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अक्षय भिक्षापात्र

घोर अकाल पड़ा था। लोग दाने-दाने के लिए तरस रहे थे। बुद्ध से जनता का कष्ट देखा नहीं गया। उन्होंने नागरिकों को एकत्र किया। नगर के सभी संपन्न व्यक्ति जब उपस्थित हो गए, तब तथागत ने उनसे प्रजा की पीड़ा दूर करने का कुछ प्रबंध करने को कहा। नगर के सबसे बड़े व्यापारी की ओर बुद्ध ने देखा।

व्यापारी बोला, 'मैं अपना सारा संचित धन और अन्न देने को प्रस्तुत हूं, किंतु वह इतना नहीं है कि उससे पूरी प्रजा के लिए एक सप्ताह के भोजन का प्रबंध हो सके।' नगर सेठ ने निवेदन किया, 'आज्ञा दें तो मैं अपना संपूर्ण कोष लुटा सकता हूं किंतु प्रजा को दस दिन भी उससे भोजन मिलेगा या नहीं इसमें संदेह है।' स्वयं नरेश ने भी अपनी असमर्थता प्रकट कर दी। सभा मौन हो गई। सबने सिर झुका लिए। तभी सभा में सबसे पीछे खड़ी मैले-कुचैले वस्त्रों वाली एक भिखारिन ने हाथ जोड़कर कहा 'प्रभु आज्ञा दें तो मैं अकाल पीड़ितों को भोजन दूंगी।'

सभी की दृष्टि उसकी ओर उठ गई। किसी ने क्रोधपूर्वक पूछा, 'तेरे यहां क्या खजाना गड़ा है कि तू सबको भोजन देगी?' लेकिन तथागत उसे देखकर प्रसन्न हो गए। वह जानते थे कि नगरसेठ, व्यापारी और नरेश के मिले-जुले प्रयासों से जो काम नहीं हो सकता, वह सच्चे हृदय से सेवा के लिए तत्पर जनसेवक से हो सकता है। वह महिला गरीब भले ही थी लेकिन उसका साहस और संकट से लड़ने की आकांक्षा अनूठी थी।

सभा में उपस्थित लोगों की शंकाओं एवं संशय की परवाह किए बिना उस स्त्री ने कहा, 'मैं तो भगवान की कृपा के भरोसे प्रयास करूंगी। मेरा कर्त्तव्य बस प्रयास करना है। मेरा कोष तो आप सबके घर में हैं। आपकी उदारता से ही मेरा भिक्षापात्र अक्षय बनेगा।' सचमुच उस भिखारिणी का भिक्षापात्र अक्षय पात्र बन गया। वह जहां भिक्षा लेने गई, लोगों ने उसके लिए अपने भंडार खोल दिए। जब तक खेतों में अन्न पैदा नहीं हुआ, भिखारिणी प्रजा को भोजन देती रही।

अहिंसा का संकल्प

एक बहेलिया पक्षियों को जाल में फंसाकर, उन्हें बेचकर अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करता था। एक बार श्रावक मुनि उस क्षेत्र में आ पहुंचे जहां बहेलिया अपने परिवार के साथ रहता था। अनेक लोग श्रावक मुनि के दर्शन करने पहुंचे और उनसे अपनी समस्याओं के समाधान पाकर प्रसन्न लौटे। यह देखकर बहेलिया भी श्रावक मुनि के पास गया। वह मुनि के प्रवचन से बेहद प्रभावित हुआ और उसने उनसे दीक्षा देने का अनुरोध किया।

श्रावक मुनि बोले, 'इसके लिए तुम्हें अहिंसा-पालन का प्रण करना होगा।' यह सुनकर वह बोला, 'महाराज, यह तो असंभव है क्योंकि पक्षी ही मेरी आजीविका का साधन हैं। मैं अहिंसा का व्रत कैसे ले सकता हूं ?' इस पर मुनि ने कहा, 'यदि तुम ऐसा नहीं कर सकते तो कम से कम किसी एक पक्षी के प्रति अहिंसा बरतने का व्रत लो।' मुनि की बात पर बहेलिया प्रसन्न हो गया और बोला, 'ठीक है महाराज, मैं आज से यह प्रण करता हूं कि कौए को नहीं पकड़ूंगा, न ही उसकी हत्या करूंगा।'

