लालबहादुर शास्त्री ने किशोरावस्था में ही अपना जीवन राष्ट्रीय आंदोलन तथा समाज-सुधार के लिए समर्पित कर दिया था। वह हमेशा लोगों को जागरूक करने व सद्कार्यों के प्रचार-प्रसार में ही लगे रहते थे। एक बार उन्होंने देखा कि वधू पक्ष की ओर से दहेज न मिलने पर वर पक्ष वाले वधू पक्ष वालों को जलील कर रहे थे और उन्हें खरी-खोटी सुना रहे थे। शास्त्री जी से रहा न गया, उन्होंने तत्काल हस्तक्षेप किया और वर पक्ष वालों को काफी फटकारा।
दहेज जैसी कुरीति को लेकर वह बेहद दु:खी हुए। इस घटना के बाद उन्होंने ठान लिया कि वह जिस युवती से विवाह करेंगे, उससे दहेज के नाम पर फूटी कौड़ी भी नहीं लेंगे। उनका मानना था कि ऐसा करने से ही समाज में शिक्षित युवाओं में दहेज का विरोध करने की चेतना जागेगी और इस कुरीति को देश से दूर किया जा सकेगा।
जब उनके विवाह की बातें चल रही थीं, तो उन्होंने apne अभिभावकों से साफ कह दिया कि वह इसी शर्त पर विवाह करेंगे कि दहेज के नाम पर एक फूटी-कौड़ी भी न ली जाए। अभिभावकों ने उनकी इस बात का समर्थन किया और इस तरह बिना दहेज के उनका विवाह सादगी के साथ संपन्न हुआ। जब वधू को विदा किया जाने लगा तो कई लोगों ने कहा कि लड़की का मायके से बिल्कुल खाली हाथ आना शुभ नहीं होता इसलिए शगुन के तौर पर उसे कुछ न कुछ तो दिया ही जाना चाहिए।
शास्त्री जी भी यह बात सुन रहे थे। उन्होंने लोगों से कहा, 'यदि आप सबका यही कहना है तो मैं आपकी बात का सम्मान करते हुए वधू को चरखा ले जाने की इजाजत दे सकता हूं।' उनकी बात मान ली गई और उनकी पत्नी ललिता जी केवल अपने साथ चरखा लेकर विदा हुईं। अपने आदर्श के प्रति शास्त्री जी की इस प्रतिबद्धता को देख लोग दंग रह गए।