क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की बहादुरी और कर्मठता से अंग्रेज शासक भयभीत रहते थे। एक बार उन्हें गोरखपुर की जेल में रखा गया था। उस दौरान उन्हें फांसी दी जाने वाली थी। एक दिन उनके मां-पिता जेल में उनसे मिलने आए। बिस्मिल ने आगे बढ़कर पिता की चरण धूल सिर से लगाई। फिर वह अपनी मां से लिपट गए। कुछ देर तक लिपटे रहे। उनकी आंखें भर आईं। इस बात को उनकी मां ने महसूस कर लिया।
मां ने उनकी पीठ थपथपाकर कहा, 'अरे, मेरा बहादुर बेटा रो रहा है क्या? ऐसा कैसे हो सकता है। तुम्हें किस बात का डर है?' मां की बात सुनकर रामप्रसाद मुस्कराए और बोले, 'मां, तुम भी अच्छी तरह जानती हो कि ये आंसू मृत्यु के भय से नहीं बह रहे। मैं तो किसी घड़ी मौत को गले लगाने के लिए तैयार हूं। ये आंसू तो तुम्हारी जैसी प्यारी मां को देखकर आ गए। पता नहीं अगले जन्म में मुझे इतनी स्नेहशील मां मिलेगी कि नहीं।' मां ने कहा, 'बेटे, बहादुरों को ऐसी ही मां मिलती है। मैं तो खुद भगवान से यह प्रार्थना करके आई हूं कि मुझे हर जन्म में तेरे जैसा बहादुर बेटा मिले।'