जब भी किसी मुद्दे पर कोई फैसला होता है तो उसमें ऐसा कभी नहीं होता कि सभी पक्ष नाराज़ हो जाएं। एक पक्ष खुश होता है तो दूसरा नाखुश, लेकिन दिल्ली में स्कूलों की फीस के मुद्दे पर हर शख्स परेशान-सा है। खासतौर पर पैरंट्स हैरान-परेशान हैं। वे अपने आपको एक चक्रव्यूह में फंसा महसूस कर रहे हैं। ऐसा चक्रव्यूह जिससे निकल पाने का कोई रास्ता उन्हें नहीं सूझ रहा। इस चक्रव्यूह में उन्होंने अपने आप प्रवेश नहीं किया, लेकिन कोई कसूर न होते हुए भी वे सजा पाने को मजबूर हैं।
छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद से ही वे हताश हैं। हालांकि सरकार ने उन्हें समय-समय पर साथ होने का सब्जबाग दिखाया लेकिन यह साथ केवल कागजी स्तर पर ही नजर आ रहा है, क्योंकि इस लड़ाई में वे अपने आपको बेहद अकेला महसूस कर रहे हैं। वेतन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद पब्लिक स्कूलों की ओर से टीचर्स के वेतन के अनुसार फीस में भी बढ़ोतरी की बातें शुरू हो गई थीं। दिल्ली सरकार ने तय किया कि फीस मनमर्जी के मुताबिक बढ़ाने नहीं दी जाएगी। इसके बाद सरकार ने फीस बढ़ोतरी पर एक कमिटी का गठन कर दिया. कमिटी की रिपोर्ट आई कि स्कूल 500 रुपये मासिक तक ट्यूशन फीस बढ़ा सकते हैं। स्कूलों का वगीर्करण भी कर दिया गया। यह फीस पिछले साल सितंबर से बढ़ाने की अनुमति दे दी गई यानी सात महीने की फीस और 2006 से अदा की जाने वाली टीचर्स की सैलरी का एरियर भी पैरंट्स के जिम्मे आ गया। यह एरियर तीन किस्तों में देने की बात कही गई।
दिल्ली में भले ही सरकारी स्कूलों का बोर्ड एग्जाम का रिजल्ट दिन दूनी-रात चौगुनी तरक्की कर रहा हो, लेकिन सचाई यही है कि आज भी पैरंट्स पब्लिक स्कूलों को ही तरजीह देते हैं। शिक्षा मंत्री हों, शिक्षा निदेशक या अन्य कोई प्रभावशाली व्यक्ति, किसी का भी बच्चा सरकारी स्कूल का स्टूडेंट नहीं है। दिल्ली के 2,000 से ज्यादा पब्लिक स्कूल एजुकेशन सिस्टम में सरकार का सहयोग तो कर रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि ज्यादातर स्कूल सिर्फ दुकानें बनकर रह गए हैं। इन स्कूल मालिकों का सीधा-सा तर्क है कि डीटीसी के बजाय अगर आपको एसी कैब में सफर करना है तो किराया अधिक देना ही होगा।
लिहाजा आज न तो स्कूल संतुष्ट हैं, न टीचर और न ही पैरंट्स। तीन चौथाई पब्लिक स्कूल ऐसे हैं जो टीचर्स को पूरा वेतन देते ही नहीं। केवल कागजों में पूरा वेतन दिया जाता है और अब कागजों में ही वेतन भी बढ़ा दिया जाएगा। जाहिर है कि इन स्कूलों के टीचर केवल मन मसोसकर बैठे हैं। बाकी एक चौथाई स्कूल ऐसे हैं जिन्हें यह लग रहा है कि सरकार ने जितना वेतन बढ़ाने की इजाजत दी है, वह पर्याप्त नहीं है। वे इस आदेश के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी में हैं। पैरंट्स इस बोझ को सहने की स्थिति में नहीं हैं।
सरकार ने पैरंट्स से कहा कि आपको कोई ऐतराज है तो शिकायत करो। जिसका बच्चा स्कूल में पढ़ रहा है, वह शिकायत का जोखिम कैसे उठा सकता है। कुछ पैरंट्स ने हिम्मत दिखाई और शिकायत की लेकिन आज तक एक भी स्कूल के खिलाफ कोई कार्रवाई की सूचना नहीं है। स्कूलों ने बोर्ड एग्जाम के एडमिट कार्ड देने के नाम पर भी ब्लैकमेलिंग की और नतीजे आने पर भी इसी प्रकार का रवैया होगा। स्कूल नए सेशन में फिर फीस बढ़ाने पर आमादा हैं और उनका यह भी तर्क है कि सरकार कानूनन इससे रोक ही नहीं सकती।
