमसी इलाके के 95 हजार पेड़ों की क्या हालत है या उन्हें बचाने के लिए क्या किया जा रहा है, इस सवाल का जवाब आरटीआई से जानने की कोशिश की गई। आरटीआई एक्टिविस्ट देवाशीष भट्टाचार्य को जो जवाब मिले हैं, वह काफी चौंकाने वाले भी हैं और यह भी पता चलता है कि हॉर्टिकल्चर विभाग के पास पेड़ों को बचाने का कोई साधन नहीं है। यही नहीं, जहां विभाग के अधिकारी पेड़ बचाना भी चाहते हैं, वहां उनकी चलती ही नहीं है।
जिस पेड़ का ऊपर जिक्र किया गया है, एनडीएमसी ने माना है कि उसे कोई बीमारी नहीं थी। हालांकि विभाग का दावा है कि उसके कर्मचारी पेड़ों की बाकायदा निगरानी करते हैं लेकिन इसकी कोई अवधि तय नहीं है। इस नीम के पेड़ के किसी तरह बीमार या क्षतिग्रस्त होने की सूचना भी उनके पास नहीं थी। ऐसे में उस पर किसी कीटनाशक के छिड़काव की जरूरत भी महसूस नहीं की गई। जाहिर है हॉर्टिकल्चर विभाग इस पेड़ की मौत का कारण नहीं जानता और न ही इसके लिए किसी को दोषी मानता है।
एनडीएमसी क्षेत्र में तेज हवा के चलते ही अचानक पेड़ों के गिरने की घटनाएं बढ़ गई हैं। पिछले तीन सालों में करीब तीन सौ पेड़ अचानक ही मौत का शिकार हो गए हैं। इनमें से अधिकतर ब्रिटिश काल के हैं और उन्हें सड़क किनारे प्लान करके रोपा गया था। ऐसे पेड़ों को बनाए रखने की जिम्मेदारी हॉर्टिकल्चर विभाग की ही होती है लेकिन उनके आसपास फुटपाथ बनाकर उसकी जड़ों में हवा-पानी जाने का रास्ता बंद कर दिया जाता है। विभाग ने आरटीआई के जवाब में माना है कि प्रत्येक पेड़ के आसपास 6-6 फुट की जगह खाली छोड़ी जानी चाहिए।
इस तरह के निर्देश भी जारी किए जाते हैं लेकिन विभाग ने माना है कि कई बार ठेकेदार पेड़ों की जान की परवाह नहीं करते। जाहिर है कि ठेकेदार को प्रति वर्ग फुट के हिसाब से कंक्रीट बिछाने का ठेका मिलता है और वह इस नियम की परवाह नहीं करता। अधिकारी भी आंखें मूंद लेते हैं। वैसे, विभाग ने दावा किया है कि जब ऐसी कोई शिकायत सामने आती है तो संबंधित एंजीनियर को बताया जाता है। जनता से भी अनुरोध किया गया है कि वे जब ऐसा होता देखें तो विभाग को सूचित करें। क्या इस पेड़ की जगह कोई नया पौधा रोपा गया तो विभाग का जवाब है कि अगले महीने यानी मार्च में रोपा जाएगा।
पॉलिथीन पर बैन, हो पालन तो मिले चैन
सुखद स्थिति की कल्पना से संतोष तो होता है लेकिन शंकाएं भी कम नहीं हैं। ऐसे कितने फैसले हैं जिन पर पूरी तरह अमल हो पाता है? पॉलिथीन की थैलियों पर रोक तो पहले से ही है। पहले भी नोटिफिकेशन हो चुका है, जिसमें कहा गया था कि 40 माइक्रोन से पतली थैली का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। ऐसा करने पर पांच साल की कैद या एक लाख रुपया जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं। इस बार जारी नोटिफिकेशन में 40 माइक्रोन की शर्त हटा दी गई है। अगर शाब्दिक अर्थ निकाला जाए तो पॉलिथीन की थैलियों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जा रहा है, लेकिन सरकार इस बारे में खुद भी असमंजस में है।
