संत रविदास जूते बनाने के साथ ईश्वर के भजन में भी लगे रहते थे। उनका विश्वास था कि यदि व्यक्ति सच्चे हृदय से नेक कर्म करेतो उसके पास जीविका हेतु साधन उपलब्ध हो ही जाते हैं। वह प्रतिदिन दो जोड़ी जूते बनाते। उनके बनाए जूते अत्यंत सुंदर, मजबूत और टिकाऊ होते थे इसलिए वे अच्छे दाम में बिक जाते थे।
वह केवल एक जोड़ी जूते बेचते जबकि दूसरी जोड़ी किसी जरूरतमंद को दे देते थे। एक दिन एक व्यक्ति उनके चरणों में स्वर्ण मुद्राओं से भरी थैली रखते हुए बोला, 'प्रियवर, यह तुच्छ भेंट आपके चरणों में समर्पित है। कुछ समय पहले मैं नि:संतान था। आपकी ख्याति सुनकर मैं यहां आया और आपके सामने हृदय से संतान की कामना करके गया। अब मुझे संतान की प्राप्ति हो गई है। मैं इसके लिए ईश्वर के साथ-साथ आपका भी आभारी हूं क्योंकि आपके दर्शनों के बाद ही मुझे संतान की प्राप्ति हुई।'
रविदास ने उस व्यक्ति को स्वर्ण मुद्राएं लौटाते हुए कहा, 'आपने मुझे इतना सम्मान दिया, इसके लिए मैं आपका आभारी हूं। लेकिन अपने जीवनयापन लायक धन मैं प्रतिदिन अर्जित कर लेता हूं। इन स्वर्ण मुद्रओं से यदि आप किसी अपंग या निर्धन व्यक्ति की जरूरत पूरी कर देंगे तो मैं समझूंगा स्वर्ण मुद्राएं मुझे प्राप्त हो गई हैं।' रविदास की इन बातों से प्रभावित होकर उस व्यक्ति ने अपना जीवन निर्धनों और अपंगों की सेवा में लगा दिया।