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इस शहर का हर पेड़ बीमार-सा क्यों है

15 सितंबर 2008 की रात। बाबा खड़क सिंह मार्ग पर रात 10 बजे सन्नाटा छा जाता है। इस सन्नाटे को तोड़ा एक जोरदार धमाके जैसी आवाज ने। आसपास के लोग भौचक्के रह गए। डीआईजेड एरिया के सरकारी फ्लैट्स में रहने वाले बाहर निकले तो पता चला कि सड़क किनारे खड़ा एक पेड़ अचानक ही धराशायी हो गया है। जब इस नीम के पेड़ की मौत हुई तो उसके नीचे एक कार खड़ी थी। पेड़ धड़ाम से कार पर ही गिरा। कार पूरी तरह पिचक गई। गनीमत रही कि उस समय कार में कोई नहीं था। लोगों में चर्चा हुई कि नीम के इस हरे-भरे पेड़ को अचानक क्या हुआ कि वह अनायास मौत का ग्रास बन गया।

दरअसल, राजधानी में कंक्रीट का जंगल हरियाली को निगल रहा है और यह पेड़ भी कंक्रीट के दानव का शिकार बन गया। क्या आप जानते हैं कि हर पेड़ के चारों तरफ कम से कम छह फुट जगह अवश्य छोड़ी जानी चाहिए, लेकिन अधिकतर स्थानों पर इस नियम पर अमल नहीं किया जाता। एनडीएमसी ने अपने बजट में ट्री एंबुलेंस बनाने की घोषणा की है। यह एंबुलेंस बीमार और क्षतिग्रस्त पेड़ों की रक्षा करेगी। लेकिन वास्तव में एनडीएमसी इलाके के 95 हजार पेड़ों की क्या हालत है या उन्हें बचाने के लिए क्या किया जा रहा है, इस सवाल का जवाब आरटीआई से जानने की कोशिश की गई। आरटीआई एक्टिविस्ट देवाशीष भट्टाचार्य को जो जवाब मिले हैं, वह काफी चौंकाने वाले भी हैं और यह भी पता चलता है कि हॉर्टिकल्चर विभाग के पास पेड़ों को बचाने का कोई साधन नहीं है। यही नहीं, जहां विभाग के अधिकारी पेड़ बचाना भी चाहते हैं, वहां उनकी चलती ही नहीं है।

जिस पेड़ का ऊपर जिक्र किया गया है, एनडीएमसी ने माना है कि उसे कोई बीमारी नहीं थी। हालांकि विभाग का दावा है कि उसके कर्मचारी पेड़ों की बाकायदा निगरानी करते हैं लेकिन इसकी कोई अवधि तय नहीं है। इस नीम के पेड़ के किसी तरह बीमार या क्षतिग्रस्त होने की सूचना भी उनके पास नहीं थी। ऐसे में उस पर किसी कीटनाशक के छिड़काव की जरूरत भी महसूस नहीं की गई। जाहिर है हॉर्टिकल्चर विभाग इस पेड़ की मौत का कारण नहीं जानता और न ही इसके लिए किसी को दोषी मानता है।

एनडीएमसी क्षेत्र में तेज हवा के चलते ही अचानक पेड़ों के गिरने की घटनाएं बढ़ गई हैं। पिछले तीन सालों में करीब तीन सौ पेड़ अचानक ही मौत का शिकार हो गए हैं। इनमें से अधिकतर ब्रिटिश काल के हैं और उन्हें सड़क किनारे प्लान करके रोपा गया था। ऐसे पेड़ों को बनाए रखने की जिम्मेदारी हॉर्टिकल्चर विभाग की ही होती है लेकिन उनके आसपास फुटपाथ बनाकर उसकी जड़ों में हवा-पानी जाने का रास्ता बंद कर दिया जाता है। विभाग ने आरटीआई के जवाब में माना है कि प्रत्येक पेड़ के आसपास 6-6 फुट की जगह खाली छोड़ी जानी चाहिए।

इस तरह के निर्देश भी जारी किए जाते हैं लेकिन विभाग ने माना है कि कई बार ठेकेदार पेड़ों की जान की परवाह नहीं करते। जाहिर है कि ठेकेदार को प्रति वर्ग फुट के हिसाब से कंक्रीट बिछाने का ठेका मिलता है और वह इस नियम की परवाह नहीं करता। अधिकारी भी आंखें मूंद लेते हैं। वैसे, विभाग ने दावा किया है कि जब ऐसी कोई शिकायत सामने आती है तो संबंधित एंजीनियर को बताया जाता है। जनता से भी अनुरोध किया गया है कि वे जब ऐसा होता देखें तो विभाग को सूचित करें। क्या इस पेड़ की जगह कोई नया पौधा रोपा गया तो विभाग का जवाब है कि अगले महीने यानी मार्च में रोपा जाएगा।