पर्यावरण विभाग के अफसर इस बारे में बात करने से कतराते हैं। दरअसल सरकार के पास ऐसा कोई यंत्र नहीं है जो यह बता सके कि फलां पॉलिथीन बैग की मोटाई 40 माइक्रोन है या नहीं। यह ठीक वैसा ही है जैसे कार के शीशों की पारदर्शिता की सीमा तो तय कर दी गई लेकिन कोई मापक यंत्र ही मौजूद नहीं था या ट्रांसपोर्ट विभाग के पास यह जानने के लिए कोई मशीन नहीं है कि किसी वाहन की आरसी (रजिस्ट्रेशन) नकली है या असली या सड़कों पर पल्यूशन की जांच के लिए न अफसर हैं और न ही मशीनरी।
यह फैसला जल्दबाजी में लागू करने की बजाय सरकार को एक कार्ययोजना अवश्य तय करनी होगी। अगर पॉलिथीन से छुटकारा पाना है तो विकल्प भी पेश करना होगा। पॉलिथीन की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण यह है कि इसकी लागत तो कम है ही, यह मजबूत और सुविधाजनक भी रहता है। इसलिए गारमंट हो या फिर कोई ठोस सामान, यहां तक कि लिक्विड के लिए भी पॉलिथीन ही प्रयोग में लाया जाता है। कपड़े, जूट के बैग या इको फ्रेंडली पेपर बैग एक सीमा तक ही विकल्प बन सकते हैं क्योंकि न तो ये सभी जरूरतें पूरी कर पाएंगे और न ही लागत के हिसाब से पॉलिथीन जितने सस्ते होंगे। सरकार को पर्यावरण संरक्षण के लिए इस क्षेत्र में सब्सिडी और अन्य सुविधाएं जुटानी होंगी।
विकल्पों की तलाश के लिए हिमाचल और गोवा जैसे उन राज्यों की ओर भी देखना होगा जो पॉलिथीन पर प्रतिबंध जैसा कड़ा फैसला ले चुके हैं। सरकार को पॉलिथीन पर प्रतिबंध ऐसा फैसला बनाना होगा, जिस पर अमल होता है। ऐसा फैसला नहीं जैसे 18 साल से कम उम्र के व्यक्ति को सिगरेट नहीं मिलेगी या 14 साल के कम उम्र के बच्चों से घरों-ढाबों में काम नहीं कराया जा सकेगा या ऑटो रिक्शा में तीन से ज्यादा सवारियां नहीं बैठेंगी। इन नियमों को तो इधर-उधर कहीं भी टूटते देखा जा सकता है।
दिल्ली-6 की गलियों में कैसे मटके मसककली
बात केवल चांदनी चौक की ही नहीं है। पूरी दिल्ली की भीड़-भाड़ अब ऐसे मुकाम पर आ पहुंची है कि दिल्ली की रवानगी पर भी विराम लगने की आशंका पैदा होने लगी है। यह रिपोर्ट चौंकाती नहीं है कि अगले दो सालों में राजधानी की सड़कों पर आप एक घंटे में केवल 6-7 किमी ही चल पाएंगे। दिल्ली की आबादी के साथ ही बढ़ती जा रही है वाहनों की तादाद और उससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि हमारी पूरी व्यवस्था इस सचाई से आंखें मूंदे हुए है। दिल्ली की तुलना अन्य बड़े शहरों से करें तो लगता है कि अब कुछ न करने का समय आ गया है। राजधानी की आबादी 1.70 करोड़ के करीब है जबकि दिल्ली का कुल एरिया है 1483 वर्ग किमी। न्यू यार्क का एरिया है 17, 400 वर्ग किमी और उसकी आबादी है 1.89 करोड़। इसी तरह सबसे ज्यादा भीड़-भाड़ वाले महानगर तोक्यो पर नजर डालें तो उसकी आबादी है 1.27 करोड़ और एरिया है 2187 वर्ग किमी। अब बताइए कि दिल्ली को लेकर चिंता हुई या नहीं।
