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नए की चाह एक भ्रम!

अक्सर जब हम किसी से मिलते हैं, तो पूछते हैं कि 'और नया क्या चल रहा है?' ऐसा लगता है कि सब चाहते हैं कि कुछ नया होता रहे, जीवन की एकरसता टूटती रहे। लेकिन इसी के समानांतर हम तमाम चीजों को एक निश्चित बंधे-बंधाए फ्रेम में भी देखना चाहते हैं। जैसे किसी घर में खिड़कियों और दरवाजों की जगह ईंट-पत्थर की दीवारें हों और दीवारों की जगह खिड़कियों के शीशे लगे हों तो वह हमें पसंद नहीं आएगा। लंबे बालों वाले लड़कों और घुटे सिर वाली लड़कियों को देख कर हमें अटपटा लग सकता है।
होली के दिन किसी को अपने घरों को दीपों से सजाते हुए देख कर हम भौंचक रह जाएंगे। यदि थ्री-पीस सूट पहन कर आया मेहमान अंग्रेजी में हुक्का मंगाने का अनुरोध करे या किराए के लिए लड़ रहा रिक्शावाला अचानक धारा प्रवाह अंग्रेजी बोलना शुरू कर दे, तो हम हतप्रभ रह जाएंगे। असल में हम नयापन चाहते हैं, पर उससे डरते भी हैं। हम पुरानी चीजों को बदलना चाहते हैं, लेकिन उन्हीं के साथ सुरक्षित भी महसूस करते हैं।