बड़ौदा के महाराजा एक बार विदेश गए। उनके साथ उनका सचिव भी था। एक बार सचिव खरीदारी के लिए बाजार गया। वहां उसने महाराजा के लिए एक दुकान से कुछ गहने खरीदे। दुकानदार ने सामान देने के बाद पूछा, 'आपका कमिशन?' सचिव ने कहा, 'मैं समझा नहीं। कैसा कमिशन?' दुकानदार ने समझाया, 'आपने महाराजा के गहने खरीदने के लिए हमारी दुकान को चुना। इसके बदले हम आपको कुछ कमिशन देंगे।' सचिव ने कहा, 'मैं तो महाराज का सेवक हूं इसलिए मुझे कमिशन लेने का कोई हक नहीं है। फिर आप जितना कमिशन देंगे उतना मूल्य बढ़ा देंगे।' दुकानदार ने कहा, 'कमिशन का मूल्य पर कोई असर नहीं पड़ता क्योंकि हम यह राशि अपने प्रचार फंड से देते हैं। यह बात आप महाराजा को भी बता सकते हैं।' इस पर सचिव ने कहा, 'ठीक है, आप मुझे कमिशन दे दीजिए लेकिन उतना पैसा महाराजा के बिल में से कम कर दीजिए।' दुकानदार ने कहा, 'आपकी वफादारी और ईमानदारी प्रशंसनीय है। मैं महाराज को इस बारे में बताऊंगा।' सचिव बोला, 'आप ऐसा न करें क्योंकि यह तो मेरा कर्त्तव्य है। यह कोई प्रचार की चीज नहीं है।'