इस प्रकार मुनि ने बहेलिए को आंशिक अहिंसा का व्रत दिला दिया। घर पहुंचते ही बहेलिए के दिमाग में आया कि जो प्राण कौए में है वही तो कबूतर में भी है। यदि कौए की हत्या हिंसा और पाप है तो अन्य पक्षियों की हत्या में हिंसा कैसे नहीं होगी। विचारों की इसी उधेड़बुन में वह रात भर सो नहीं पाया।

सवेरे उठकर वह मुनि के पास पहुंचा और पक्षियों को पकड़ने का जाल फेंकते हुए बोला, 'मुनिवर, मैं अब भविष्य में किसी भी प्राणी की हत्या नहीं करूंगा। मैं पूर्ण अहिंसा का व्रत लेता हूं। पक्षियों की जगह अब मैं शाक-भाजी बेचकर या अन्य कोई काम कर गुजारा करूंगा।' श्रावक मुनि बहेलिए की बात पर प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया। इसके बाद बहेलिये ने सब्जी की दुकान खोल ली जो धीरे-धीरे काफी चलने लगी। उसने अहिंसा का संकल्प अपनी आखिरी सांस तक निभाया ।

सबसे अच्छी गुरु दक्षिणा

गंगा तट पर एक ऋषि का आश्रम था, जिसमें अनेक छात्र शिक्षा प्राप्त करते थे। जब शिष्यों की शिक्षा पूरी हो जाती और वे अपने घर वापस जाने लगते, तो ऋषि से पूछते कि गुरु दक्षिणा में क्या दें? ऋषि कहते कि तुमने जो पाया है, समाज में जाकर उस पर अमल करो, अपने पैरों पर खड़े हो, सच्ची कमाई करो और फिर एक साल बाद तुम्हारा जो दिल चाहे वह दे जाना।

आश्रम छोड़कर जाने के बाद शिष्य अलग-अलग पेशे अपनाते। अपने पेशे, अपने कामकाज से जिसे जो कमाई होती, उसका कुछ हिस्सा वह श्रद्धापूर्वक ऋषि को दे दिया करता था। एक बार आश्रम में एक अत्यंत सीधा-सादा शिष्य आया। वह साधारण गृहस्थ था। वह दिन भर मेहनत करके अपने परिवार का पालन पोषण करता था लेकिन उसके अंदर कुछ सीखने की तीव्र इच्छा थी इसलिए वह आश्रम में चला आया था। उसने अपने व्यवहार से सबका दिल जीत लिया। ऋषि उसे स्नेहपूर्वक पढ़ाया करते थे। जो कुछ उसे सिखाया जाता, उस पर वह मनोयोग से अमल करता था।

जब उसकी शिक्षा पूरी हुई तो उसने भी पूछा, 'गुरु जी दक्षिणा में क्या दूं?' ऋषि ने उससे भी वही कहा जो वह और शिष्यों से कहा करते थे। वह चला गया और एक साल बाद लौटा। बोला, 'दक्षिणा देने आया हूं।' ऋषि उसे देखकर बड़े खुश हुए, फिर उन्होंने पूछा, 'क्या लेकर आए हो बेटा?' उस शिष्य ने दस लोगों को खड़ा कर दिया, जो उसके गांव के थे। उसने कहा, 'मैं गुरु दक्षिणा में ये दस नए शिष्य लाया हूं।' ऋषि ने पूछा, 'किसलिए?' उसने कहा, 'जो शिक्षा आपने मुझे दी थी, मैंने उसे इन तक पहुंचाया। उतने से ही इनका जीवन संवर गया। अब आप इन सब को अपना शिष्य बना लें ताकि इतने लोग और आपके बताए रास्ते पर सही तरीके से चल सकें।' ऋषि ने प्रसन्न होकर कहा, 'तुमने मुझे अब तक की सबसे अच्छी गुरु दक्षिणा दी है।'

