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गहनों का त्याग

गांधीजी जगह-जगह सभाएं करके हरिजन उत्थान के लिए धन एकत्र कर रहे थे। मालाबार के बगडरा गांव की सभा में उन्होंने अपने भाषण में कहा, जिस देश में करोड़ों लोग आधे पेट रहते हों और लगभग अस्सी प्रतिशत लोगों को पूरा पौष्टिक भोजन न मिलता हो, उस देश में गहना पहनना आंखों को बुरा लगता है। यह तो इतनी सारी पूंजी को रोक रखना या उसे बर्बाद हो जाने देना हुआ। इस आंदोलन में स्त्रियां व पुरुष अपने गहने दें तो मैं मानता हूं कि समाज को उससे स्पष्ट लाभ होगा। गांधीजी की बात सुनकर कौमुदी नामक एक पंद्रह वर्षीय छात्रा मंच पर आई और अपने हाथ, गले और कान से सारे गहने उतार कर गांधीजी की ओर बढ़ाते हुए उनसे पूछा, क्या इनके बदले आप मुझे अपने हस्ताक्षर देंगे?

अवश्य दूंगा, गांधीजी ने उसकी उम्र को देखते हुए चिंता से पूछा, पर क्या तुमने अपने माता-पिता से ये गहने देने की आज्ञा ले ली है?

कौमुदी कुछ कहे इससे पहले ही एक सज्जन बोल उठे, कौमुदी के पिता सभा में उपस्थित हैं और मानपत्रों की जो नीलामी चल रही है, उसमें बोली लगाकर आपकी मदद कर रहे हैं। कौमुदी के पिता ने स्वीकार किया कि कौमुदी ने उनसे आज्ञा लेकर ही गहने दान दिए हैं। गांधीजी फिर भी संतुष्ट नहीं हुए, उन्होंने कौमुदी से कहा, तुमने जो गहने दिए हैं, उनके बदले नए नहीं पहनोगी? नहीं पहनूंगी, कौमुदी ने दृढ़ता से कहा। लेकिन गहने न पहनने से तुम्हारी माता को तो दुख होगा? हां, दुख तो होगा, लेकिन वे इसके लिए मुझ पर जबरदस्ती नहीं करेंगी, कौमुदी ने कहा। किंतु तुम शादी तो करोगी ही, तब तुम्हारा पति यदि गहनों के त्याग को पसंद न करे तो? गांधी जी ने चिंता से पूछा। कौमुदी एक क्षण के लिए विचारमग्न हो गई, फिर बोली, बापू! मैं ऐसा पति चुनूंगी जो मुझ पर गहने पहनने के लिए दबाव न डाले। यह सुनकर गांधीजी गद्गद हो गए और हस्ताक्षर देते समय लिखा, तुमने जो गहने दिए हैं, उनकी अपेक्षा तुम्हारा त्याग ही सच्चा अलंकार है।