Search This Blog

उचित पारिश्रमिक

यह घटना उस समय की है जब मैसूर रियासत के दीवान सर विश्वेश्वरैया राज्य के किसी कार्य से शिकागो गए हुए थे । वहां पर उन्हें किसी विषय पर एक दस्तावेज बनवाने की आवश्यकता महसूस हुई। इसके लिए उन्होंने कई लोगों से संपर्क किया। आखिरकार एक वकील का पता चला जो इस कार्य के लिए सबसे उपयुक्त थे। विश्वेश्वरैया ने उस वकील से संपर्क किया और उससे वह दस्तावेज बनाने की बात की। सारी बात जानने के बाद उस वकील ने दस्तावेज बनाने के लिए पारिश्रमिक के रूप में सात डॉलर मांगे।

विश्वेश्वरैया ने वकील को काम के बाद सात डॉलर देना मंजूर कर लिया। दस्तावेज तैयार होने के बाद वह उसे लेने के लिए वकील के घर पहुंचे। उस समय वकील महोदय घर पर नहीं थे। उनकी पत्नी ने उन्हें दस्तावेज दे दिया। विश्वेश्वरैया ने वहीं पर दस्तावेज को देखा। उन्हें वकील द्वारा बनाया गया दस्तावेज बहुत पसंद आया। वकील के काम से प्रभावित होकर विश्वेश्वरैया ने वकील की पत्नी को सात की जगह आठ डॉलर दे दिए और दस्तावेज लेकर वापस आ गए।

शाम को वकील महोदय विश्वेश्वरैया के पास पहुंचे और उन्हें एक अतिरिक्त दिया गया डॉलर वापस करने लगे। विश्वेश्वरैया उसे लेने से इनकार करते हुए बोले, 'महोदय, मुझे आपके द्वारा तैयार दस्तावेज बहुत अच्छा लगा, मैं अपने को रोक न सका। आपके काम से प्रसन्न होकर ही मैंने एक डॉलर अधिक दे दिया है।' विश्वेश्वरैया की इस बात पर वकील साहब ने कहा, 'मैंने आपसे बढ़िया कार्य के ही पैसे तय किए थे। पारिश्रमिक तय होने पर अच्छा काम करके देना ही मेरा धर्म था। इसलिए मैं अतिरिक्त राशि नहीं ले सकता।'

विश्वेश्वरैया के बहुत आग्रह के बावजूद वकील महोदय ने वह अतिरिक्त एक डॉलर नहीं लिया और उसे वापस देकर चले गए। विश्वेश्वरैया उस वकील की काम के प्रति अनूठी लगन देखकर गदगद हो गए। मैसूर लौटकर उन्होंने उस वकील के बारे में सबको बताया।