यह सच है कि किसी को दिल्ली आकर बसने से रोका नहीं जा सकता। यह संभव भी नहीं है लेकिन सरकार को ऐसी नीतियां अवश्य बनानी होंगी कि एक तरफ तो जहां दिल्ली को ग्रेटर दिल्ली का रूप मिले, वहीं दिल्ली की आबादी बढ़ने से रोकी जा सके। यह सवाल अब हाई कोर्ट के सामने विचाराधीन है कि अगर डीडीए अपनी किसी हाउसिंग स्कीम की घोषणा करता है तो वह केवल दिल्ली वालों के लिए ही हो। हाल ही में डीडीए घोटाला इसीलिए संभव हो पाया कि राजधानी में अनुसूचित जनजाति की आबादी नहीं है और साढ़े 7 फीसदी फ्लैट रिजर्व करना उसकी संवैधानिक मजबूरी थी। जो व्यक्ति डीडीए का फ्लैट लेगा, वह दिल्ली आकर बसेगा। डीयू को ही देख लें। हर साल उसकी 35 हजार सीटों में से 15 हजार दिल्ली से बाहर के स्टूडेंट को मिल जाती हैं। डीयू सेंट्रल यूनिवर्सिटी है और उसमें एडमिशन के अधिकार से किसी को वंचित नहीं रखा जा सकता। जब डीयू में एडमिशन होगा तो स्टूडेंट दिल्ली आकर रहेंगे ही।
इस सवाल को कभी गंभीरता से नहीं लिया जाता क्योंकि इस बारे में व्यक्त किया गया कोई भी नजरिया राजनीतिक चश्मे से ही देखा जाता है - चाहे उपराज्यपाल यह बात कहें या फिर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित। समस्या की गहराई और दिल्ली को बचाने की ललक किसी में दिखाई नहीं देती। दिल्ली की भीड़ कम करने के कई तरीके सुझाए जाते हैं - ऑफिस दिल्ली के आसपास हों, थोक बाजारों को राजधानी की सीमाओं के बाहर रखा जाए, सड़कों की भीड़ कम करने के लिए पेरिफेरल रोड बनाए जाएं आदि-आदि। इस सुझावों पर अमल के लिए कभी भी इच्छाशक्ति नहीं दिखाई जाती। दरअसल उसी इच्छाशक्ति की जरूरत है और साथ ही यह भी तय करना जरूरी है कि अगर आप दिल्ली से प्यार करते हैं तो इस मसले को राजनीति से दूर रखें। तभी दिल्ली-6 का गौरव भी लौट सकेगा और सभी दिल्ली पर गर्व भी कर सकेंगे।
HANS AND OWL
स्वामी जी ने कहा कि भारतीय संस्कृति तथा धर्म के सभी तत्वों का वैज्ञानिक महत्व भी है, इसलिए संस्कृति तथा अध्यात्म को वैज्ञानिकता से जोड़ कर देखा जाता है। यह सुनकर एक अमेरिकी व्यक्ति उनके भाषण में दखल देते हुए बीच में उठकर बोला, 'वास्तव में आपकी संस्कृति महान है तभी तो आपके यहां देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू बताया गया है, जिसे दिन में दिखाई भी नहीं देता। अब जरा बताइए कि उल्लू को देवी लक्ष्मी का वाहन बताने के पीछे क्या वैज्ञानिक तर्क है?'