परिवार और प्रेम

एक दिन एक व्यक्ति के घर के बाहर बरामदे में चार लोग आकर बैठे। ये चार लोग थे- प्रेम, वैभव, सफलता और नीति। घर में रहने वाले दंपती ने बाहर आकर उन्हें प्रणाम किया और परिचय पूछा। चारों ने बारी-बारी से अपना परिचय दिया। तब दंपती ने आदरपूर्वक उन्हें भीतर आने के लिए आमंत्रित किया। इस पर आगंतुक बोले, 'हम सब को एक साथ अंदर आने की क्या जरूरत है, आप किसी एक को बुला लें।'

दंपती असमंजस में पड़ गया, किसे बुलाएं, किसे छोड़ें। उन्होंने आगंतुकों से थोड़ा समय मांगा और आपस में सलाह करने के लिए वापस घर में आ गए। पूरा परिवार अंदर बैठकर सलाह करने लगा। स्त्री बोली, 'हमें वैभव को ही अंदर बुलाना चाहिए। उसके आने से बाकियों की कमी भी पूरी हो सकती है।' लेकिन उसकी बात काट कर पति ने कहा, 'वैभव सफलता का मोहताज है। इसलिए सफलता को ही बुलाओ। उसके साथ होने से वैभव अपने आप साथ आ जाएगा।' इस पर बेटे ने सलाह दी, 'नहीं पिताजी, आप सबसे पहले नीति को बुलाएं। जहां नीति होती है, वहीं सफलता मिलती है, और जहां सफलता मिलती है, वहां वैभव अपने आप आता है।'

इसके बाद सभी बहू की राय जानने के लिए उसकी ओर देखने लगे। वह धीरे से बोली, 'मेरी मानिए तो आप लोग सबसे पहले प्रेम को ही बुलाइए। बाकी सभी पात्र बाहरी जीवन के मददगार हैं, लेकिन घर-परिवार में सबसे बड़ा मित्र प्रेम ही होता है। प्रेम बना रहे तो अन्य आगंतुकों का साहचर्य किसी न किसी उद्यम से हासिल हो ही जाएगा।' बहू की सलाह पर दंपती ने बाहर आकर प्रेम को निमंत्रित किया। आश्चर्य कि जब प्रेम भीतर आया तो उसके पीछे-पीछे बाकी तीनों भी आ गए। अंदर आकर वे बोले, 'आप ने हम तीनों में से किसी एक को बुलाया होता, तो हम अकेले ही आते। पर प्रेम जहां जाता है, वहां हम अवश्य साथ होते हैं।'

तीर्थयात्रा का अर्थ

एक बार संत तुकाराम से मिलने उनके गांव के कुछ लोग आए। उन लोगों ने तुकाराम जी के प्रति सम्मान प्रकट करते हुए उनसे प्रार्थना की, 'हम तीर्थयात्रा के लिए जा रहे हैं। आप भी हमारे साथ चलने की कृपा करें।' तुकाराम जी ने उनके साथ जाने में अपनी असमर्थता प्रकट की और एक गठरी पकड़ाते हुए कहा, 'इसमें कुछ ककड़ियां हैं। तुम जिन तीर्थ स्थानों पर जाना, वहां इन्हें नदी या तालाब में डुबा-डुबा कर स्नान कराना फिर वापस ले आना।'

तीर्थयात्रा के दौरान उन लोगों ने वैसा ही किया। वे भगवान का स्मरण करते हुए हर नदी में स्नान करते और पोटली में बंधी ककड़ियों को भी नहलाते। कुछ समय के बाद वे अपने गांव आ पहुंचे। वे तुकाराम जी के पास गए और ककड़ियों की पोटली उन्हें दे दी। तुकाराम जी ने उन सब को दूसरे दिन भोजन के लिए अपने घर आमंत्रित किया।

