एक बार मराठों ने मालवा पर आक्रमण करके उसे जीत लिया। लेकिन मराठा सेना के पास खाद्यान्न की कमी हो गई। सेनापति ने अधिकारियों को आदेश दिया, 'जाओ, जहां से भी प्रचुर मात्रा में अन्न मिले, लेकर आओ।' अधिकारी गए, पर अन्न मिलता कहां से। खेत तो सारे जल गए थे। अंतत: वे खोजते-खोजते एक स्थान पर पहुंचे, जहां एक वृद्ध आदमी मिला।
एक अधिकारी ने पूछा, 'यहां अनाज कहां मिलेगा?' उसने कहा, 'मैं बताता हूं, मेरे साथ आओ।' सब उसके साथ चले। कुछ ही दूरी पर फसल से लहलहाता हुआ खेत मिला। अधिकारियों ने प्रसन्नता से कहा, 'अब हमें पर्याप्त अनाज मिल जाएगा।' बूढ़े ने कहा, 'नहीं, यहां नहीं, अभी आगे चलिए।' कुछ दूरी पर दूसरा खेत आया। फसल की ओर इशारा करते हुए वृद्ध ने कहा, 'यहां से अनाज ले लें।' अधिकारियों ने कहा, 'इस खेत से ज्यादा अनाज तो उस खेत में था, जिसे हम पीछे छोड़ आए।' बूढ़े ने कहा, 'आप ठीक कहते हैं, लेकिन वह खेत मेरा नहीं था। दूसरे के अन्न पर मेरा कोई हक नहीं है। उसे किसी और को देने का मुझे अधिकार नहीं। यह खेत मेरा है। इसका अन्न मैं किसी को भी दे सकता हूं।' अधिकारी अवाक् रह गए।
एक अधिकारी ने पूछा, 'यहां अनाज कहां मिलेगा?' उसने कहा, 'मैं बताता हूं, मेरे साथ आओ।' सब उसके साथ चले। कुछ ही दूरी पर फसल से लहलहाता हुआ खेत मिला। अधिकारियों ने प्रसन्नता से कहा, 'अब हमें पर्याप्त अनाज मिल जाएगा।' बूढ़े ने कहा, 'नहीं, यहां नहीं, अभी आगे चलिए।' कुछ दूरी पर दूसरा खेत आया। फसल की ओर इशारा करते हुए वृद्ध ने कहा, 'यहां से अनाज ले लें।' अधिकारियों ने कहा, 'इस खेत से ज्यादा अनाज तो उस खेत में था, जिसे हम पीछे छोड़ आए।' बूढ़े ने कहा, 'आप ठीक कहते हैं, लेकिन वह खेत मेरा नहीं था। दूसरे के अन्न पर मेरा कोई हक नहीं है। उसे किसी और को देने का मुझे अधिकार नहीं। यह खेत मेरा है। इसका अन्न मैं किसी को भी दे सकता हूं।' अधिकारी अवाक् रह गए।