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क्या यही है देश का युवा नेतृत्व!

देश की राजनीतिक पार्टियों को इस बात का अहसास है कि इस बार के आम चुनाव में युवा वर्ग निर्णायक भूमिका निभाने वाला है। वे इस बात को लेकर सचेत हैं कि आज भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। देश के 54 फीसदी मतदाताओं की उम्र 40 साल से कम है। इसे ध्यान में रखकर तमाम सियासी पार्टियां युवाओं को आकर्षित करने में लगी हैं। इसके लिए वेबसाइट्स पर तरह-तरह के विज्ञापन दिए जा रहे हैं, एसएमएस भेजे जा रहे हैं। इसके अलावा कई अन्य तरीकों से भी उनसे संपर्क बनाने की मुहिम चल रही है।
नई सदी के नौजवान हर क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं, पर क्या उनकी आशाओं-आकांक्षाओं का कोई प्रतिबिंब लोकसभा में नजर आता है? क्या संसद में ऐसा कोई कामकाज हुआ है, जिससे युवाओं में इस संस्था के प्रति आस्था बढे़? संसद में नौजवानों का प्रतिनिधित्व करने वाले कितने सांसद हैं? चौदहवीं लोकसभा में उन्होंने कितनी बार युवाओं के लिए आवाज उठाई? चुनाव के मैदान में आज जो युवा उम्मीदवार खडे़ हैं, वे किसकी भावनाओं को व्यक्त कर रहे हैं? इन प्रश्नों की रोशनी में आज के राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो हमें निराशा ही हाथ लगती है।
कांग्रेस राहुल गांधी को देश की युवा पीढ़ी का आइकॉन बनाना चाहती है। प्रधानमंत्री पद के लिए आवश्यक सारी खूबियां राहुल में हैं, ऐसा अर्जुन सिंह, प्रणव मुखर्जी जैसे नेता कई बार बता चुके हैं। मगर राहुल के राजनीतिक परफॉर्मन्स का आकलन किया जाए, तो संसद के भीतर और बाहर उनमें आज तक कोई खास चमक नजर नहीं आई। राजस्थान में मजदूरों के साथ किया हुआ श्रमदान, उत्तर प्रदेश में दलित परिवारों के साथ रात गुजारना, खास तामझाम के साथ चुनाव के दौरान पेश किए गए रोड शो, विदर्भ में आत्महत्या करने वाले किसान परिवारों का हालचाल पूछना- ये सारी घटनाएं न्यूज चैनलों और प्रिंट मीडिया में बड़ी खबरें जरूर बनीं, लेकिन भारत जैसे बहुआयामी देश का प्रधानमंत्री पद संभालने की काबिलियत राहुल में है, ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ। चालीस साल की उम्र में राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने। राहुल अब 39 वर्ष के हैं। पार्टी के महासचिव पद का जिम्मा स्वीकार करने के लिए उन्हें तीन साल तक सोचना पड़ा।
हालांकि उनसे यह आशा थी कि कम से कम युवक कांग्रेस में नया जोश पैदा करने में वह जरूर कामयाब होंगे। लेकिन राहुल ने ज्यादातर प्रदेशों में उन्हीं युवाओं के हाथ में युवक कांग्रेस का नेतृत्व सौंप दिया, जिन्हें राजनीति विरासत में मिली थी। जनता के सुख- दुख में शामिल होने वाले जमीन से जुडे़ कार्यकर्ताओं को संगठन के पदों से दूर ही रखा गया। शायद इसी कारण देश भर में छात्रों-युवाओं का मूवमंट थमता नजर आ रहा है। हर राज्य में पार्टी चंद नेताओं के छोटे-छोटे गुटों में बंट चुकी है। ये गुट आपस में लड़ते हैं और पार्टी का भविष्य तबाह करते हैं।