उस व्यक्ति का प्रश्न सुनकर स्वामी जी अत्यंत सहजतापूर्वक बोले, 'पश्चिमी देशों की तरह भारत में धन को ही सब कुछ नहीं माना गया है। इसलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने चेतावनी दी है कि लक्ष्मी रूपी धन के असीमित मात्रा में पास आते ही मनुष्य आंखें होते हुए भी उल्लू की तरह अंधा हो जाता है। इसी का संकेत देने के लिए लक्ष्मी का वाहन 'उल्लू' बताया गया है और इसके पीछे यही वैज्ञानिक तर्क है।' स्वामी जी के इस जवाब पर सभी वाह-वाह कर उठे।
इसके बाद स्वामी जी फिर बोले, 'सरस्वती ज्ञान और विज्ञान की प्रतीक है। यह मानव का विवेक जागृत करने वाली देवी है इसलिए सरस्वती का वाहन हंस बताया गया है, जो नीर-क्षीर विवेक का प्रतीक है। इसलिए अब आप यह भलीभांति समझ गए होंगे कि संस्कृति व धर्म के सभी तत्वों के पीछे वैज्ञानिक तर्क छिपे हुए हैं।' वहां उपस्थित सभी लोगों के साथ ही वह व्यक्ति भी देवी-देवताओं के वाहनों की यह अवधारणा सुनकर स्वामी जी के प्रति नतमस्तक हो गया और उस दिन से भारतीय संस्कृति का प्रशंसक बन गया ।
Ten Interviewing Rules
Look Sharp
Before the interview, select your outfit. Depending on the industry and position, get out your best duds and check them over for spots and wrinkles. Even if the company has a casual environment, you don't want to look like you slept in your clothes. Above all, dress for confidence. If you feel good, others will respond to you accordingly.
Be on Time
Never arrive late to an interview. Allow extra time to arrive early in the vicinity, allowing for factors like getting lost. Enter the building 10 to 15 minutes before the interview.
Do Your Research
Researching the company before the interview and learning as much as possible about its services, products, customers and competition will give you an edge in understanding and addressing the company's needs. The more you know about the company and what it stands for, the better chance you have of selling yourself. You also should find out about the company’s culture to gain insight into your potential happiness on the job.
Be Prepared
Bring along a folder containing extra copies of your resume, a copy of your references and paper to take notes. You should also have questions prepared to ask at the end of the interview. For extra assurance, print a copy interview take-along checklist.
Show Enthusiasm
A firm handshake and plenty of eye contact demonstrate confidence. Speak distinctly in a confident voice, even though you may feel shaky.
Listen
One of the most neglected interviewing skills is listening. Make sure you are not only listening, but also reading between the lines. Sometimes what is not said is just as important as what is said.
Answer the Question Asked
Candidates often don't think about whether or not they actually are answering the questions asked by their interviewers. Make sure you understand what is being asked, and get further clarification if you are unsure.
Give Specific Examples
One specific example of your background is worth 50 vague stories. Prepare your stories before the interview. Give examples that highlight your successes and uniqueness. Your past behavior can indicate your future performance.
Ask Questions
Many interviewees don't ask questions and miss the opportunity to find out valuable information. Your questions indicate your interest in the company or job.
Follow Up
Whether it's through email or regular mail, the follow-up is one more chance to remind the interviewer of all the valuable traits you bring to the job and company. You don't want to miss this last chance to market yourself.
It is important to appear confident and cool for the interview. One way to do that is to be prepared to the best of your ability. There is no way to predict what an interview holds, but by following these important rules you will feel less anxious and will be ready to positively present yourself.
राजा का त्याग
उन्हें काशी नरेश की घोषणा का पता चल गया था,सो उन्होंने इस व्यक्ति की सहायता की एक योजना बनाई। वह उसे लेकर कोसल पहुंचे और वहां काशी नरेश से बोले, 'मैं कोसल का राजा तुम्हारे सामने हूं। अब तुम मुझे पकड़ लो और अपनी घोषणा के अनुसार इस व्यक्ति को मंत्री पद और धनराशि दे दो।' काशी नरेश कोसल के राजा को हतप्रभ देखते रह गए। कुछ देर बाद वह सिंहासन से उतर कर राजा के चरणों में गिरकर क्षमा मांगते हुए बोले, 'महाराज, मुझे क्षमा करें, जो राजा प्रजा के बीच लोकप्रिय हो, अत्यंत निर्भय हो, मौत से भी न डरे और अपनी जान पर खेलकर दूसरों की मदद के लिए सदैव तैयार रहे उसे मैं तो क्या, कोई भी पराजित नहीं कर सकता।' यह कहकर उन्होंने कोसल के राजा का हाथ पकड़कर उन्हें ससम्मान सिंहासन पर बिठा दिया और चले गए ।
इश्वर की संतान !