तुकाराम जी ने उन ककड़ियों की सब्जी बनाई और परोसा। भोजन करने के बाद सब एक स्थान पर बैठ गए। उनसे तुकाराम जी ने पूछा, 'आप लोगों ने ककड़ियों को इतने तीर्थ स्थलों पर स्नान करवाया। उनके कड़वेपन में कोई परिवर्तन हुआ क्या?' उन लोगों ने उत्तर दिया, 'नहीं महाराज, ककड़ियों के कड़वेपन में कोई अंतर नहीं आया, वो तो वैसी की वैसी रहीं जैसी पहले थीं।' तुकाराम जी उन्हें समझाते हुए बोले, 'इतने तीर्थ स्थलों पर स्नान करके और इतने मंदिरों में जाकर भी ककड़ियां कड़वी ही रहीं। उन्होंने अपने कड़वेपन का सहज गुण त्यागा नहीं।

इसी प्रकार आप लोग भी तीर्थयात्रा करने के बाद भी वैसे के वैसे बने रहते हैं, आप में कोई परिवर्तन नहीं आता। जब आपके दुर्गुण छूटते ही नहीं तो सारी तीर्थयात्रा व्यर्थ है। तीर्थयात्रा से मनुष्य की बुद्धि का विकास होना चाहिए। हमारे मन में परिवर्तन लाने, उसे शुद्ध और निर्मल बनाने के लिए ही तीर्थयात्राएं रखी गई हैं। यह कोई विनोद यात्रा नहीं है।'

Shame on media and government...A BITTER TRUTH OF INDIAN GOVERNMENT

THIS IS THE TRUE PICTURE OF CONGRESS GOVERNMENT-AAM AADMI KE BADHTE KADAM....HAR KADAM PER BHARAT BULAND........AISE HO RAHA HAI BHARAT NIRMAN.....WHO WILL ANSWER THIS PLEASE TELL ME.............

What the bloody hell........ ......... ....!!!

The most difficult thing for any patriotic Indian is to keep quiet and take this mail as just another one.


I wish this mail reaches the right people, today itself.

Please take this as high priority to forward.









Hoisting Pakistan Flag and burning Indian Flag





A Kashmiri separatist leader burning the Indian Flag

Indian Flag Burnt in Srinagar
Shame on Indian Govt and Media also for not making it Breaking News

The only country of the world, where one can dare to burn the national flag..

All these become the masala breaking news of Indian news channels:

*If Tendulkar cuts the cake which is made to look like national flag, he is condemned.
*If Mandira Bedi wears a saree with the flags of all the countries being portrayed on that, is made to apologies.
*If one cop in Kolkata and one in Bangalore is terminated of his duties for throwing the Indian national flag on ground, by mistake.

Then why double standards:

*During the ongoing Amarnath Sangarsh, Jammuites holding the Indian National Flag and chanting 'Bharat Mata ki Jai' are open fired by the J&K Police on orders from the Police Commissioner( belongs to Kashmir) Peaceful protesters are killed.
*Like in case of Amarnath case, people in Kashmir when want to get some demand fulfilled, protest by burning Indian national Flag, hoisting Pakistani Flag and chanting 'Hindustan Murdabad, Pakistan Jindabad'. But no body condemns. Infact, all such protest are followed by a team of union ministers visiting Kashmir and immediately sanctioning a few thousand crore rupees for Kashmiris.
*Every year on 14th Aug (Pakistani Indipendence Day), Pakistani flag is hoisted every where in Kashmir, including the govt. buildings and on 15th Aug, same people burn the Indian flag.

This only happens in India!!!!

just see the pictures above..

Really shame on Indian media

Who never shows these pics...

shame shame shame
If These Are Breaking News




I plead you to take initiative, raise your voice against this kind of anti-nationalist activities.

Also, not to forget the political leaders who just for preserving their vote-banks let this happen.

And last, but no way the least, the insensitive, irresponsible and money-thirsty journalism, which does not raise voives,

does not build a correct opinion of a common man; rather distracts the attention of people to stupid, worthless things such as comedy shows, tv serials,

news related to what is the daily routine of Salman Khan and Sanjay Dutt in prison and what food did that have.

