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रचनाकार की भावना

पत्नी की फटकार से आहत तुलसीदास घर-बार छोड़ कर काशी आ गए और वहां उन्होंने स्वामी नरहरिदास के शरण में रहकर पंदह वर्षों तक वेदों और पुराणों का अध्ययन किया। बाद में उन्होंने रामचरितमानस की रचना की। इस ग्रंथ की ख्याति धीरे-धीरे देश भर में फैल गई लेकिन तुलसीदास पर इसका कोई असर नहीं हुआ। वह पहले की तरह ही दीन-हीन अवस्था में एक कुटिया में रहते थे।
पुस्तक की प्रशंसा सुन कर एक बार काशी के राजा उनके पास आए और बोले, 'अब आप साधारण व्यक्ति नहीं रहे। प्रभु के स्वरूप को आपने जिस तरह प्रतिबिंबित किया है वह कोई साधारण आदमी नहीं कर सकता। आप तो साक्षात भगवान के अवतार हैं। रामचरितमानस एक साधारण पुस्तक भर नहीं है। इसमें आपने भगवान राम के समूचे स्वरूप को जिस तरह अंकित किया है, वह बेजोड़ है। ऐसा महान रचयिता दीन-हीन अवस्था में एक कुटिया में रहे, यह मुझे मंजूर नहीं है। आप को राज्य की तरफ से सभी तरह की सुविधाएं दी जाएंगी। अब आप गरीबी का चोला उतार कर फेंक दीजिए।'
इस पर तुलसीदास ने कहा, 'राजन्, आप जिस पुस्तक की इतनी प्रशंसा कर रहे हैं और जिसकी वजह से आप मुझे हर तरह की सुविधाएं देने को कह रहे है, वह मेरी गरीबी के कारण ही लिखी गई। मैं ऐश्वर्य में रहकर शायद प्रभु के प्रति इतना समर्पित नहीं हो पाता। मुझे सुख-साधन की चाह होती तो मैं इस रास्ते पर बढ़ता ही नहीं। अब तो मैं जिस रास्ते पर बढ़ गया हूं उससे वापस नहीं लौट सकता। प्रभु के चरणों में जो सुख है वह कहीं और नहीं है। कृपया मुझे इस सुख से वंचित मत कीजिए। आप मुझे रामचरितमानस का रचयिता तुलसीदास ही रहने दीजिए, कुछ और मत बनाइए। मुझे प्रभु से दूर मत कीजिए राजन्।' तुलसीदास के ये शब्द सुन कर राजा का अभिमान चूर-चूर हो गया। वह चुपचाप लौट गए।