किसी गांव में एक वृद्ध व्यक्ति अपनी झोपड़ी के सामने बैठा जूते बना रहा था। तभी वहां गेरुआ वस्त्र पहने एक संत उसके पास आए और बोले, बाबा, बहुत दूर से चल कर आ रहा हूं। मुझे बहुत तेज प्यास लगी है। क्या पीने को पानी मिलेगा? वृद्ध व्यक्ति की आंखें आश्चर्य से उन्हें देखती रह गईं। उसे संत के वचनों पर विश्वास नहीं हो रहा था। वह असमंजस में पड़ गया कि संत को आखिर क्या उत्तर दे? संत समझ गए कि यह व्यक्ति द्वंद्व में फंस गया है। कुछ उत्तर न मिलते देख उन्होंने फिर कहा, बाबा, अगर पानी नहीं हो तो किसी दूसरे स्थान पर जाकर अपनी प्यास बुझाऊं। वृद्ध हाथ जोड़कर बोला, स्वामी जी, आप स्वयं देख रहे हैं कि मैं जूते बना रहा हूं। क्या मेरे हाथ का दिया जल ग्रहण कर सकेंगे। गांव के लोग मेरे दिए जल को पीना तो दूर, छूना भी स्वीकार नहीं करते।
वृद्ध की बात सुनकर संत ठहाका लगाकर हंस पड़े। संत के इस तरह हंसने से वृद्ध और भी ज्यादा डर गया। लेकिन दूसरे ही क्षण स्वामी जी शांत भाव से बोले, यह तो मैं अपनी खुली आंखों से देख ही रहा हूं। लेकिन मुझे इससे कोई सरोकार नहीं। तुम मुझे खुशी-खुशी जल पिलाओ। यदि तुम्हें कोई आपत्ति न हो तो मैं भोजन भी तुम्हारे घर करूंगा। स्वामी जी की बात सुनकर वृद्ध व्यक्ति के आश्चर्य की कोई सीमा नहीं रही। वह नतमस्तक हो गया।
स्वामी जी ने वृद्ध की मानसिक उद्विग्नता को शांत करते हुए कहा, इस धरती पर कोई छोटा-बड़ा नहीं है। हम सब एक ही ईश्वर की संतान है। उस ईश्वर का अंश प्रत्येक जीव में विद्यमान है। जो ईश्वर की संतान को छोटा और हीन समझता है, उससे घृणा करता है, उसे ईश्वर भी उसी तरह देखते हैं और वैसा ही व्यवहार करते हैं। स्वामी जी ने उस वृद्ध व्यक्ति के घर पानी ही नहीं पिया, वरन प्रेम पूर्वक भोजन भी ग्रहण किया। वह स्वामी थे विवेकानंद।
सिकंदर को सबक
एक बार किसी नगर में लड़ते-लड़ते जब वह थक गया तो एक घर के सामने उसने घोड़ा रोका। दरवाजा खटखटाने पर एक बुढ़िया ने दरवाजा खोला। सिकंदर ने कहा, 'मुझे जोर की भूख लगी है। खाना दो।' बुढि़या ने सिकंदर को पहचान लिया और अंदर चली गई। कुछ देर बाद वह एक थाल लेकर आई जिस पर कपड़ा ढका था। सिकंदर ने कपड़ा हटाया तो देखा, खाने की जगह जेवर रखे हैं। उसने कहा, 'मैंने खाना मांगा था। जेवर तो मैं खा नहीं सकता।'
इस पर बुढ़िया बोली, 'तुम्हारी भूख रोटियों से मिट जाती तो तुम यहां क्यों आते। तुम्हारे देश में तो रोटियां हैं ही। तुम्हें तो सोने की भूख है।' बुढ़िया की बात सुनकर सिकंदर बिना लड़े वापस चला गया। जाते-जाते उसने नगर के मुख्य रास्ते पर शिलालेख लगवाया जिस पर लिखा था, 'अज्ञानी सिकंदर को इस नगर की महान नारी ने अच्छा सबक सिखाया।'
विद्या की रेखा