JAI HIND...

CONGRESS KAA NAYA NARA "JAI HO.....A SONG OF SLUMDOG MILLIONAIRE....."

TRULY ACCEPTABLE...........AND PROVE THEY ARE REALLY BEHIND CREATING SLUMS WHICH IN RETURN GIVES AN OSCAR WINNING MOVIE "SLUMDOG MILLIONAIRE" ............G8......REALLY JAI HO............

Why Indian Moms r simply d best?

A young Indian man excitedly tells his mother he's fallen in love and that he is going to get married. He says, "Ma, I'm going to bring over 3 women and you try and guess which one I'm going to marry." The mother agrees.

The next day, he brings three beautiful women into the house and sits them down on the couch and they chat for a while. Later, he says, "Okay Ma, guess which one I'm going to marry." She immediately replies, "The one on the right." " That's amazing, Ma. You're right. How did you know?"

The Indian mother replies,


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" I DON'T LIKE HER "

call 1098 (only in India ) - child helpline

If you have a function/party at your home and if there is excess food available at the end, don't hesitate to call 1098 (only in India ) - child helpline. They will come and collect the food.

Please circulate this message which can help feed many children.

PLEASE, DON'T BREAK THIS CHAIN.....

'Helping hands are better than Praying Lips'..

Pass this to all whom you know and whom you don t k now as well..

नजीर की दयालुता

महान कवि नजीर अकबराबादी आगरा में राजा विलास राय के बच्चों को पढ़ाते थे। एक दिन बच्चों को पढ़ाते समय उन्हें राजा का तेज स्वर सुनाई दिया। वह बाहर आए। राजा अपने एक घोड़े की ओर इशारा कर कह रहे थे, 'इस उपद्रवी घोड़े को गोली मार दो। हम इंतजार कर रहे थे कि कुछ समय बाद यह खुद सुधर जाएगा मगर इसने तो उत्पात मचा कर रख दिया है। जैसे ही कोई इस पर सवारी करने को होता है यह वैसे ही उसे जोर की पटकनी देकर घायल कर देता है। कई लोग इसकी बदसलूकी का शिकार हो चुके हैं। अब इस खुराफाती घोड़े का जीवित रहना बेकार है।'

नजीर साहब बेकसूर घोड़े को मौत के मुंह में जाते देख द्रवित हो गए और बोले, 'महाराज, इस घोड़े को आप मारिए नहीं, हमें दे दीजिए।' यह सुनकर राजा आश्चर्यचकित हो गए और बोले, 'नजीर साहब, यदि आप इस घोड़े पर बैठेंगे तो फिर हमारे बच्चों को कौन पढ़ाएगा?' राजा के यह कहने पर नजीर साहब बोले, 'महाराज, आप घबराइए मत, हमें कुछ नहीं होगा। हम आपको इस बात का भरोसा दिलाते हैं।'

नजीर साहब के अनेक बार ऐसा कहने पर राजा ने घोड़ा उन्हें दे दिया। घोड़ा शांत भाव से उनके साथ चला गया। दूसरे दिन राजा समेत उनके सभी कारिंदे यह देखकर हैरान रह गए कि नजीर साहब उसी घोड़े पर आराम से बैठकर बच्चों को पढ़ाने के लिए आए हैं। उन्हें हैरान देख नजीर साहब मुस्कराते हुए बोले, 'इसमें इतनी हैरानी न करिए। इस मूक प्राणी को भी मुहब्बत समझने की अक्ल खुदा ने दी है।' यह सुनकर राजा अत्यंत शर्मिंदा हुए और जान गए कि हर प्राणी प्रेम का भूखा होता है। फर्क यह है कि कई लोग मूक प्रेम की भाषा नहीं समझ पाते। वह घोड़ा लंबे समय तक नजीर साहब के साथ रहा।

