क्या आपने दिल्ली-6 देखी है? जी नहीं, मैं फिल्म की बात नहीं कर रहा बल्कि मैं बात कर रहा हूं पुरानी दिल्ली की। उस दिल्ली की जो अपने आप में विरासत का वैभव और इतिहास का गौरव समेटे हुए है। आज उस दिल्ली का हाल यूं है कि कंधे से कंधा टकराकर चलना भी आसान नहीं है। चारों तरफ अवैध कब्जों की भरमार है और वहां से फुर्र करके निकल भागने की इच्छा होती है। यही वजह है कि पुरानी दिल्ली के अधिकतर गली-कूचे अब दुकानों में बदल गए हैं। वहां रिहायश लगातार कम होती जा रही है। इन गली-कूचों की कम होती आबादी की वजह ही थी कि अब चांदनी चौक संसदीय क्षेत्र शालीमार बाग तक जा पहुंचा है।
बात केवल चांदनी चौक की ही नहीं है। पूरी दिल्ली की भीड़-भाड़ अब ऐसे मुकाम पर आ पहुंची है कि दिल्ली की रवानगी पर भी विराम लगने की आशंका पैदा होने लगी है। यह रिपोर्ट चौंकाती नहीं है कि अगले दो सालों में राजधानी की सड़कों पर आप एक घंटे में केवल 6-7 किमी ही चल पाएंगे। दिल्ली की आबादी के साथ ही बढ़ती जा रही है वाहनों की तादाद और उससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि हमारी पूरी व्यवस्था इस सचाई से आंखें मूंदे हुए है। दिल्ली की तुलना अन्य बड़े शहरों से करें तो लगता है कि अब कुछ न करने का समय आ गया है। राजधानी की आबादी 1.70 करोड़ के करीब है जबकि दिल्ली का कुल एरिया है 1483 वर्ग किमी। न्यू यार्क का एरिया है 17, 400 वर्ग किमी और उसकी आबादी है 1.89 करोड़। इसी तरह सबसे ज्यादा भीड़-भाड़ वाले महानगर तोक्यो पर नजर डालें तो उसकी आबादी है 1.27 करोड़ और एरिया है 2187 वर्ग किमी। अब बताइए कि दिल्ली को लेकर चिंता हुई या नहीं।
यह सच है कि किसी को दिल्ली आकर बसने से रोका नहीं जा सकता। यह संभव भी नहीं है लेकिन सरकार को ऐसी नीतियां अवश्य बनानी होंगी कि एक तरफ तो जहां दिल्ली को ग्रेटर दिल्ली का रूप मिले, वहीं दिल्ली की आबादी बढ़ने से रोकी जा सके। यह सवाल अब हाई कोर्ट के सामने विचाराधीन है कि अगर डीडीए अपनी किसी हाउसिंग स्कीम की घोषणा करता है तो वह केवल दिल्ली वालों के लिए ही हो। हाल ही में डीडीए घोटाला इसीलिए संभव हो पाया कि राजधानी में अनुसूचित जनजाति की आबादी नहीं है और साढ़े 7 फीसदी फ्लैट रिजर्व करना उसकी संवैधानिक मजबूरी थी। जो व्यक्ति डीडीए का फ्लैट लेगा, वह दिल्ली आकर बसेगा। डीयू को ही देख लें। हर साल उसकी 35 हजार सीटों में से 15 हजार दिल्ली से बाहर के स्टूडेंट को मिल जाती हैं। डीयू सेंट्रल यूनिवर्सिटी है और उसमें एडमिशन के अधिकार से किसी को वंचित नहीं रखा जा सकता। जब डीयू में एडमिशन होगा तो स्टूडेंट दिल्ली आकर रहेंगे ही।
इस सवाल को कभी गंभीरता से नहीं लिया जाता क्योंकि इस बारे में व्यक्त किया गया कोई भी नजरिया राजनीतिक चश्मे से ही देखा जाता है - चाहे उपराज्यपाल यह बात कहें या फिर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित। समस्या की गहराई और दिल्ली को बचाने की ललक किसी में दिखाई नहीं देती। दिल्ली की भीड़ कम करने के कई तरीके सुझाए जाते हैं - ऑफिस दिल्ली के आसपास हों, थोक बाजारों को राजधानी की सीमाओं के बाहर रखा जाए, सड़कों की भीड़ कम करने के लिए पेरिफेरल रोड बनाए जाएं आदि-आदि। इस सुझावों पर अमल के लिए कभी भी इच्छाशक्ति नहीं दिखाई जाती। दरअसल उसी इच्छाशक्ति की जरूरत है और साथ ही यह भी तय करना जरूरी है कि अगर आप दिल्ली से प्यार करते हैं तो इस मसले को राजनीति से दूर रखें। तभी दिल्ली-6 का गौरव भी लौट सकेगा और सभी दिल्ली पर गर्व भी कर सकेंगे।
