जीवन के अंतिम दिनों में रामकृष्ण परमहंस काफी बीमार रहते थे। वह अक्सर दर्द से छटपटाते रहते। यह देखकर उनके भक्त बहुत दुखी रहते थे। एक बार उनके कुछ प्रिय भक्तों ने कहा, 'हमें एक बात समझ में नहीं आती। आपने काली माता से प्राप्त शक्तियों से सैकड़ों रोगियों को पीड़ा से मुक्त किया है। फिर उनका प्रयोग अपने लिए क्यों नहीं करते?'
परमहंस बोले, 'मुझे जो कष्ट मिला है वह कर्मानुसार है। किसलिए मिला है, यह भी मैं जानता हूं। जो शक्ति काली मां ने मुझे दी है वह परमार्थ के लिए है, जिसका मैं अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग नहीं कर सकता। उनका अपने लिए प्रयोग करके मैं उनकी नजरों में अप्रामाणिक नहीं बनना चाहता।'
परमहंस बोले, 'मुझे जो कष्ट मिला है वह कर्मानुसार है। किसलिए मिला है, यह भी मैं जानता हूं। जो शक्ति काली मां ने मुझे दी है वह परमार्थ के लिए है, जिसका मैं अपने स्वार्थ के लिए प्रयोग नहीं कर सकता। उनका अपने लिए प्रयोग करके मैं उनकी नजरों में अप्रामाणिक नहीं बनना चाहता।'