मां की आज्ञा

उस समय लॉर्ड कर्जन कलकत्ता के गवर्नर थे और आशुतोष मुखर्जी हाई कोर्ट के सबसे सम्मानित और ईमानदार न्यायाधीश। लॉर्ड कर्जन मुखर्जी का बहुत सम्मान करते थे। उस समय किसी भारतीय अधिकारी को लंदन जाने का मौका मिलता था, तो उसकी प्रतिष्ठा बढ़ जाती थी। मुखर्जी भी लंदन जाना चाहते थे पर संकोची स्वभाव के कारण कभी यह इच्छा प्रकट नहीं करते थे। लेकिन दोस्तों के बार-बार कहने पर उन्होंने लंदन जाने का मन बनाया।

कर्जन को जब इसका पता चला तो उन्होंने पहल करते हुए एक दिन कहा, 'मिस्टर मुखर्जी, आप को खुशी होगी कि इस बार लंदन जाने वालों की लिस्ट में आप का नाम सबसे ऊपर होगा।' मुखर्जी ने कहा, 'थैंक्यू सर।' मुखर्जी जब शाम को घर लौटे तो उन्होंने यह बात अपनी मां को बताई। पहले तो मां चुप रहीं, फिर बोलीं, 'क्यों बेटा, मेरे पास रहने में तुम्हें दिक्कत हो रही है जो तुम मुझे छोड़ कर जाना चाहते हो? कोई मां अपने पुत्र को विदेश जाने की आज्ञा नहीं दे सकती। मैं भी नहीं दूंगी।'

मां की बात सुन कर मुखर्जी ने लन्दन जाने का इरादा छोड़ दिया। दूसरे दिन वह सीधे कर्जन के पास पहुंचे और उन्होंने कहा, 'सर, मैं लंदन नहीं जा सकता।' कर्जन चौंक कर बोले, 'आखिर क्यों? लंदन जाना तो भारतीय अपना गौरव समझते हैं।' मुखजीर् ने कहा, 'आप ठीक कह रहे सर, लेकिन मेरी मां की इच्छा नहीं है कि मैं लंदन जाऊं।' कर्जन बोले, 'क्या मेरी आज्ञा से बढ़ कर आपकी मां की इच्छा है। यह नहीं हो सकता। आपको जाना ही होगा। अपनी मां से जाकर कहिए कि यह लॉर्ड का हुक्म है।' मुखर्जी कर्जन के रवैये से तिलमिला गए। उन्होंने जेब से एक कागज निकाला और उस पर कुछ लिख कर कर्जन को देते हुए कहा, 'यह रहा मेरा इस्तीफा।' इस्तीफे में लिखा था- मैं मां कीआज्ञा को आप के आदेश से ऊंचा मानता हूं इसलिए मेरा इस्तीफा स्वीकार करें। कर्जन ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया ।

वास्तविक सुख

काशी के एक संत अपना भव्य आश्रम बनाने के लिए धन इकट्ठा करने निकले। घूमते-घूमते एक दिन वह सूफी संत राबिया की कुटिया में पहुंचे। राबिया ने संत का स्वागत किया। उन्होंने अपने हाथ से खाना बनाकर खिलाया। इसके बाद उनके सोने के लिए एक तख्त पर दरी बिछा दी और तकिया रख दिया। स्वयं जमीन पर एक टाट बिछा कर सो गईं। संत को दरी पर नींद नहीं आ रही थी क्योंकि वह मोटे गद्दे पर सोने के आदी थी। लेकिन राबिया को सोते ही गहरी नींद आ गई। संत रात भर करवटें बदलते रहे और सोचते रहे कि राबिया को सख्त जमीन पर नींद कैसे आ गई। सुबह संत ने पूछा,'राबिया, तुमने मुझे तख्त पर दरी बिछा कर सुलाया और स्वयं जमीन पर टाट बिछा कर सो गई फिर भी मुझे रात भर नींद नहीं आई और तुम्हें लेटते ही गहरी नींद आ गई। इसका राज क्या है?'

