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मां की आज्ञा

उस समय लॉर्ड कर्जन कलकत्ता के गवर्नर थे और आशुतोष मुखर्जी हाई कोर्ट के सबसे सम्मानित और ईमानदार न्यायाधीश। लॉर्ड कर्जन मुखर्जी का बहुत सम्मान करते थे। उस समय किसी भारतीय अधिकारी को लंदन जाने का मौका मिलता था, तो उसकी प्रतिष्ठा बढ़ जाती थी। मुखर्जी भी लंदन जाना चाहते थे पर संकोची स्वभाव के कारण कभी यह इच्छा प्रकट नहीं करते थे। लेकिन दोस्तों के बार-बार कहने पर उन्होंने लंदन जाने का मन बनाया।

कर्जन को जब इसका पता चला तो उन्होंने पहल करते हुए एक दिन कहा, 'मिस्टर मुखर्जी, आप को खुशी होगी कि इस बार लंदन जाने वालों की लिस्ट में आप का नाम सबसे ऊपर होगा।' मुखर्जी ने कहा, 'थैंक्यू सर।' मुखर्जी जब शाम को घर लौटे तो उन्होंने यह बात अपनी मां को बताई। पहले तो मां चुप रहीं, फिर बोलीं, 'क्यों बेटा, मेरे पास रहने में तुम्हें दिक्कत हो रही है जो तुम मुझे छोड़ कर जाना चाहते हो? कोई मां अपने पुत्र को विदेश जाने की आज्ञा नहीं दे सकती। मैं भी नहीं दूंगी।'

मां की बात सुन कर मुखर्जी ने लन्दन जाने का इरादा छोड़ दिया। दूसरे दिन वह सीधे कर्जन के पास पहुंचे और उन्होंने कहा, 'सर, मैं लंदन नहीं जा सकता।' कर्जन चौंक कर बोले, 'आखिर क्यों? लंदन जाना तो भारतीय अपना गौरव समझते हैं।' मुखजीर् ने कहा, 'आप ठीक कह रहे सर, लेकिन मेरी मां की इच्छा नहीं है कि मैं लंदन जाऊं।' कर्जन बोले, 'क्या मेरी आज्ञा से बढ़ कर आपकी मां की इच्छा है। यह नहीं हो सकता। आपको जाना ही होगा। अपनी मां से जाकर कहिए कि यह लॉर्ड का हुक्म है।' मुखर्जी कर्जन के रवैये से तिलमिला गए। उन्होंने जेब से एक कागज निकाला और उस पर कुछ लिख कर कर्जन को देते हुए कहा, 'यह रहा मेरा इस्तीफा।' इस्तीफे में लिखा था- मैं मां कीआज्ञा को आप के आदेश से ऊंचा मानता हूं इसलिए मेरा इस्तीफा स्वीकार करें। कर्जन ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया ।