एक व्यक्ति एक संत से मिलने गया। संत उस समय अपने आश्रम के पास की ज़मीन खोद रहे थे। व्यक्ति ने संत को प्रणाम और कहा, 'महात्मा जी, मैं आपसे गीता का रहस्य जानना चाहता हूं।' संत बोले, 'अच्छा, आप बैठिए।' यह कहने के बाद वह फिर अपने काम में लग गए। व्यक्ति चुपचाप उन्हें फावड़ा चलाते हुए देखता रहा। वह सोच रहा था कि पता नहीं कब संत का काम समाप्त होगा और वह उसे गीता का ज्ञान कराएंगे। जब काफी समय बीत गया तो उस व्यक्ति का धैर्य चुकने लगा।
आखिरकार उसने कहा, 'मैं तो आपकी ख्याति सुनकर बहुत दूर से आपके पास आया था। पर आपके लिए समय की कोई कीमत ही नहीं है।' संत ने ठहाका लगाया और कहा, 'भाई तब से गीता का रहस्य ही तो समझा रहा हूं मैं।' उस व्यक्ति ने आश्चर्य से कहा, 'कहां समझा रहे हैं। तब से तो मैं बैठा हुआ हूं और आप फावड़ा चला रहे हैं। आप तो एक शब्द भी नहीं बोले।' संत ने कहा, 'बोलने की आवश्यकता ही कहां है। गीता का उपदेश है कर्म करो और फल की चिंता न करो। देखो, मैं अपना कर्म कर रहा हूं।' उस व्यक्ति ने समझ लिया कि संत का आशय क्या है।