राबिया बोलीं, 'गुरुदेव, इसमें कोई राज नहीं है। मेरी छोटी कुटिया भी मुझे बड़ी लगती है। एक दरी है, वह लगती है कि सबसे आरामदेह बिछावन है। मेरी कुटिया में एक वक्त के भोजन की भी सामग्री होती है तो मुझे लगता है कि मैं बहुत भाग्यशाली हूं कि प्रभु ने मुझे भूखा नहीं सोने दिया। जब मैं सोती हूं तो मुझे यह पता नहीं होता कि मेरे पीठ के नीचे गद्दा है या टाट। उस समय मुझे दिन भर के किए गए सत्कर्मों के स्मरण से परम आनंद मिलता है कि मैं अपना सब कुछ भूल कर परम पिता की गोद में सुख पूर्वक सो जाती हूं।'

संत जाने लगे तो राबिया बोली, 'क्या मैं भी आप के साथ चलूं धन इकट्ठा करने?' संत ने कहा, 'तुमने बता दिया कि दुनिया का परम सुख कहां है। अब मुझे आश्रम की जरूरत नहीं है।' वह काशी लौटकर अपने शिष्यों से बोले, 'अब हमें भव्य आश्रम की जरूरत नहीं है। जितना धन इकट्ठा हुआ है उसे गरीबों में बांट दो।' वह स्वयं एक साधारण कुटिया बना कर रहने लगे।

बालिका की सीख

अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन काफी बदसूरत थे लेकिन अपने गुणों के कारण वह देश में अत्यंत लोकप्रिय थे। जनता उन्हें बेहद प्यार करती थी। एक बार एक बालिका ने किसी से लिंकन की प्रशंसा सुनी, तो उसके मन में उनसे मिलने की उत्सुकता जागी। उसने अपने पिता से कहा, 'पिताजी, मैं राष्ट्रपति को देखना चाहती हूं क्योंकि सभी उनकी बहुत प्रशंसा करते हैं। मैं देखना चाहती हूं कि वह कैसे हैं।' पिता ने कहा, 'बेटी, वह अच्छे नहीं हैं। वह बहुत काले और भद्दे हैं। उन्हें देखकर तुम डर सकती हो। इसलिए मैं तुम्हें उनके पास लेकर नहीं जाना चाहता।' लेकिन लड़की अड़ गई। वह बार-बार लिंकन से मिलने की जिद करने लगी। पिता ने टालने की बहुत कोशिश की, तरह-तरह का बहाना बनाया लेकिन अपनी बेटी की जिद के आगे झुकना ही पड़ा। पिता को उसे लिंकन के पास ले जाना पड़ा।

जब वह राष्ट्रपति आवास पर पहुंचे तो लिंकन अपने काम में व्यस्त थे फिर भी उन्होंने बाप-बेटी का भव्य स्वागत किया और आने का कारण पूछा। उस व्यक्ति ने कहा, 'मेरी बेटी आपकी बहुत बड़ी प्रशंसक है। वह आपसे मिलने के लिए बहुत हठ कर रही थी। इसलिए मैं उसे आपके पास लेकर आया हूं ताकि वह आपको देख सके।' इतना सुनते ही लिंकन उठ खड़े हुए और उस बालिका को अपनी गोद में उठाकर अपने छोटे से बगीचे में घूमने लगे। उन्होंने उस बालिका से हंस-हंस कर ढेर सारी बातें की और उसका मनोरंजन किया।

बालिका को खुश देखकर लिंकन भी बेहद खुश हो रहे थे। जब वे लौटकर जाने लगे तो बालिका ने कहा, 'पिताजी, हमारे राष्ट्रपति तो बहुत सुंदर हैं। बहुत प्यारे हैं। आप तो कहते थे कि वे भद्दे हैं, बदसूरत हैं, मैं उन्हें देखकर डर जाऊंगी। मगर मुझे तो जरा भी डर नहीं लगा। मुझे तो उनके साथ बड़ा मजा आया।' यह सुनकर पिता ने लज्जा से नजरें झुका लीं। बालिका ने उसे बहुत बड़ी सीख दी थी।