इस मामले में सरकार को जमीनी कार्रवाई करनी चाहिए थी। स्कूल मैनेजमेंट, टीचर और पैरंट्स तीनों पक्षों को एक साथ बैठाकर कोई ऐसा हल तलाश करना चाहिए था ताकि कोई भी अपने आपको ठगा-सा महसूस न करे। जब तक दिमागी तौर पर यह बात साफ नहीं होगी कि स्कूल शिक्षा की दुकान नहीं हैं और शिक्षा मुहैया कराना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है, तब तक इस चक्रव्यूह से नहीं निकला जा सकता। खासतौर पर चुनावी माहौल में सभी पक्षों को संतुष्ट करना और भी जरूरी है।
छठे वेतन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद से ही वे हताश हैं। हालांकि सरकार ने उन्हें समय-समय पर साथ होने का सब्जबाग दिखाया लेकिन यह साथ केवल कागजी स्तर पर ही नजर आ रहा है, क्योंकि इस लड़ाई में वे अपने आपको बेहद अकेला महसूस कर रहे हैं। वेतन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद पब्लिक स्कूलों की ओर से टीचर्स के वेतन के अनुसार फीस में भी बढ़ोतरी की बातें शुरू हो गई थीं। दिल्ली सरकार ने तय किया कि फीस मनमर्जी के मुताबिक बढ़ाने नहीं दी जाएगी। इसके बाद सरकार ने फीस बढ़ोतरी पर एक कमिटी का गठन कर दिया. कमिटी की रिपोर्ट आई कि स्कूल 500 रुपये मासिक तक ट्यूशन फीस बढ़ा सकते हैं। स्कूलों का वगीर्करण भी कर दिया गया। यह फीस पिछले साल सितंबर से बढ़ाने की अनुमति दे दी गई यानी सात महीने की फीस और 2006 से अदा की जाने वाली टीचर्स की सैलरी का एरियर भी पैरंट्स के जिम्मे आ गया। यह एरियर तीन किस्तों में देने की बात कही गई।
दिल्ली में भले ही सरकारी स्कूलों का बोर्ड एग्जाम का रिजल्ट दिन दूनी-रात चौगुनी तरक्की कर रहा हो, लेकिन सचाई यही है कि आज भी पैरंट्स पब्लिक स्कूलों को ही तरजीह देते हैं। शिक्षा मंत्री हों, शिक्षा निदेशक या अन्य कोई प्रभावशाली व्यक्ति, किसी का भी बच्चा सरकारी स्कूल का स्टूडेंट नहीं है। दिल्ली के 2,000 से ज्यादा पब्लिक स्कूल एजुकेशन सिस्टम में सरकार का सहयोग तो कर रहे हैं, लेकिन यह भी सच है कि ज्यादातर स्कूल सिर्फ दुकानें बनकर रह गए हैं। इन स्कूल मालिकों का सीधा-सा तर्क है कि डीटीसी के बजाय अगर आपको एसी कैब में सफर करना है तो किराया अधिक देना ही होगा।
लिहाजा आज न तो स्कूल संतुष्ट हैं, न टीचर और न ही पैरंट्स। तीन चौथाई पब्लिक स्कूल ऐसे हैं जो टीचर्स को पूरा वेतन देते ही नहीं। केवल कागजों में पूरा वेतन दिया जाता है और अब कागजों में ही वेतन भी बढ़ा दिया जाएगा। जाहिर है कि इन स्कूलों के टीचर केवल मन मसोसकर बैठे हैं। बाकी एक चौथाई स्कूल ऐसे हैं जिन्हें यह लग रहा है कि सरकार ने जितना वेतन बढ़ाने की इजाजत दी है, वह पर्याप्त नहीं है। वे इस आदेश के खिलाफ कोर्ट जाने की तैयारी में हैं। पैरंट्स इस बोझ को सहने की स्थिति में नहीं हैं।
सरकार ने पैरंट्स से कहा कि आपको कोई ऐतराज है तो शिकायत करो। जिसका बच्चा स्कूल में पढ़ रहा है, वह शिकायत का जोखिम कैसे उठा सकता है। कुछ पैरंट्स ने हिम्मत दिखाई और शिकायत की लेकिन आज तक एक भी स्कूल के खिलाफ कोई कार्रवाई की सूचना नहीं है। स्कूलों ने बोर्ड एग्जाम के एडमिट कार्ड देने के नाम पर भी ब्लैकमेलिंग की और नतीजे आने पर भी इसी प्रकार का रवैया होगा। स्कूल नए सेशन में फिर फीस बढ़ाने पर आमादा हैं और उनका यह भी तर्क है कि सरकार कानूनन इससे रोक ही नहीं सकती।
इस मामले में सरकार को जमीनी कार्रवाई करनी चाहिए थी। स्कूल मैनेजमेंट, टीचर और पैरंट्स तीनों पक्षों को एक साथ बैठाकर कोई ऐसा हल तलाश करना चाहिए था ताकि कोई भी अपने आपको ठगा-सा महसूस न करे। जब तक दिमागी तौर पर यह बात साफ नहीं होगी कि स्कूल शिक्षा की दुकान नहीं हैं और शिक्षा मुहैया कराना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है, तब तक इस चक्रव्यूह से नहीं निकला जा सकता। खासतौर पर चुनावी माहौल में सभी पक्षों को संतुष्ट करना और भी जरूरी है।