बौद्धिक जाने-माने ऋषि थे। उनके आश्रम में कई छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे। उन छात्रों में कुछ राजकुमार थे तो कुछ अत्यंत निर्धन परिवारों के बालक भी। एक दिन ऋषि वृक्ष के नीचे बैठकर संस्कृत के रूप पढ़ा रहे थे। अध्याय समाप्त होने के बाद उन्होंने एक निर्धन छात्र को संस्कृत के रूप सुनाने को कहा पर वह बालक उन रूपों को सुनाने में असमर्थ रहा। इससे क्रोधित ऋषि ने डंडा मारने हेतु छात्र को हाथ आगे करने को कहा। छात्र ने डरते-डरते हाथ आगे कर दिए। उस छात्र के हाथ देखकर ऋषि बोले, 'वत्स, तुम्हें मारना ही व्यर्थ है क्योंकि तुम्हारे हाथ में तो विद्या की रेखा ही नहीं है। तुम्हारा शिक्षा ग्रहण करना ही निरर्थक है।' फिर उन्होंने उसके हाथ की ओर संकेत करते हुए कहा, 'देखो, विद्या की रेखा यहां होती है।' छात्र दुखी मन से उठा और आश्रम के बाहर चला गया। थोड़ी देर बाद जब वह वापस आया तो उसकी हथेली से खून निकल रहा था।
ऋषि ने पूछा, 'तुम्हारे हाथ में क्या हुआ? यह घाव कैसे हो गया?' छात्र ने अत्यंत सहजता के साथ कहा, 'ऋषिवर, यह घाव नहीं है बल्कि विद्या की रेखा है जिसे मैंने स्वयं अपनी हथेली पर बना लिया है।' ऋषि ने तुरंत छात्र का उपचार किया। वह उसकी इच्छा शक्ति और साहस से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने उस दिन से उस पर और अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया। छात्र ने अपने गुरु का अपने प्रति प्रेम देखकर अथक परिश्रम करना प्रारंभ कर दिया।
वह दिन-प्रतिदिन उन्नति करने लगा। उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति, परिश्रम, लगन और ऋषि के अथक लगाव ने उसे संस्कृत का विद्वान बना दिया। इस बालक ने ही आगे चलकर संस्कृत का पहला व्याकरण ग्रंथ लिखा जो संसार भर में बेहद प्रसिद्ध हुआ। यह संस्कृत का बेजोड़ ग्रंथ माना जाता है। वह ज्ञानी बालक आगे चलकर व्याकरणाचार्य पाणिनी के नाम से विख्यात हुआ।
सच्चा पुरस्कार
पुरस्कार का नाम सुनते ही गोखले रो पड़े। जब शिक्षक ने रोने का कारण पूछा, तब गोखले ने रोते-रोते उत्तर दिया, 'मुझे आप इनाम नहीं दंड दीजिए।' शिक्षक ने आश्चर्य से पूछा, 'बेटे, क्या बात है, क्या तुम्हें पुरस्कार पसंद नहीं है?' गोखले ने जवाब दिया, 'असल बात यह है कि परीक्षा में दिए गए प्रश्नों में से एक का उत्तर मुझे नहीं सूझ रहा था। उसका उत्तर मैंने अपने एक मित्र से पूछकर लिखा है, ऐसे में मैं इस पुरस्कार का हकदार कैसे हो सकता हूं।'
गोखले का जवाब सुनकर गुरुजी प्रसन्न हो उठे। वह बोले, 'बेटे, पहले मैं तुम्हें यह पुरस्कार तुम्हारी बुद्धि के लिए दे रहा था, पर अब यह इनाम तुम्हारी सचाई के लिए दे रहा हूं। मैं चाहता हूं, तुम इसी तरह सदा सच बोलते रहो।'
ज्ञान की गंगा
इस बीच सुभाष के पिता भी जाग गए। उन्होंने कहा, 'केवल जमीन पर सोकर तुम ऋषि नहीं बन सकते। इसके लिए तुम्हें ज्ञान अर्जित करना होगा और सेवा का संकल्प लेना होगा।' सुभाष ने यह सीख गिरह बांध ली और एक दिन वह एक सामान्य व्यक्ति से लाखों भारतीय के प्रिय 'नेताजी' बन गए।