इस बार ज्यादा से ज्यादा युवाओं को चुनाव मैदान में उतारने की बात पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में राहुल ने हाल में ही कही थी। परिणामों की परवाह न करते हुए अगर सचमुच इस निर्णय पर अमल होता तो शायद राहुल के नेतृत्व का देश के कोने-कोने में खास असर दिखता, पर कांग्रेस के उम्मीदवारों की सूची देखें तो उसमें पांच प्रतिशत भी युवा नजर नहीं आते। राहुल की बाबा टीम भी संकट में है। सचिन पायलट न जाने कितने दिन नया चुनाव क्षेत्र खोजते रहे। मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया के गुना क्षेत्र से ज्यादातर कांग्रेस उम्मीदवार हार गए। लगता है, नए नेतृत्व को सिंधिया भी आगे नहीं बढ़ा पाए। मुंबई में मिलिंद देवड़ा भी संकट में हैं। जिस मीनाक्षी नटराजन को राहुल ने मंदसौर से उम्मीदवार बनाया, वहां उनके खिलाफ कांग्रेस कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। राहुल की खास पसंद से कश्मीर के मुख्यमंत्री बने उमर अब्दुल्ला के खिलाफ भी नाराजगी के स्वर उभरने लगे हैं।
कांग्रेस की तुलना में बीजेपी की हालत और भी खराब है। राहुल को चैलिंज देने के लिए पार्टी ने वरुण गांधी को मैदान में उतारा। पीलीभीत की चुनाव रैली में वरुण ने मुस्लिम समुदाय के खिलाफ जो आग भड़काई उसकी तीव्र प्रतिक्रिया पूरे देश में हुई है। एक स्वर से वरुण की आलोचना हो रही है लेकिन बीजेपी के वरिष्ठ नेता उनके बचाव में खड़े हो गए हैं। चुनाव आयुक्त कीसलाह को न मानते हुए बीजेपी ने वरुण को पीलीभीत से लड़ाने का निर्णय किया है। लंदन स्कूल ऑफ ईकनॉमिक्स जैसे विख्यात संस्थान में पढ़े वरुण ने खुद को ऐसी विद्वेषपूर्ण राजनीति से जोड़ लिया है, जिसका समर्थन देश के अधिकतर युवा नहीं करते। क्षेत्रीय दलों के नेता भी आए दिन पीएम बनने की अपनी इच्छा का इजहार करते रहते हैं, लेकिन इन दलों में भी वंशवाद हावी है। इन्होंने या तो युवराजों को टिकट दिए हैं या आपराधिक पृष्ठभूमि से आए युवाओं को।
चौदहवीं लोकसभा में 34 ऐसे सांसद थे, जिनकी उम्र 40 साल से कम थी। उनमें से 19 ऐसे थे जिन्हें राजनीति विरासत में मिली और वे संसद तक पहुंचे। सात सांसद ऐसे भी थे जो आपराधिक पृष्ठभूमि से संसद में आए। संतोष की बात यह है कि इनके साथ प. बंगाल से आए तीन और उड़ीसा से आए दो ऐसे सांसद भी थे जो इन दो श्रेणियों में नहीं आते। आम तौर पर वाम दलों का गठबंधन ऐसे युवाओं को उम्मीदवार बनाता रहा है। इंटरनैशनल ऐथलीट ज्योतिर्मय सिकदर इसका एक उदाहरण हैं। लेकिन राजनीतिक पार्टियां मध्यवर्ग से आने वाले अध्ययनशील और मेहनती युवाओं को प्रोत्साहन नहीं दे रही हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि राजनीति में साधारण परिवारों के युवाओं का भी प्रतिनिधित्व हो। फिर यह कैसे उम्मीद की जाए कि जो पार्टियां नई पीढ़ी को लुभाने की कवायद में जुटी हैं, वे सत्ता पाने के बाद युवा वर्ग के सपनों को पूरा कर पाएंगी? आज गांव या शहर के निम्न या मध्य वर्ग का कोई युवा अगर राजनीति में आकर देश के लिए कुछ सार्थक कार्य करना चाहे तो क्या वर्तमान राजनीति में उसके लिए कोई जगह है? देश के दस करोड़ युवा, जो इस चुनाव में पहली बार अपना वोट देंगे, इस सवाल का जवाब जरूर चाहेंगे।