Search This Blog

विद्या की रेखा

बौद्धिक जाने-माने ऋषि थे। उनके आश्रम में कई छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे। उन छात्रों में कुछ राजकुमार थे तो कुछ अत्यंत निर्धन परिवारों के बालक भी। एक दिन ऋषि वृक्ष के नीचे बैठकर संस्कृत के रूप पढ़ा रहे थे। अध्याय समाप्त होने के बाद उन्होंने एक निर्धन छात्र को संस्कृत के रूप सुनाने को कहा पर वह बालक उन रूपों को सुनाने में असमर्थ रहा। इससे क्रोधित ऋषि ने डंडा मारने हेतु छात्र को हाथ आगे करने को कहा। छात्र ने डरते-डरते हाथ आगे कर दिए। उस छात्र के हाथ देखकर ऋषि बोले, 'वत्स, तुम्हें मारना ही व्यर्थ है क्योंकि तुम्हारे हाथ में तो विद्या की रेखा ही नहीं है। तुम्हारा शिक्षा ग्रहण करना ही निरर्थक है।' फिर उन्होंने उसके हाथ की ओर संकेत करते हुए कहा, 'देखो, विद्या की रेखा यहां होती है।' छात्र दुखी मन से उठा और आश्रम के बाहर चला गया। थोड़ी देर बाद जब वह वापस आया तो उसकी हथेली से खून निकल रहा था।


ऋषि ने पूछा, 'तुम्हारे हाथ में क्या हुआ? यह घाव कैसे हो गया?' छात्र ने अत्यंत सहजता के साथ कहा, 'ऋषिवर, यह घाव नहीं है बल्कि विद्या की रेखा है जिसे मैंने स्वयं अपनी हथेली पर बना लिया है।' ऋषि ने तुरंत छात्र का उपचार किया। वह उसकी इच्छा शक्ति और साहस से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने उस दिन से उस पर और अधिक ध्यान देना शुरू कर दिया। छात्र ने अपने गुरु का अपने प्रति प्रेम देखकर अथक परिश्रम करना प्रारंभ कर दिया।

वह दिन-प्रतिदिन उन्नति करने लगा। उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति, परिश्रम, लगन और ऋषि के अथक लगाव ने उसे संस्कृत का विद्वान बना दिया। इस बालक ने ही आगे चलकर संस्कृत का पहला व्याकरण ग्रंथ लिखा जो संसार भर में बेहद प्रसिद्ध हुआ। यह संस्कृत का बेजोड़ ग्रंथ माना जाता है। वह ज्ञानी बालक आगे चलकर व्याकरणाचार्य पाणिनी के नाम से विख्यात हुआ।