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काम और पहचान!

एक व्यक्ति एक ही काम करते-करते ऊब जाता है और उससे मुक्ति की बात सोचने लगता है। शायद इसीलिए छुट्टी की व्यवस्था की गई ताकि लोग अपनी थकान मिटा आएं और फिर से तरोताजा होकर अपने मूल काम में जुट जाएं। लोग तरोताजा होने के लिए घूमते फिरते हैं, मनोरंजन करते हैं। अगर किसी के पास यह सुविधा हो कि वह जब चाहे अपना काम बदल ले तो क्या वह बदल लेगा? शायद नहीं। अगर ऐसा होता तो दुनिया में विशेषज्ञता की अवधारणा नहीं आई होती। काम बदलने की एक तो गुंजाइश कम है लेकिन इसके लिए हमारा शरीर और मन तैयार भी नहीं होता।
हमें एक ही काम की आदत पड़ जाती है और हमें लगता है कि हम कुछ और नहीं कर सकते। दरअसल यह आदत से ज्यादा हमारी पहचान का मामला है। हर व्यक्ति अपने काम से अपनी एक पहचान बनाता है। लेकिन यह पहचान समाज के लिए नहीं अपने लिए भी होती है। हम अपने लिए भी अपनी एक पहचान बनाते हैं। हमारा काम दरअसल हमें हमारी एक पहचान देता है। इसलिए हम उस काम को छोड़ना नहीं चाहते क्योंकि उससे हमारी पहचान मिटने का खतरा रहता है।