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श्लोक की कीमत

महाकवि भारवी ने अपनी मृत्यु के पूर्व एक श्लोक लिखा, जिसका भाव है,'सहसा कोई कार्य मत करो। अविवेक भीषण विपदा के कारण होते हैं। गुण के लोभ में लक्ष्मी स्वयं आकर विवेकशील जनों का वरण करती है।' श्लोक लिखने के बाद भारवी ने उसे अपनी पत्नी को सौंप दिया।

दैव योग से कुछ समय बाद भारवी की मृत्यु हो गई और उनकी पत्नी को आर्थिक समस्याओं ने घेर लिया। घर में और कुछ था नहीं, मजबूर हो कर वे भारवी के लिखे उस श्लोक को ही लेकर बाजार में बेचने के लिए पहुंचीं। यह भी एक संयोग ही था कि उधर नगर सेठ ने घोषणा कर रखी थी कि बाजार में जो वस्तु बिकने से वंचित रह जाएगी, उसे वह स्वयं खरीद लेगा। शाम हो गई पर किसी ने वह श्लोक खरीदने में रुचि नहीं दिखाई। बाजार खत्म होने के बाद बिकने से बचा रह गया वह श्लोक खरीदने के लिए सेठ भारवी की पत्नी के पास पहुंचे, पर कीमत बीस स्वर्ण मुदाएं सुनकर सन्न रह गए। प्रश्न प्रतिष्ठा का था, सो अनमने भाव से उसे खरीद लिया और शोभा के लिए उसे बड़े-बड़े स्वर्ण अक्षरों में लिखवाकर अपने शयन कक्ष में टंगवा दिया।

कुछ दिनों बाद सेठ की पत्नी गर्भवती हुई। लेकिन उसी समय अचानक सेठ को व्यापार के प्रयोजन से दूसरे देश जाना पड़ा। वहां कारोबार के सिलसिले में उसे लंबे समय तक रुकना पड़ा। कुछ वर्षों बाद जब सेठ वापस लौटा तो घर में अपनी पत्नी को एक किशोर के साथ लेटा हुआ पाया। वह घृणा और क्रोध से भर उठा। म्यान से तलवार निकालकर उन्हें मारने बढ़ा, तभी उसकी नजर दीवार पर टंगे भारवी के श्लोक पर पड़ी। श्लोक का मर्म समझकर उसने पहले पत्नी से पूछना उचित समझा, यह कौन है? पत्नी खुशी से भरी सो रहे किशोर के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, आपका पुत्र। नगर सेठ सोचने लगा, बीस स्वर्ण मुद्राओं में खरीदे इस श्लोक ने आज मुझे सर्वनाश से बचा लिया।