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पाप और पुण्य

एक बार किसी ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, 'युधिष्ठिर तो आपके ही बताए हुए रास्ते पर चलते हैं फिर आप उन्हें धर्मराज क्यों कहते है? धर्मराज कहलाने लायक उनमें ऐसी कोई खूबी तो दिखती नहीं।' श्रीकृष्ण ने कहा, 'युधिष्ठिर अपना काम दो तरह से करते हैं। एक प्रत्यक्ष रूप से और दूसरा अप्रत्यक्ष रूप से। प्रत्यक्ष रूप से वह जो काम करते हैं, उसे हम आप देखते हैं। आप कह सकते हैं कि मेरे बताए रास्ते पर चलने वाला कर्म प्रत्यक्ष है। लेकिन कुछ काम वह अप्रत्यक्ष रूप से अपने मन से भी करते हैं। उनके अप्रत्यक्ष कार्यों के कारण ही उन्हें धर्मराज का पद मिला हुआ है।'
उस व्यक्ति ने कहा, 'मैं कुछ समझा नहीं प्रभु।' श्रीकृष्ण ने बताया, 'महाभारत का युद्ध हो रहा था। चारों तरफ त्राहि-त्राहि मची हुई थी। युद्ध के बाद जब सभी योद्धा अपने-अपने शिविरों में आराम करने चले जाते थे, युधिष्ठिर सायंकाल वेश बदल कर एक सेवक के रूप में चुपचाप रणभूमि में चले जाते थे। उनके भाई इस रहस्य का पता करने के लिए एक दिन उनके पीछे-पीछे चले गए। वहां जाने पर पांडव पुत्रों ने देखा कि उनके बड़े भाई घायलों की मरहमपट्टी कर रहे हैं। यह देख कर भाइयों को आश्चर्य हुआ और दुख भी।

सहदेव ने पूछा कि वह चोरी-चोरी अपना वेश बदल कर ऐसा तुच्छ काम क्यों करते हैं। इस पर युधिष्ठिर ने कहा कि वेश मैं इसलिए बदलता हूं कि घायलों में कई कौरव पक्ष के भी हैं। यदि मैं प्रकट रूप से जाता तो संकोच में वे अपना कष्ट हमें नहीं बताते। इस प्रकार मैं सच्ची सेवा के अधिकार से वंचित रह जाता। सेवा ही असली धर्म है सहदेव।' यह कथा सुनाकर कृष्ण बोले, 'ऐसा काम युधिष्ठिर के सिवाय दूसरा कोई नहीं कर सकता था। इस घटना को सुनने के बाद से ही मैं उन्हें धर्मराज कहने लगा। धर्म और परमार्थ अन्योन्याश्रित है। उनका यह काम सभी धर्मों से ऊपर है।'

श्रम और स्वास्थ्य

एक राजा था । उसके खजाने में अकूत धन था, फिर भी उसका स्वास्थ्य अच्छा नहीं रहता था। कई वैद्यों ने उसका इलाज किया, फिर भी कोई लाभ नहीं हुआ। यह बात प्रजा में फैल गई। तब एक बूढ़े ने राजा के पास आकर उसका इलाज करने की इच्छा प्रकट की। राजा से अनुमति पाकर वह बोला, 'आप किसी सुखी मनुष्य का कुर्ता पहनिए, स्वस्थ हो जाएंगे।'

बूढ़े की बात सुनकर सभी हंसने लगे, लेकिन राजा ने सोचा कि इतने सारे इलाज किए हैं तो एक और सही। राजा के सेवकों ने सुखी मनुष्य की बहुत खोज की, लेकिन उन्हें पूर्ण सुखी कोई नहीं मिला। हर किसी को किसी न किसी बात का दुख था। अब राजा स्वयं सुखी मनुष्य की खोज में निकल पड़ा। वह एक खेत में जा पहुंचा। तपती दोपहर में एक किसान अपने काम में लगा हुआ था। राजा ने उससे पूछा, 'क्यों जी, तुम सुखी हो'?

किसान की आंखें चमक उठीं। वह मुस्करा कर बोला, 'ईश्वर की कृपा से मुझे कोई दुख नहीं है।' यह सुनकर राजा खुश हो गया। उसने सोचा कि किसान का कुर्ता मांग लिया जाए। पर तभी उसका ध्यान इस बात पर गया कि किसान सिर्फ धोती पहने हुए है और उसकी सारी देह पसीने से तर है। राजा समझ गया कि श्रम करने के कारण ही यह किसान सुखी है। उसने आराम-चैन छोड़कर परिश्रम करने का संकल्प लिया। थोडे़ ही दिनों में राजा की बीमारी दूर हो गई।

