महर्षि कणाद अन्न के बिखरे दाने चुन-चुन कर खाते थे। जब राजा ने कणाद को अन्न और धन देना चाहा तो कणाद ने उसे गरीबों में बांट देने को कहा। इस पर राजा ने कहा कि आपसे बढ़कर गरीब कौन होगा। यह वृत्तांत सुनकर रानी बोलीं, 'महाराज! आपको उन्हें गरीब नहीं कहना चाहिए था। उनके पास स्वर्ण-सिद्धि की विद्या है। आप उनसे यह विद्या सीख लें।'
राजा फिर महर्षि के पास आया और बोला, 'मुझे स्वर्ण-सिद्धि की विद्या सिखाएं।' कणाद बोले,' आप मुझे गरीब बता रहे थे। पर मैं कभी आपके दरवाजे पर कुछ मांगने नहीं गया पर आप मुझसे मांगने के लिए याचक की तरह खड़े हो। बताओ गरीब कौन हुआ।'
राजा फिर महर्षि के पास आया और बोला, 'मुझे स्वर्ण-सिद्धि की विद्या सिखाएं।' कणाद बोले,' आप मुझे गरीब बता रहे थे। पर मैं कभी आपके दरवाजे पर कुछ मांगने नहीं गया पर आप मुझसे मांगने के लिए याचक की तरह खड़े हो। बताओ गरीब कौन हुआ।'