एक बार विनोबा भावे की माता के पास पड़ोस की एक महिला ने अपने बेटे को कुछ दिनों के लिए छोड़ दिया और तीर्थयात्रा के लिए चली गई। वह लड़का घर के सदस्य की तरह ही रहने लगा। लेकिन इस दौरान विनोबा जी ने अपनी मां के स्वभाव में परिवर्तन देखा।
पड़ोसी के लड़के को वह घी चुपड़कर रोटी देती थीं, पर विनोबा को सूखी रोटी। इस भेदभाव का कारण वह एक दिन अपनी मां से पूछ ही बैठे। माता ने उन्हें प्यार से समझाते हुए कहा, 'तू तो मेरा बच्चा है, पर वह भगवान का बच्चा है। अतिथि को भगवान कहते हैं न? अब भगवान के बच्चे और अपने बच्चे में अंतर होगा ही।' विनोबा जी ने मन ही मन कहा, 'माताएं मिलें तो तुम जैसी, जो बच्चों में ऐसे संस्कार भर सकें।'