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मन की दशा!

एक युवक एक संत के आश्रम में पहुंचा। उसने संत से प्रार्थना की, 'मुझे दीक्षा दीजिए।' संत ने कहा, 'हमारे आश्रम में सौ शिष्य हैं, तू उनके लिए चावल कूट।' वह युवक तत्काल इस कार्य में जुट गया। वह रात-दिन चावल कूटता रहता। इस बीच कभी नींद आती तो सो जाता। न कभी वह गुरु से मिलने गया, न गुरु उसके पास आए।

इस प्रकार कई साल बीत गए। गुरु काफी वृद्ध हो गए। वह आश्रम की जिम्मेदारी और अपना पद किसी योग्य शिष्य को सौंपकर तपस्या के लिए निकल जाना देना चाहते थे। एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, 'आप लोग इतने साल मेरे साथ रहे, आपने इतने दिनों तक सत्संग किया है। आपके मन ने क्या महसूस किया, क्या पाया, आप उसका सार लिखकर मेरी कुटिया में रख देना। जिसका उत्तर मुझे सबसे अच्छा लगेगा उसे मैं अपना पद दे दूंगा और चला जाऊंगा।'

सभी शिष्यों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार लिखा। ज्यादातर ने यही लिखा कि मन एक दर्पण है, उस पर धूल जम गई है, सद्गुरु उसे साफ करते हैं। संत उनमें से किसी के उत्तर से संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने कहा, 'जाओ उस चावल कूटने वाले युवक से पूछो कि उसका अभिप्राय क्या है।' सभी शिष्य उसके पास गए। उस युवक ने जब गुरु का आदेश सुना तो बोला, 'मुझे पढ़ना-लिखना नहीं आता। मैं जो बोलूं वह आप लोग लिखकर गुरु की कुटिया में रख देना। मेरी ओर से इतना ही लिखो कि जब गुरु मिल गया तो फिर मन बचा ही कहां है? वह मन का लुटेरा है। हमारा मन तो वह ले लेता है फिर हमें क्या चिंता? अब हमारी सारी जिम्मेदारी सद्गुरु पर है।' शिष्यों ने यह उत्तर लिखकर संत की कुटिया में रख दिया। संत ने उसे पढ़ा और दौड़कर उसके पास पहुंचे। उन्होंने उसे गले से लगा लिया। फिर उसे अपना पद देकर चले गए।