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नजीर की दयालुता

महान कवि नजीर अकबराबादी आगरा में राजा विलास राय के बच्चों को पढ़ाते थे। एक दिन बच्चों को पढ़ाते समय उन्हें राजा का तेज स्वर सुनाई दिया। वह बाहर आए। राजा अपने एक घोड़े की ओर इशारा कर कह रहे थे, 'इस उपद्रवी घोड़े को गोली मार दो। हम इंतजार कर रहे थे कि कुछ समय बाद यह खुद सुधर जाएगा मगर इसने तो उत्पात मचा कर रख दिया है। जैसे ही कोई इस पर सवारी करने को होता है यह वैसे ही उसे जोर की पटकनी देकर घायल कर देता है। कई लोग इसकी बदसलूकी का शिकार हो चुके हैं। अब इस खुराफाती घोड़े का जीवित रहना बेकार है।'

नजीर साहब बेकसूर घोड़े को मौत के मुंह में जाते देख द्रवित हो गए और बोले, 'महाराज, इस घोड़े को आप मारिए नहीं, हमें दे दीजिए।' यह सुनकर राजा आश्चर्यचकित हो गए और बोले, 'नजीर साहब, यदि आप इस घोड़े पर बैठेंगे तो फिर हमारे बच्चों को कौन पढ़ाएगा?' राजा के यह कहने पर नजीर साहब बोले, 'महाराज, आप घबराइए मत, हमें कुछ नहीं होगा। हम आपको इस बात का भरोसा दिलाते हैं।'

नजीर साहब के अनेक बार ऐसा कहने पर राजा ने घोड़ा उन्हें दे दिया। घोड़ा शांत भाव से उनके साथ चला गया। दूसरे दिन राजा समेत उनके सभी कारिंदे यह देखकर हैरान रह गए कि नजीर साहब उसी घोड़े पर आराम से बैठकर बच्चों को पढ़ाने के लिए आए हैं। उन्हें हैरान देख नजीर साहब मुस्कराते हुए बोले, 'इसमें इतनी हैरानी न करिए। इस मूक प्राणी को भी मुहब्बत समझने की अक्ल खुदा ने दी है।' यह सुनकर राजा अत्यंत शर्मिंदा हुए और जान गए कि हर प्राणी प्रेम का भूखा होता है। फर्क यह है कि कई लोग मूक प्रेम की भाषा नहीं समझ पाते। वह घोड़ा लंबे समय तक नजीर साहब के साथ रहा।