बात केवल चांदनी चौक की ही नहीं है। पूरी दिल्ली की भीड़-भाड़ अब ऐसे मुकाम पर आ पहुंची है कि दिल्ली की रवानगी पर भी विराम लगने की आशंका पैदा होने लगी है। यह रिपोर्ट चौंकाती नहीं है कि अगले दो सालों में राजधानी की सड़कों पर आप एक घंटे में केवल 6-7 किमी ही चल पाएंगे। दिल्ली की आबादी के साथ ही बढ़ती जा रही है वाहनों की तादाद और उससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि हमारी पूरी व्यवस्था इस सचाई से आंखें मूंदे हुए है। दिल्ली की तुलना अन्य बड़े शहरों से करें तो लगता है कि अब कुछ न करने का समय आ गया है। राजधानी की आबादी 1.70 करोड़ के करीब है जबकि दिल्ली का कुल एरिया है 1483 वर्ग किमी। न्यू यार्क का एरिया है 17, 400 वर्ग किमी और उसकी आबादी है 1.89 करोड़। इसी तरह सबसे ज्यादा भीड़-भाड़ वाले महानगर तोक्यो पर नजर डालें तो उसकी आबादी है 1.27 करोड़ और एरिया है 2187 वर्ग किमी। अब बताइए कि दिल्ली को लेकर चिंता हुई या नहीं।
यह सच है कि किसी को दिल्ली आकर बसने से रोका नहीं जा सकता। यह संभव भी नहीं है लेकिन सरकार को ऐसी नीतियां अवश्य बनानी होंगी कि एक तरफ तो जहां दिल्ली को ग्रेटर दिल्ली का रूप मिले, वहीं दिल्ली की आबादी बढ़ने से रोकी जा सके। यह सवाल अब हाई कोर्ट के सामने विचाराधीन है कि अगर डीडीए अपनी किसी हाउसिंग स्कीम की घोषणा करता है तो वह केवल दिल्ली वालों के लिए ही हो। हाल ही में डीडीए घोटाला इसीलिए संभव हो पाया कि राजधानी में अनुसूचित जनजाति की आबादी नहीं है और साढ़े 7 फीसदी फ्लैट रिजर्व करना उसकी संवैधानिक मजबूरी थी। जो व्यक्ति डीडीए का फ्लैट लेगा, वह दिल्ली आकर बसेगा। डीयू को ही देख लें। हर साल उसकी 35 हजार सीटों में से 15 हजार दिल्ली से बाहर के स्टूडेंट को मिल जाती हैं। डीयू सेंट्रल यूनिवर्सिटी है और उसमें एडमिशन के अधिकार से किसी को वंचित नहीं रखा जा सकता। जब डीयू में एडमिशन होगा तो स्टूडेंट दिल्ली आकर रहेंगे ही।
इस सवाल को कभी गंभीरता से नहीं लिया जाता क्योंकि इस बारे में व्यक्त किया गया कोई भी नजरिया राजनीतिक चश्मे से ही देखा जाता है - चाहे उपराज्यपाल यह बात कहें या फिर मुख्यमंत्री शीला दीक्षित। समस्या की गहराई और दिल्ली को बचाने की ललक किसी में दिखाई नहीं देती। दिल्ली की भीड़ कम करने के कई तरीके सुझाए जाते हैं - ऑफिस दिल्ली के आसपास हों, थोक बाजारों को राजधानी की सीमाओं के बाहर रखा जाए, सड़कों की भीड़ कम करने के लिए पेरिफेरल रोड बनाए जाएं आदि-आदि। इस सुझावों पर अमल के लिए कभी भी इच्छाशक्ति नहीं दिखाई जाती। दरअसल उसी इच्छाशक्ति की जरूरत है और साथ ही यह भी तय करना जरूरी है कि अगर आप दिल्ली से प्यार करते हैं तो इस मसले को राजनीति से दूर रखें। तभी दिल्ली-6 का गौरव भी लौट सकेगा और सभी दिल्ली पर गर्व भी कर सकेंगे।