निष्ठा और ईमानदारी

फिलीपीन का एक इंजीनियर एक महत्वपूर्ण बांध बनवाने में जुटा हुआ था। बांध का जल्दी से जल्दी बनना जरूरी था, इसलिए इंजीनियर अपनी परवाह न करते हुए स्वयं भी मजदूरों के साथ लगा हुआ था। उन दिनों फिलीपीन के राष्ट्रपति रेमन मैग्सेसे थे। एक दिन वे बांध का काम देखने गए। और यह जान कर आश्चर्यचकित रह गए कि बांध को जितने समय में बनना था, वह उससे कम समय में और अनुमान से कहीं अच्छा बना था। उन्होंने जब इसका कारण जानने की कोशिश की तो पाया कि वहां का इंजीनियर स्वयं मजदूरों के साथ मिलकर काम करता था।

वे वहां का अवलोकन कर प्रसन्न मन से वापस आ गए। जब बांध के उद्घाटन का समय आया तो मैग्सेसे ने सभी कर्मचारियों को वहां बुलाया और उन्हें संबोधित करते हुए कहा, 'मैं इस बांध को शीघ्रता से और इतने अच्छे तरीके से पूर्ण कराने वाले इंजीनियर के मनोबल, निष्ठा और ईमानदारी से बहुत प्रसन्न हूं और मुझे लगता है कि उनकी योग्यता एक इंजीनियर के कार्य से कहीं ज्यादा है, इसलिए मैं उन्हें आज से निर्माण विभाग का सचिव बनाता हूं।'

राष्ट्रपति की घोषणा सुनकर इंजीनियर हैरान हो गया। लेकिन सभी लोगों ने तालियां बजाकर इस घोषणा का स्वागत किया। इसके बाद मैग्सेसे ने बांध बनवाने में लगे मजदूरों को भी सम्मान दिया और बोले, हमारे देश को ऐसे ही ईमानदार व निष्ठावान व्यक्तियों की जरूरत है, जो प्रत्येक कार्य को मन और समर्पण से पूर्ण करते हैं। घोषणा सुनकर इंजीनियर बोला, मुझे काम करते समय सिर्फ यह याद रहता है कि जो कार्य मुझे सौंपा गया है या मुझे करना है वह हर हालत में सर्वश्रेष्ठ होना चाहिए, क्योंकि वह सर्वश्रेष्ठ होगा तभी हमारे लिए प्रगति के द्वार खोलेगा और मेरे इसी संकल्प ने आज मुझे यहां तक पहुंचाया है। इंजीनियर का वक्तव्य सुनकर सभी लोगों ने एक बार फिर करतल ध्वनियों से उससे सहमति जताई।

कीमती वस्तु

एक राजा समय-समय पर प्रतियोगिताएं आयोजित करवाता और विजेता को सम्मान सहित पारितोषिक भी देता। प्रजा इससे उत्साहित रहती थी। एक बार उसने राजपुरुष के चयन की प्रतियोगिता रखी। उसने एक वाटिका बनवाई जिसमें हर तरह की वस्तुएं रखी गईं। लेकिन उन पर उनका मूल्य नहीं लिखा था।

राजा ने ऐलान किया कि जो व्यक्ति इनमें से सबसे कीमती वस्तु लेकर वाटिका से बाहर आएगा, उसे इस वर्ष का राजपुरुष घोषित किया जाएगा। लोग वाटिका में जाते और अपनी समझ से सबसे मूल्यवान वस्तु उठा लाते। कोई हीरे-जवाहरात लाया तो कोई पुस्तक उठाकर लाया क्योंकि उसके लिए ज्ञान अधिक मूल्यवान था। एक गरीब रोटी उठाकर लाया क्योंकि उसकी नजर में रोटी ही मूल्यवान थी। एक भक्त ईश्वर की मूर्ति उठाकर लाया।

तभी एक योगी आया। वाटिका में काफी देर घूमने के बाद वह खाली हाथ बाहर निकला। राजा ने सभी व्यक्तियों द्वारा लाई गई वस्तुओं को देखा। जब योगी की बारी आई तो राजा ने पूछा, 'तुम क्या लाए हो?' उसने कहा, 'मैं संतोष लाया हूं, महाराज।' राजा ने पूछा, 'तुम्हारा संतोष क्या सबसे मूल्यवान है?'

योगी ने जवाब दिया 'हां, महाराज। इस वाटिका में आपने जितनी भी वस्तुएं रखी हैं, उन्हें प्राप्त कर मनुष्य को खुशी तो होगी पर वह क्षणिक होगी। इसे हासिल कर लेने के बाद फिर कुछ और पाने के लिए मन बेचैन हो उठेगा। लेकिन जिसके पास सच्चा संतोष है वह सभी इच्छाओं से ऊपर होगा और सुखी रहेगा।' योगी को राजपुरुष घोषित किया गया।